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डॉमेस्टिक वर्कर्स सेक्टर स्किल काउंसिल (DWSSC) - कौशल विकास और उद्यमिता मंत्रालय के दायरे में काम करने वाली एक गैर-लाभकारी कंपनी, ने भारत में COVID-19 लॉकडाउन के दौरान एक सर्वे किया. इस सर्वे में डीडब्ल्यूएससी ने आठ राज्यों-दिल्ली, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, असम, पश्चिम बंगाल, बिहार, झारखंड और तमिलनाडु में फैले 200 श्रमिकों के बीच एक रैंडम सैम्पल सर्वे किया. डीडब्ल्यूएससी के अनुसार, अगर सैंपल साइज बड़ा होता तो परिणाम भिन्न हो सकते थे. सर्वे के परिणाम लॉकडाउन के दौरान डॉमेस्टिक वर्कर्स को हो रही समस्याओं की तरफ इशारा करते हैं.

डॉमेस्टिक वर्कर्स सेक्टर स्किल काउंसिल द्वारा जारी डॉमेस्टिक वर्कर्स पर लॉकडाउन के प्रभाव (जून 2020 में जारी) नामक इस सर्वे के मुख्य निष्कर्ष इस प्रकार हैं (एक्सेस करने के लिए कृपया यहां क्लिक करें.):

• लगभग 96 प्रतिशत डॉमेस्टिक वर्कर्स ने लॉकडाउन के दौरान काम करना बंद कर दिया, जबकि केवल 4 प्रतिशत ने काम करना जारी रखा.

• लॉकडाउन के दौरान, जब नागरिकों की आवाजाही प्रतिबंधित की गई तो डॉमेस्टिक वर्कर भी प्रभावित हुए. उन्हें इस लॉकडाउन के दौरान काम करने के लिए मना किया गया और सरकार ने लॉकडाउन अवधि के दौरान नियोक्ताओं को उन्हें भुगतान करने की सलाह दी. लगभग 85 प्रतिशत डॉमेस्टिक वर्कर्स को लॉकडाउन अवधि के दौरान उनके नियोक्ताओं द्वारा कोई भुगतान नहीं किया गया, जबकि इसी दौरान केवल 15 प्रतिशत डॉमेस्टिक वर्कर्स को तनख्वाह मिल रही थी. बड़े शहरों में रहने वाले अधिकांश डॉमेस्टिक वर्कर्स को उनके नियोक्ताओं द्वारा भुगतान किया जा रहा था.

• DWSSC के इस सर्वे से पता चलता है कि लगभग 30 प्रतिशत डॉमेस्टिक वर्कर्स के पास जरूरतों के लिए पर्याप्त पैसा / नकदी नहीं बची है. यह उनकी सबसे बड़ी चुनौती थी क्योंकि उन्हें नहीं पता था कि वे कब तक उनके पास बची थोड़ी सी धनराशि के साथ गुजारा कर पाएंगे. अधिकांश डॉमेस्टिक वर्कर्स को उनके नियोक्ताओं ने लॉकडाउन अवधि के दौरान वेतन नहीं दिया थी.

• लगभग 38 प्रतिशत डॉमेस्टिक वर्कर्स को भोजन की व्यवस्था करने में समस्याओं का सामना करना पड़ा क्योंकि पास की दुकानों में उपलब्ध स्टॉक सीमित थे. हालांकि सभी नहीं, लेकिन कुछ डॉमेस्टिक वर्कर्स को भी पीडीएस दुकानों से राशन प्राप्त करने में समस्याओं का सामना करना पड़ा.

• मोटे तौर पर एक-चौथाई डॉमेस्टिक वर्कर्स को भोजन से संबंधित किसी भी समस्या का सामना नहीं करना पड़ा और उनमें से ज्यादातर या तो ऐसे थे जो वापस अपने मूल स्थान पर लौट गए थे या फिर ऐसे श्रमिक जिनके नियोक्ता उन्हें लॉकडाउन अवधि के दौरान मजदूरी / वेतन का भुगतान कर रहे थे.

• लगभग 23.5 प्रतिशत डॉमेस्टिक वर्कर्स अपने मूल स्थानों पर वापस चले गए क्योंकि उनके पति / अभिभावक (पिता) दिहाड़ी मजदूर जैसे पेंटर, राजमिस्त्री, आदि थे. अधिकांश डॉमेस्टिक वर्कर्स मुख्य रूप से बड़े शहरों से अपने गांव वापस लौटे थे. लगभग 76.5 प्रतिशत डॉमेस्टिक वर्कर्स उन शहरों / कस्बों में वापस आ गए हैं जहाँ वे अपने परिवारों के साथ रह रहे थे.

• सरकार द्वारा लॉकडाउन अवधि के दौरान दी जा रही सुविधाओं का लाभ उठाने के लिए केवल 41.5 प्रतिशत डॉमेस्टिक वर्कर्स सरकारी हेल्पलाइन के बारे में जानते थे.

• डॉमेस्टिक वर्कर्स की अधिकांश आबादी (लगभग 98.5 प्रतिशत) कोविड -19 से संक्रमित होने से बचने के लिए बरती जाने वाली सावधानियों के बारे में जानते थे.

• DWSSC की वेबसाइट के अनुसार, डॉमेस्टिक वर्कर्स या डॉमेस्टिक हेल्प सेक्टर से लगभग 2 करोड़ श्रमिक अपनी रोजी-रोटी चलाते हैं, जिनमें अधिकतर महिलाएं हैं, जिनकी सेवाओं पर कभी किसी का ध्यान नहीं जाता. ये लाखों डॉमेस्टिक वर्कर्स गाँवों में निम्न मध्यम वर्गीय परिवारों से लेकर महानगरों में सबसे संपन्न लोगों तक पाए जा सकते हैं. एक हिसाब से डॉमेस्टिक वर्कर्स घरों मंा 'जीवन रेखा' के रूप में कार्य करते हुए पूर्णकालिक और अंशकालिक, लिव-इन और लिव-आउट के रूप में कई प्रकार की सेवाएं प्रदान करते हैं, और इसलिए उन्हें 'डॉमेस्टिक वर्कर्स' कहा जाता है. इस पेशे से जुड़ी प्रथाएं अनिच्छुक और पूरी तरह से अस्वीकार्य हैं, इसी वजह से ही डॉमेस्टिक वर्क को अभी तक सम्मानित पेशे या व्यापार की तरह नहीं देखा जाता है.

• एक डॉमेस्टिक वर्कर किसी व्यक्ति या परिवार के लिए विभिन्न प्रकार की सेवाएं दे सकता है, जो कुशल और अकुशल श्रमिक के रूप में कार्य करते हुए बच्चों, बुजुर्गों, बीमार, विकलांगों के अलावा घरेलू रखरखाव, खाना पकाने, कपड़े धोने, खरीदारी आदि की देखभाल करता है. डीडब्ल्यूएसएससी की वेबसाइट के मुताबिक, डॉमेस्टिक वर्क असंगठित क्षेत्र के सबसे बड़े क्षेत्रों में से एक हैं और इनकी संख्या 47 लाख से लेकर 2 करोड़ 50 लाख के बीच है. ज्यादातर डॉमेस्टिक वर्कर्स, अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति समुदायों के हैं.
 




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