बेरोजगारी

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सेंटर फॉर सस्टेनेबल एम्प्लॉयमेंट, अजीम प्रेमजी यूनिवर्सिटी द्वारा जारी की गई [inside]स्टेट ऑफ़ वर्किंग इंडिया 2018[/inside]नामक रिपोर्ट के प्रमुख निष्कर्ष इस प्रकार हैं (देखने के लिए कृपया यहां क्लिक करें):

• 1970 और 1980 के दशक में, जब जीडीपी की वृद्धि दर लगभग 3-4 प्रतिशत थी, तो रोजगार की वृद्धि लगभग 2 प्रतिशत प्रति वर्ष थी. 1990 के दशक से और विशेष रूप से 2000 के दशक में, जीडीपी की वृद्धि 7 प्रतिशत तक बढ़ गई लेकिन रोजगार वृद्धि 1 प्रतिशत या उससे भी कम हो गई है. सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) वृद्धि के मुकाबले रोजगार वृद्धि का अनुपात अब 0.1 प्रतिशत से कम है.

• 2013 और 2015 के दौरान कुल सत्तर लाख रोजगार कम हुए हैं. प्राइवेट स्रोतों से प्राप्त हुए हाल-फिलहाल के आंकड़ों से पता चलता है कि 2015 के बाद भी रोजगारों में गिरावट लगातार जारी है.

• बेरोजगारी की दर कुल मिलाकर 5 प्रतिशत से अधिक है, और युवाओं और उच्च शिक्षितों के लिए 16 प्रतिशत से अधिक है.

• बढ़ती मजदूरी के बावजूद भी श्रमिक, सातवें केंद्रीय वेतन आयोग द्वारा निर्धारित न्यूनतम भत्तों से काफी कम में काम कर रहे हैं. 

• जब मुद्रास्फीति के लिए समायोजित किया जाता है, तो अधिकांश क्षेत्रों में मजदूरी की दर 3 प्रतिशत प्रति वर्ष या उससे अधिक हो गई है.

• 2010 और 2015 के बीच, मुद्रास्फीति के लिए समायोजित होने पर मजदूरी में संगठित निर्माण में 2 प्रतिशत प्रति वर्ष, असंगठित विनिर्माण में 4 प्रतिशत, असंगठित सेवाओं में 5 प्रतिशत, और कृषि में 7 प्रतिशत की वृद्धि (आखिरी में 2015 के बाद से बृद्धि बंद हो गई है) हुई है. साल 2000 के बाद से, अपवाद के तौर पर कृषि क्षेत्र को छोड़ दें तो, अधिकांश क्षेत्रों में लगभग 3-4 प्रतिशत की दर से मजदूरी में बढ़ोतरी हुई है. इस दर के हिसाब से असल मजदूरी हर दो दशकों में दोगुनी हो जाती है.

• 82 प्रतिशत पुरुष और 92 प्रतिशत महिला कर्मचारी 10,000 रुपये प्रति महीने से कम कमाते हैं. साल 2015 में, राष्ट्रीय स्तर पर, 67 प्रतिशत परिवारों की मासिक आय 10,000 रुपये थी. जबकि इसके मुकाबले सातवें केंद्रीय वेतन आयोग (सीपीसी) द्वारा अनुशंसित न्यूनतम वेतन 18,000 रुपये प्रति माह है. यहां तक कि संगठित विनिर्माण क्षेत्र में भी 90 प्रतिशत उद्योग न्यूनतम सीपीसी से नीचे मजदूरी का भुगतान करते हैं.

• 1980 के दशक की शुरुआत में, एक करोड़ रुपये की वास्तविक फिक्स्ड कैपिटल (2015 की कीमतों में) से संगठित विनिर्माण क्षेत्र में 90 नौकरियां चलती थीं. 2010 तक, यह आंकड़ा गिरकर 10 रह गया है.

