बेरोजगारी

बेरोजगारी

Share this article Share this article

What's Inside

 अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन(आईएलओ) द्वारा जारी [inside]ग्लोबल एम्पलॉयमेंट ट्रेन्डस्- रिकवरिंग फ्राम सेकेंड जॉब डिप[inside] नामक दस्तावेज के अनुसार

http://www.ilo.org/wcmsp5/groups/public/---dgreports/---dc
omm/---publ/documents/publication/wcms_202326.pdf

 

•             वैश्विक वित्तीय संकट के पांचवें साल में, विश्वस्तर पर अर्थव्यवस्था की वृद्धि-दर में कमी आई है और एक बार फिर से बेरोजगारी बढ़ रही है। साल 2012 में विश्वस्तर पर 19 करोड़ 70 लाख लोग बेरोजगार थे। इसके अतिरिक्त इसी साल तकरीबन 3 करोड़ 90 लाख लोग श्रम-बाजार से बाहर हुए क्योंकि पहले की तुलना में नौकरियां कम हो गईं।

•             अनुमान है कि बेरोजगारी की दर अगले दो सालों में बढ़ेगी, साल 2013 में बेरोजगारों की संख्या में वैश्विक स्तर पर 51 लाख का इजाफा होगा और इस संख्या में 2014 में 30 लाख बेरोजागार और जुड़ जायेंगे।

•             साल 2012 में बेरोजगारों की संख्या में हुई वृद्धि का एक चौथाई विकसित अर्थव्यवस्थाओं में केंद्रित रहा जबकि तीन चौथाई विश्व के अन्य क्षेत्रों में। पूर्वी एशिया, दक्षिण एशिया और उप-सहारीय अफ्रीका सबसे ज्यादा बेरोजगारी प्रभावित इलाके रहे।.

•             भारत की विकास दर 4.9 फीसदी पर पहुंच गई जो पिछले एक दशक में सबसे कम विकास दर है( यह आईएलओ का आकलन है, भारत सरकार का आकलन 2012 के लिए 5.9 फीसदी की विकासदर का है)। पूरे दक्षिण एशियाई क्षेत्र में जीडीपी की वृद्धि-दर में 1.6 फीसदी की गिरावट आई है।

•             भारत में, निवेश में हुई वृद्धि का योगदान साल 2012 में जीडीपी की वृद्धि में 1.5 फीसदी रहा जो साल 2012 की तुलना में 1.8 फीसदी कम है। इसी तरह साल 2012 में जीडीपी की वृद्धि में उपभोग का योगदान 2.8 फीसदी रहा जबकि साल 2011 में यह 3.2 फीसदी था।

•             विश्व की चुनिन्दा बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में भारत ही एकमात्र देश है जहां साल 2012 में मुद्रास्फीति बढ़ी है, जबकि उपभोक्ता मूल्य सूचकांक में 10 फीसदी की बढोतरी हुई है। साल 2011 में यह बढोत्तरी 9 फीसदी की थी।

•             जैसा कि ग्लोबल एम्पलॉयमेंट ट्रेन्डस् 2012 रिपोर्ट में कहा गया है, साल 2000 के दशक में दक्षिण एशिया में तेज आर्थिक वृद्धि हुई है लेकिन यह वृद्धि श्रम की उत्पादकता में बढोत्तरी का परिणाम है ना कि नौकरियों की संख्या में हुई वृद्धि का। इस परिघटना को जॉबलेस ग्रोथ यानि बिना नौकरी के विकास की संज्ञा दी जाती है और परिघटना सबसे ज्यादा भारत में दीखती है।

•             युवाओं के बीच सर्वाधिक बेरोजगारी मालदीव में पायी गई है। साल 2006 में इसकी दर मालदीव में 22.2 फीसदी थी जबकि भारत में यही आंकड़ा साल 2010 के लिए 10 फीसदी से ज्यादा का है।

•             भारत में साल 2004-05 से 2009-10 के बीच कुल रोजगार की संख्या में महज 27 लाख की बढ़त हुई जबकि इसके पीछे के पाँच सालों(1999-2000 से 2004-05 के बीच) रोजगार की संख्या में इजाफा 6 करोड़ का हुआ था।

