अन्य नीतिगत पहल

अन्य नीतिगत पहल

Share this article Share this article

 

लोकपाल विधेयक- मुख्य बातें

 

इस विधेयक को लोक सभा में 4 अगस्त 2011 को मिनिस्ट्री आफ पर्सनल, पब्लिक ग्रीवान्स, एण्ड पैन्शन ने पेश किया।इसे पर्सनल, पब्लिक ग्रीवान्स लाॅ एण्ड जस्टिस स्टैन्डिंग कमेटी (अध्यक्षः अभिषेक मनु सिंघवी) के पास विचार के लिए भेजा गया । इसे अपनी रिपोर्ट 7, दिसंबर 2011 तक देनी है ।

 

यह विधेयक भ्रष्टाचार के मामलों की जाँच करने व दण्ड देने के लिये लोकपाल की स्थापना करता है।

 

लोकपाल के अधिकार क्षेत्र में प्रधान-मंत्री (कार्यभार से मुक्त हो जाने के बाद), मंत्री, संसद सदस्य, ग्रुप ए अफसर, व सरकारी अनुदान पर या दान के पैसे पर काम करने वाली संस्थाओं के अधिकारी आने चाहिए।

 

कोई भी व्यक्ति किसी सार्वजनिक कर्मचारी के विरूद्ध शिकायत लगा सकता है। यह शिकायत अपराध करने के सात वर्षो के भीतर की जानी चाहिए। इस विधेयक में जाँच व छानबीन की प्रकिया दी गयी है।

 

यदि लोक पाल यह पाता है कि अपराध किया गया है तो वह अनुशासनात्मक कार्यवाही किये जाने की सिफारिश कर सकता है व विशेष अदालतों में मुकदमा दर्ज कर सकता है।

 

यह विधेयक कुछ अपराधों के लिये भ्रष्टाचार निरोधक कानून, 1988 के अनुसार सात साल की सजा को बढ़ा कर दस साल करता है। झूठी और निराधार शिकायतों के लिये इसमें दण्ड का प्रावधान भी किया गया है।

 

लोकपाल के सभी ख़र्चो का वहन भारत की संचित निधि मंे से किया जाना चाहिए।

 

मुख्य मुद्दे और उनका विश्लेषण

 

मौजूदा स्थिति में ग्रुप ए अफसर क¢न्द्रीय सतर्कता आयोग (सी.वी.सी.) के अधिकार क्षेत्र में आते हैं। लोकपाल भी ग्रुप ए अफसरों की जाँच एवं छानबीन करेगा। अतः ग्रुप ए अफसरों के ऊपर जाँच पड़ताल का दोतरफा अधिकार क्षेत्र होगा।

 

विधेयक लोकपाल के अन्तर्गत एक जाँच पड़ताल का शाखा (विंग) बनाता है। पहले की स्टैन्डिंग कमेटी ने इस प्रकार की एक अतिरिक्त जाँच पड़ताल शाखा बनाये जाने का विरोध किया है।

 

यह विधेयक सार्वजनिक कर्मचारी (पब्लिक सर्वैन्ट) की व्याख्या बढाता है और कुछ ग़ैर सरकारी व्यक्तियों को भी इसमें शामिल करता है। यह अन्य कानूनों मे दिये गये प्रावधानों से भिन्न है।

 

इस के अन्तर्गत छानबीन और अभियोग की कार्यप्रणाली में कुछ कमियां है। किसी मामले में अपराध के लिये उकसाने वाले किसी ग़ैर सरकारी व्यक्ति के विरूद्ध लोकपाल अभियोग नही लगा सकता। सात वर्ष की समय सीमा होने से दो टर्म में रहे प्रधान मंत्री के कार्यकाल के आंरभिक वर्षो की छानबीन नही की जा सकती।

 

झूठी शिकायतों के लिये निधार्रित दण्ड की व्यवस्था इसी प्रकार के अन्य कानूनो में दिये गये प्रावधानों से भिन्न है।

 

विशेष जानकारी के लिए निम्नलिखित लिंक देखें- http://www.prsindia.org/uploads/media/Lok%20Pal%20Bill%202011/Lokpal_Legislative_Brief_Hindi.pdf

 

 


Rural Expert


Related Articles

 

Write Comments

Your email address will not be published. Required fields are marked *

*

Video Archives

Archives

share on Facebook
Twitter
RSS
Feedback
Read Later

Contact Form

Please enter security code
      Close