पौष्टिक अनाजों के साथ वृक्ष खेती - बाबा मायाराम

पौष्टिक अनाजों के साथ वृक्ष खेती - बाबा मायाराम

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published Published on Oct 30, 2020   modified Modified on Oct 30, 2020

बाबा मायाराम
मध्यप्रदेश के एक किसान ने वीरान पड़ी जमीन को न केवल हरा-भरा कर लिया बल्कि वह पौष्टिक अनाजों के मामले में आत्मनिर्भर हो गया है पूरी तरह जैविक फसलों के साथ सब्जियों व फलों का उत्पादन कर रहा है। इससे खाद्य सुरक्षा, जैव विविधता व पर्यावरण रक्षा भी हो रही है। उस आत्मनिर्भर किसान का नाम है महेश शर्मा।

छत्तीसगढ़ में लम्बे अरसे से रहने वाले महेश शर्मा ने उनके परिवार की वीरान पड़ी जमीन को उपजाऊ बनाने व खेती करने की ठानी। कम समय में ही उन्होंने न केवल पौष्टिक अनाजों की खेती की, बल्कि पूरे खेत में फलदार और छायादार पेड़ लगाए, वृक्ष खेती की। साथ ही खेत का पानी खेत में ही रोका। इसके लिए उन्होंने तालाब बनाय़ा।

महेश शर्मा, छत्तीसगढ़ में स्वास्थ्य के क्षेत्र में कार्यरत संस्था जन स्वास्थ्य सहयोग के कार्यकर्ता हैं। लेकिन इस खेत में खेती की उनकी निजी पहल है। उन्होंने 5 एकड़ खेत में तीन साल पहले खेती शुरू की।  पौष्टिक अनाजों की मिश्रित खेती व सब्जियां लगाईं। मड़िया, अरहर, तिल्ली, मूंगफली, अमाड़ी, धान आदि। सब्जियों में लौकी, करेला, सेमी, बरबटी, भिंडी, भटा इत्यादि।
महेश शर्मा ने बताया कि 5 एकड़ में से सिर्फ 2 एकड़ जमीन में ही खेती कर रहे हैं। पिछले साल की खेती में लागत करीब 15 हजार रूपए आई थी। जिसमें गोबर खाद, जुताई, बिजली खर्च, जैविक खाद बनाने का खर्च व बीज खर्च शामिल है। मजदूरी इसमें शामिल नहीं हैं, क्योंकि ज्यादातर काम वे स्वयं करते हैं। इससे पिछले साल आमदनी करीब 34 हजार रूपए की हुई। जिसमें धान, मडिया, धान, गेहूं, तिली और मूंगफली का उत्पादन शामिल है। हरी ताजी सब्जियां के साथ प्याज, लहसुन, केला, आलू शामिल हैं।

अपने खेत में बीडर चलाते महेश शर्मा, फोटो - बाबा मायाराम

मेड़ों पर बड़ी संख्या में फलदार व छायादार पेड़ लगाए। जिसमें अमरूद के 45 पेड़, नींबू के 4, आम के 11, सीताफल के 8, केले के 40, अनार के 5, महुआ के15, पपीता के 12 और  करौंदे के 20 पेड लगाएं हैं। सेमरा के 100 से ज्यादा पेड़ लगाकर खेत की बागुड़ कर दी। 

उनके पास दो कुएं हैं, जो सूख चुके थे, उन्हें फिर से पानीदार बनाया। इसके लिए उन्होंने खेत में छोटा तालाब बनाया, जिससे कुओं में झिर फूटी, पानी आया और खेतों की प्यास बुझी।
छत्तीसगढ़ में पानीदार संस्कृति है। वहां बहुत से तालाब हैं। वहां एक गांव में कई तालाब होते हैं और रतनपुर नाम के कस्बे में तो सौ से ज्यादा तालाब हैं। इससे महेश शर्मा ने सीखकर तालाब बनाया।

