बेरोजगारी

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स्टेट ऑफ़ वर्किंग इंडिया 2019 रिपोर्ट (देखने के लिए कृपया यहाँ क्लिक करें), जिसे सेंटर फॉर सस्टेनेबल एम्प्लॉयमेंट, अजीम प्रेमजी यूनिवर्सिटी द्वारा तैयार किया गया है.

• इस रिपोर्ट को 2016 और 2018 के बीच की अवधि में नौकरियों की स्थिति और रोजगार सृजन के लिए कुछ विचारों के साथ प्रस्तुत किया गया है.

• भारत में साल 2019 के शुरुआती कुछ महीने श्रम अर्थशास्त्रियों और सांख्यिकीविदों के लिए असामान्य रूप से घटनाओं से भरपूर रहे हैं. नए साल की शुरुआत में ही रोजगार सृजन को लेकर चल रहे विवाद ने तब एक नया मोड़ ले लिया जब सोमेश झा ने बिजनेस स्टैंडर्ड अखबार में रोजगार पर एक नए राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण कार्यालय (एनएसएसओ) की रिपोर्ट का खुलासा कर दिया. सोमेश झा ने नये आवधिक श्रम बल सर्वेक्षण (पीएलएफएस) को लीक कर इसके ’निष्कर्षों की सूचना दी, जिससे पता चला कि 2017-2018 में बेरोजगारी दर 6.1 प्रतिशत तक बढ़ी है, जोकि अबतक सबसे ज्यादा है.

• भारत की श्रम सांख्यिकी प्रणाली में बदलाव किए जा रहे है. राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण कार्यालय (एनएसएस-ईयूएस) द्वारा आयोजित पाँच-वर्षीय रोजगार-बेरोजगारी सर्वेक्षण, जिसे साल 2011-12 में आखरी बार जारी किया गया था, को बंद कर दिया गया है. लेबर ब्यूरो (LB-EUS) द्वारा किए जाने वाले वार्षिक सर्वेक्षण भी बंद कर दिए गए हैं. इस श्रृंखला में अंतिम उपलब्ध सर्वेक्षण 2015 में जारी किया गया है.

• वर्तमान एनडीए सरकार ने पिछले लेबर ब्यूरो सर्वेक्षण (2016-17) के परिणाम और एनएसएसओ द्वारा किए जाने वाले नए आवधिक श्रम बल सर्वेक्षण (पीएलएफएस) के परिणाम जारी नहीं किए हैं. इसी वजह से हमारे पास 2015-16 के बाद राष्ट्रीय प्रतिनिधि घरेलू सर्वेक्षण के आधार पर आधिकारिक रोजगार संख्या उपलब्ध नहीं है.

• आधिकारिक सर्वेक्षण के आंकड़ों की अनुपस्थिति में, इस रिपोर्ट को तैयार करने के लिए 2016 और 2018 के बीच रोजगार की स्थिति को समझने के लिए भारतीय अर्थव्यवस्था की निगरानी के लिए केंद्र के उपभोक्ता पिरामिड सर्वेक्षण (CMIE-CPDX) से डेटा का उपयोग किया है.

• सीएमआईई-सीपीडीएक्स (CMIE-CPDX) एक राष्ट्रीय प्रतिनिधि सर्वेक्षण है जो लगभग 160,000 घरों और 522,000 व्यक्तियों को शामिल करता है और इसे तीन खंडों में किया जाता है, प्रत्येक में चार महीने होते हैं, जोकि हर साल जनवरी से शुरू होता है. 2016 में इस सर्वेक्षण में एक रोजगार-बेरोजगारी मॉड्यूल जोड़ा गया था.

• सीएमआईई-सीपीडीएक्स (CMIE-CPDX) के विश्लेषण से पता चलता है कि 2016 और 2018 के बीच 50 लाख लोगों की नौकरियां चली गईं. इस सिलसिले की शुरुआत नवंबर 2016 में हुई नोटबंदी से जुड़ी नौकरियों में गिरावट से हुई, हालांकि इन प्रवृत्तियों के आधार पर कोई भी प्रत्यक्ष कारण संबंध स्थापित नहीं किया जा सकता है.

• विश्लेषण से यह भी पता चलता है कि सामान्य रूप से, बेरोजगारी 2011 में तेजी से बढ़ी है. PLFS और CMIE-CPDX दोनों की कुल बेरोजगारी दर 2018 में लगभग 6 प्रतिशत है, जो कि 2000 से 2011 के दशक में दोगुनी थी.

• भारत के बेरोजगार ज्यादातर उच्च शिक्षित और युवा हैं. शहरी महिलाओं में, स्नातक तक पढ़ी कामकाजी उम्र की महिलाएं आबादी का 10 प्रतिशत हैं, लेकिन उनमें से 34 प्रतिशत बेरोजगार हैं. 20-24 वर्ष आयु वर्ग के युवा सबसे अधिक बेरोजगार हैं. उदाहरण के लिए, शहरी पुरुषों में, इस आयु वर्ग के युवा कामकाजी उम्र की आबादी का 13.5 प्रतिशत हैं, लेकिन उनमें से 60 प्रतिशत बेरोजगार हैं.

• उच्च शिक्षितों के बीच बढ़ती बेरोजगारी के अलावा, साल 2016 के बाद कम शिक्षित (और संभावित, अनौपचारिक) श्रमिकों को भी नौकरियों से हाथ धोना पड़ा है और उनके लिए भी से नौकरी के अवसरों में कमी आई है.

• आमतौर पर, पुरुषों की तुलना में महिलाएं बहुत अधिक प्रभावित होती हैं. पुरुषों के मुकाबले महिलाओं में बेरोजगारी दर ज्यादा है और साथ ही श्रम बल भागीदारी दर भी पुरुषों से कम है.

• 2016 और 2018 के बीच लेबर फोर्स के साथ-साथ वर्क फोर्स के आकार में गिरावट आई है और बेरोजगारी की दर में वृद्धि हुई है, जोकि चिंता का विषय है.

• नीचे दी गई तालिका से, यह देखा जा सकता है कि: 
1)    हालाँकि WPR, LFPR और UR के स्तर सर्वेक्षणों के बीच काफी भिन्न हैं, फिर भी रुझान समान हैं; 
2)    सर्वेक्षणों में महिलाओं की तुलना में पुरुषों के स्तर बहुत बेहतर हैं. 
3)    और एलएफपीआर और डब्ल्यूपीआर मोटे तौर पर सर्वेक्षण में समान हैं, जबकि सर्वेक्षणों में यूआर में अधिक भिन्नता है.

Table

Note: Labour Force Participation Rate (LFPR, percentage of working age people working or looking for work); Workforce Participation Rate (WPR, percentage of working age people working); and Unemployment Rate (UR, percentage of those in the labour force who are looking for work)

 



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