पत्थर पर दूध और धान- सहकारिता और नई तकनीक का कमाल

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published Published on Mar 12, 2012   modified Modified on Jun 4, 2014

पश्चिमी घाट कहलाने वाली सह्याद्रि पर्वतऋखंला के इलाके में एक गांव है खंबोली। और इस गांव के एक किसान विश्वनाथ की धनखेतियां सुनहली धूप में सोने की तरह चमचमा रही हैं। धनखेतियों के चारो तरफ अमराई है, अमराइयों से ठंढी बयार बहती है, धनखेतियों को आकर दुलार देती है।

यों तो भारत के ज्यादातर किसानों की खेती सिंचाई के लिए बारिश के पानी पर निर्भर है लेकिन इसके उलट विश्वनाथ ने धान की ऊपज लेने के लिए जापान के एक स्वयंसेवी संगठन इंस्टीट्यूट ऑव कल्चरल अफेयर्स और पुणे स्थित आईसीए इंडिया की सहायता से सिंचाई की लिफ्ट एरिगेशन तकनीक का इस्तेमाल किया। गुजरे तीन साल से विश्वनाथ ने अपनी पाँच एकड़ की जमीन पर चार चरणों वाली खेती की इस तकनीक का इस्तेमाल किया और ऊपज में 30 फीसदी की बढ़त हुई। दूसरे फसल-चक्र के रुप में ज्वार, बाजरा और चने की फसल हुई सो अलग से।

ऊपज का ज्यादातर हिस्सा विश्वनाथ के घरेलू उपभोग में खर्च होता है। बाकी बचा अनाज गांव के ही लोगों के बीच अच्छे दामों पर बिक जाता है। ज्यादा ऊपज का अर्थ है, विश्वनाथ के बच्चों के लिए पढ़ाई की अच्छी व्यवस्था, साल भर के लिए भेटपर भोजन और खेतों में इस्तेमाल की नई तकनीक।

लक्ष्मी की कृपा


फायदा अकेले सिर्फ विश्वनाथ को ही नहीं हुआ। पुणे जिले में गरीबी कम करने से संबंधित ग्रामीण-विकास की परियोजना से तकरीबन 90 किसानों की माली हालत सुधरी है।आईसीए इंडिया के सहयोग और जापान इंटरनेशनल कोऑपरेशन एजेंसी की सहायता से चलायी जा रही यह परियोजना चतुर्मुखी है यानी जोर खेती-डेयरी-बायोगैस और वानिकी पर है। उद्देश्य है गरीबी घटाने के साथ-साथ टिकाऊ विकास प्रदान करना।

इस परियोजना का लक्ष्य-समुदाय है मुलसी तालुके के चार गांवों के पाँच सौ किसान। जमीन की उत्पादकता को बढ़ाने के लिए परियोजना का जोर स्थानीय कौशल को नई तकनीक के इस्तेमाल के लायक बनाने पर है। डेयरी-विकास और सहकारिता आधारित प्रबंधन को जीविका के आकर्षक विकल्प के तौर पर बढ़ावा दिया जा रहा है। स्वच्छ उर्जा-उत्पादन के लिए बायोगैस के संयंत्र लगाये जा रहे हैं जिसमें पशुओं के अवशिष्ट का इस्तेमाल होता है।

विश्वनाथ की स्थिति पहले ऐसी नहीं थी। ज्यादा दिन नहीं हुए जब विश्वनाथ पुणे में ठेके के मजदूर के तौर पर जीविका कमाता था और रोजाना हद से हद 100 रुपये की मजदूरी हासिल होती थी। कमाई कम थी और परिवार की जरुरतों को देखने-भालने के लिए समय कम। लेकिन अब सूरत बदली है। विश्वनाथ का कहना है “ खेती से हो रही आमदनी के कारण रुपये-पैसे की समस्या सुलझ गई है। अब जीविका कमाने के लिए गांव से बाहर नहीं जाना पड़ता। ”
मुलसी तहसील पुणे जिले के सर्वाधिक गरीब इलाकों में एक है। परियोजना के कारण इस इलाके से पलायन की दर घटी है। विश्वनाथ जैसे कई किसान अब गांव में लौटने लगे हैं।


कैसे मिला खेतों को पानी

इलाके के ज्यादातर किसान वर्षाजल पर आधारित खेती करते हैं और सीमांत या छोटे किसान हैं। ये किसान उर्वरक के रुप में ज्यादातर यूरिया का इस्तेमाल कर रहे थे। इससे जमीन कठोर हो गई थी और उसकी उर्वरता में कमी आई थी। इलाकी पहाड़ी है, इसलिए भूगर्भी-जल का इस्तेमाल कठिन है।