तालाब, फोटो - बाबा मायाराम

महेश शर्मा बताते हैं कि वे मनपसंद, स्वादिष्ट व पूरी तरह जैविक भोजन कर रहे हैं। गेहूं और चावल साल भर खरीदने की जरूरत नहीं पड़ी। राजगिरा, मिर्च, मैथी, धनिया, प्याज, आलू, टमाटर जैसी सब्जियां व मसाले अच्छे हुए। प्याज व लहसुन को पूरे साल भर खरीदने की जरूरत नहीं पड़ी।केले खाने मिल रहे हैं। बाजार पर निर्भरता खत्म हो गई है। सेमल के फल आने लगे हैं, जिसकी रूई से कोमल व मुलायम तकिए बनाए जा सकते हैं। वे थोड़ा ही बहुत है, के आदर्श पर चलते हैं।

खेत को उपजाऊ बनाने के लिए उन्होंने भूमि ढकाव ( मल्चिंग) की। यानी खेत में होने वाली फसलों के ठंडल, घास, टहनियां आदि को खेत में बिछा दिया जाता है, जिससे खेत में नमी बनी रहती है। मिट्टी में कई तरह के जीवाणु पैदा हो जाते हैं, जो जमीन को उर्वर बनाते हैं। केंचुए निस्वार्थ भाव से जमीन को बखरते रहते हैं। पोला, हवादार और भुरभुरा बनाते हैं, जो फसल के लिए बहुत जरूरी है। इसमें फसलों के ठंडलों व अवशेष को जलाने की जरूरत नहीं है, जिससे प्रदूषण की समस्या हो। 

मडिया और धान को उन्होंने मेडागास्कर पद्धति से लगाया। इस पद्धति में कम पानी लगता है और उत्पादन दोगुना तक लिया जा सकता है। इसमें समान दूरी पर पौधे लगाए जाते हैं और खेत में ज्यादा पानी होता है तो उसकी निकासी की जाती है। पानी में पौधा डूबे रहने से उसकी बढ़वार ठीक से नहीं होती है और पौधे की जड़ें सड़ जाती हैं।

सभी फसलों के देसी बीजों का इस्तेमाल करते हैं। देसी बीजों में मिट्टी पानी के अनुकूल ढलने की क्षमता होती है। देसी बीज स्थानीय मिट्टी में पले बढ़े होते हैं। उनके साथ टिकाऊपन व आत्मनिर्भरता जुड़ी होती है। किसान का खुद का बीज, खुद का खाद, खुद का जैव कीटनाशक।

कुल मिलाकर, महेश शर्मा की खेती के बारे में कुछ बातें कही जा सकती हैं। एक जैविक खेती से मनपसंद, पौष्टिक व स्वादिष्ट भोजन मिल रहा है, जिसमें ताजी सब्जियां व फल शामिल हैं। बिना रासायनिक और बिना जहरीले कीटनाशकों के भी खेती संभव है। ऐसी खेती से परंपरागत देसी बीज, जो लुप्त होते जा रहे हैं, उनका संरक्षण- संवर्धन भी होता है। वृक्ष खेती कर उन्होंने अनाज के साथ फलों के खाने पर जोर दिया है, जो पोषक तत्वों के लिए जरूरी है। तालाब या डबरी बनाकर खेत में ही पानी का प्रबंधन किया है। 

यही सोच स्वावलंबी व टिकाऊ खेती की है. इसमेंखर्च बिलकुल नहीं है, जिससे किसान की लागत कम होती है, उसे किसी भी तरह का कर्ज नहीं लेना पड़ता। न रासायनिक खाद न ही कीटनाशक की जरूरत पड़ती। पूरी तरह जैविक खेती। अमृत पानी व जैव खाद के जरिए, गोमूत्र व गुड़ से जैव कीटनाशक तैयार किए जाते हैं, और इसी से फसलें पककर तैयार हो जाती हैं। ऐसी खेती आज जैविक व टिकाऊपन में भरोसा पैदा करती है, जो न केवल लोगों को भोजन दे सकती है बल्कि स्वादिष्ट पौष्टिक भोजन दे सकती है। जलवायु बदलाव में देसी बीज और मिट्टी-पानी के संरक्षणवाली खेती जरूरी हो गई है।


बाबा मायाराम


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