• संगठित निर्माण क्षेत्र में सभी श्रमिकों में 30 प्रतिशत श्रमिक, कॉन्ट्रेक्ट यानी अनुबंधित श्रमिक हैं. 2000 के दशक की शुरुआत से ही कॉन्ट्रेक्ट और मजदूरी के अन्य अनिश्चित तरीकों में बढ़ोतरी देखने को मिली है.

• श्रमिक उत्पादकता, साल 1982 से छह गुना से अधिक हो गई है, लेकिन उत्पादन करने वाले श्रमिकों की वास्तविक मजदूरी में केवल 1.5 गुना बढ़ोतरी हुई है.

• आईटी और आधुनिक रिटेल सहित नए सेवा क्षेत्र में रोजगार 2011 में 11.5 प्रतिशत से बढ़कर 2015 में 15 प्रतिशत हो गया. हालांकि, 50% से अधिक सेवा क्षेत्र का रोजगार अभी भी छोटे कारोबारियों, घरेलू सेवाओं और अन्य प्रकार के छोटे अनौपचारिक क्षेत्र पर टिका है.

• सभी प्रकार के सेवा क्षेत्र में महिला श्रमिकों का 16 प्रतिशत हिस्सा ही कार्यरत है, जबकि 60 प्रतिशत महिलाएं घरेलू श्रमिक हैं. महज 22 प्रतिशत महिलाएं ही उत्पादन (विनिर्माण) क्षेत्र में शामिल हैं.

• महिलाओं को कमाई, पुरुषों की कमाई के 35 से 85 प्रतिशत के बीच होती है, जो काम के प्रकार और उनकी शिक्षा के स्तर पर निर्भर करती है. संगठित निर्माण क्षेत्र में, महिलाओं और पुरुषों की कमाई में साल 2000 के 35 प्रतिशत से साल 2013 में 45 प्रतिशत तक का अंतर कम हो गया है. कमाई की यह असमानता स्वयं-पोषित महिला श्रमिकों में सबसे अधिक है और उच्च शिक्षित और नियमित महिला श्रमिकों में सबसे कम है.

• कई अन्य विकासशील देशों की तुलना में भारत में काम करने वाली महिलाओं का प्रतिशत, जो या तो कार्यरत हैं या काम की तलाश में हैं, का प्रतिशत कम है. उत्तर प्रदेश में प्रत्येक 100 पुरुषों पर केवल 20 महिलाएँ ही किसी भी प्रकार के रोजगार में हैं. यह आंकड़ा तमिलनाडु में 50 और उत्तर-पूर्व में 70 है.

• श्रम बल की भागीदारी दर में पुरुषों के मुकाबले महिलाओं का अनुपात, उत्तर प्रदेश और पंजाब में 0.2 से लेकर तमिलनाडु और आंध्राप्रदेश में 0.5 और उत्तर-पूर्व में मिजोरम और नागालैंड में 0.7 तक काफी अलग-अलग है. क्षेत्रीय अध्ययनों से पता चलता है कि सामाजिक प्रतिबंधों के बजाय उपलब्ध कार्यों की कमी के कारण महिलाएं काम नहीं कर पाती हैं.

• अनुसूचित जाति (एससी) के साथ-साथ अनुसूचित जनजाति (एसटी) समूहों को कम भुगतान वाले व्यवसायों में अधिक कार्य दिया जाता है और उच्च भुगतान वाले व्यवसायों में बहुत कम काम मिलता है, जो स्पष्ट रूप से भारत में जाति-आधारित अलगाव की स्थायी शक्ति को दर्शाता है.

• अनुसूचित जाति (एससी) समुदाय के श्रमिक तथाकथित सवर्ण जाति की आय का केवल 56 प्रतिशत ही अर्जित करते हैं. यह आंकड़ा अनुसूचित जनजाति (एसटी) के लिए 55 प्रतिशत और अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) के लिए 72 प्रतिशत है.

 



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