•             विश्व के अनेक क्षेत्रों के समान आर्थिक-वृद्धि दक्षिण एशिया में भी अर्थव्यवस्था के संगठित क्षेत्र में बेहतर नौकरियां सृजित कर पाने में नाकाम रही है। यह बात सबसे ज्यादा भारत में दीखती है। साल 1999-2000 में भारत में संगठित क्षेत्र का योगदान नौकरियों में 9 फीसदी का था जो साल 2009-10 में घटकर 7 फीसदी हो गया, जबकि ये साल सर्वाधिक तेज आर्थिक-वृद्धि के साल माने जाते हैं।

•             उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार भारत में असंगठित क्षेत्र (कृषि-एतर) में कामगारों की 83.6 फीसदी तादाद है(साल 2009-10) जबकि पाकिस्तान में यह तादाद इसी अवधि के लिए 78.4 फीसदी तथा श्रीलंका में 62.1 फीसदी है।

•             दक्षिण एशिया में संरचनागत बदलाव की प्रक्रिया चल पड़ी है लेकिन इसका दायरा और दिशा अभी दोनों अनिश्चित हैं। खात तौर पर यह बात अभी अनिश्चित है कि क्या विनिर्माण का क्षेत्र(मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर) भारत जैसे देशों में उस तादाद को खपा सकेगा जो फिलहाल नौकरी की तलाश में हैं।मिसाल के लिए भारत में साल 2009-10 में कामगारों की तादाद महज 11 फीसदी थी और एक दशक पहले की स्थिति से तुलना करने पर इसे ऊँचा नहीं माना जा सकता।

•             भारत में अब भी रोजगार देने के मामले में खेती का योगदान बहुत बड़ा है। साल 2010 में देश के कामगारों का 51.1 फीसदी को खेती से रोजगार हासिल था। नेपाल में साल 2001 के लिए यही आंकड़ा 65.7 फीसदी का था। इसके विपरीत मालदीव में रोजगार में सेवाक्षेत्र का योगदान साल 2006 में सर्वाधिक(60 फीसदी) था जबकि श्रीलंका में साल 2010 में सेवाक्षेत्र का योगदान रोजगार देने के मामले में 40.4 फीसदी का रहा।

•             भारत जैसे देश में रोजगार-वृद्धि की दर कम रहने का एक बड़ा कारण महिला कार्यशक्ति की प्रतिभागिता दर का कम होना है। भारत में महिला कार्यशक्ति की प्रतिभागिता साल साल 2004-05 में 37.3 फीसदी थी जो साल 2009-10 में घटकर 29.0 फीसदी पर आ गई।

•             भारत में उच्चकौशल के कामगारों के बीच बेरोजगारी ज्यादा है। डिप्लोमाधारी भारतीय पुरुषों के बीच साल 2009-10 में बेरोजगारी 18.9 फीसदी थी तो ऐसी महिलाओं के बीच 34.5 फीसदी। बहरहाल जिन लोगों ने प्रौद्योगिकी-उन्मुख शिक्षा हासिल की है उनके बीच बेरोजगारी की दर इससे कम है।

•             इसके अतिरिक्त भारत में बेरोजगारी का एक पक्ष यह भी है कि काम की प्रकृति से रोजागार तलाश करने वाले लोगों के कौशल का मेल नहीं हो पा रहा और इस कारण नियोक्ताओं को खाली पदों पर नियुक्ति करने में कठिनाई हो रही है। साल 2011 में प्रकाशित मैनपॉवर टैलेंट शार्टेज सर्वे के अनुसार तकरीबन 67 फीसदी नियोक्ताओं का कहना था कि उन्हें खाली पदों को भरने के लिए योग्य लोग नहीं मिल रहे।

•             युवाओं के बीच सर्वाधिक बेरोजगारी मालदीव में पायी गई है। साल 2006 में इसकी दर मालदीव में 22.2 फीसदी थी जबकि भारत में यही आंकड़ा साल 2010 के लिए 10 फीसदी से ज्यादा का है।

 

 



Related Articles

 

Write Comments

Your email address will not be published. Required fields are marked *

*

Video Archives

Archives

share on Facebook
Twitter
RSS
Feedback
Read Later

Contact Form

Please enter security code
      Close