लिफ्ट एरिगेशन की परियोजना से इस समस्या का समाधान हुआ। अब किसी ऊँचाई पर बने बाँध पर उच्चशक्ति के मोटरों के इस्तेमाल से पानी को खिंचा जाता है और पाईपों के सुव्यस्थित संजाल द्वारा खेतों में पानी पहुंचाया जाता है।

लाभार्थी किसान को इस सुविधा के लिए 40 रुपये प्रति घंटे के हिसाब से शुल्क चुकाना होता है। इससे मोटर चलाने वाली का वेतन निकल जाता है और सिंचाई की पूरी प्रणाली की देखभाल भी सुनिश्चित हो जाती है।

खतरखदक गांव में लिफ्ट एरिगेशन प्रणाली का प्रबंधन-संचालन गोसवी बाबा इरिगेशन कोऑपरेटिव सोसायटी के जिम्मे है। इस सोसायटी की अध्यक्षता एक कृषि-समिति के जिम्मे है। समिति हर पखवाड़े किसानों की समस्या पर विचार-विमर्श करने के लिए बैठक करती है।

बैठक की प्रकृति भागीदारी आधारित है और इसमें गांववाले खुद ही फैसला करते हैं। आईसीए के फील्ड ऑफिसर तानाजी नारायण मालपोटे समिति की मदद करते हैं ताकि समिति चार चरणों वाली धान की खेती तथा लिफ्ट एरिगेशन की सिंचाई तकनीक को सीख सकें।

दुध की धारा

30 वर्षीय संदीप खानेकर ने पॉलट्री और डेयरी-प्रबंधन के बारे में आईसीए की बैठक में तीन साल पहले कुछ इल्म हासिल किया था। उन्होंने शुरुआत तीन गायों को पालने से की। आज उनकी गोशाला में 40 गाये हैं और इससे उन्हें रोजाना 150 किलो दूध मिलता है। एक सफल डेयरी-किसान के रुप में संदीप अपने गांव खंबोली सहित आस-पास के इलाके में एक आदर्श किसान के रुप में प्रतिष्ठित हैं। वे अब आईसीए के साथ मिलकर दूसरे किसानों को ज्यादा ऊपज लेने के बारे में प्रेरणा जगाने का काम भी कर रहे हैं।

आईसीए की रहनुमाई में चल रहे दुध-व्यवसाय से 28 किसान जुड़े हैं। इन किसानों ने विट्ठल रुक्मिणी डेयरी सोसायटी बनायी है। यह सहकारी समिति रोजाना 468 लीटर दूध एकत्र करती है और उसे पुणे शहर के दुग्ध-वितरण केंद्रों पर बेचती है। ताजे दूध को दही, मक्खन, पनीर के रुप में बदला जाता है या फिर दूध के रुप में ही बेचा जाता है।


किसानों को हर पखवाड़े 25 रुपये प्रतिलीटर के हिसाब से भुगतान किया जाता है। इस तरह किसी किसान के पास रोजाना नौ लीटर दूध देने वाला पशुधन है तो उसे 6750 रुपये की मासिल आमदनी हो जाती है।

संदीप की उद्यमिता से कई लोगों को प्रेरणा मिली है- खतरखदक गांव के राहुल मालपोटे ऐसे ही एक किसान हैं। राहुल ने दुध एकत्र करने और उसके वितरण में सदीप की सहायता करने से अपनी शुरुआत की। आज उनके पास अपना खुद का डेयरी व्यवसाय है और वे इस व्यवसाय को उत्पादकता के अगले स्तर तक ले जाने के प्रयास में हैं।(राहुल की कहानी पढ़ने
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इस परियोजना का एक खास हिस्सा बायोगैस संयंत्र लगाना है। तहसील के हर गांव में 6-8 बायोगैस संयंत्र हैं। स्वच्छ उर्जा के उत्पादन को पशुपालन से जोड़कर इस परियोजना ने महिलाओं की रसोई की आदतों को बदलने में प्रमुख भूमिका निभायी है। महिलायें अब धुआंरहित चूल्हे का इस्तेमाल करने लगी हैं।

खेमसेबाड़ी गांव की डेयरी किसान 35 वर्षीया सविता खेमसे बायोगैस से फायदा उठाने वाली ऐसी ही महिलाओं में एक हैं। वे पशुधन के अवशिष्ट का इस्तेमाल बायोगैस बनाने में करती हैं और बायोगैस बनने के क्रम में जो अवशिष्ट बचता है उसका इस्तेमाल खेतों में करती हैं। इससे एक तरफ उन्हें खाद हासिल होता है तो दूसरी तरफ खाना पकाने में लगने वाला खर्च भी बचता है। ( सविता की कहानी पढ़ने क
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http://southasia.oneworld.net/fromthegrassroots/in-your-land-lie-riches


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