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What's Inside

संयुक्त राष्ट्र जनसंख्या कोष द्वारा प्रकाशित, [inside]अगेंस्ट माय विल – डिफाइंग द प्रैक्टिसिस दैट हार्म वीमैन एंड गर्ल्स एंड अंडरमाइन इक्वॉलिटी (जून 2020 में जारी)[/inside] नामक रिपोर्ट के प्रमुख निष्कर्ष इस प्रकार हैं, (देखने के लिए यहां क्लिक करें.)

• नई जारी की गई यूएनएफपीए रिपोर्ट इस बात पर केंद्रित है कि दुनिया भर में महिलाओं और लड़कियों के साथ कैसा व्यवहार किया जाता है और वे उन हानिकारक प्रथाओं से कैसे प्रभावित हैं, जो उनको शारीरिक और भावनात्मक रूप से नुकसान पहुंचाकर विभिन्न क्षेत्रों में पहले से मौजूद विकट परिस्थितियों को और अधिक दुर्गम बना देती हैं.

• रिपोर्ट में मुख्य रूप से तीन हानिकारक प्रथाओं को शामिल किया गया है, जोकि महिला जननांग खतना, बाल विवाह और परिवार में बेटियों की जगह बेटों को तवज्जो. आमतौर पर धर्म और संस्कृति के नाम पर जो लिंग-आधारित भेदभाव महिलाओं पर थोपे जाते हैं, उनकी वजह से महिलाओं की सुरक्षा और समानता के बुनियादी अधिकारों की ही नहीं बल्कि उनके स्वास्थ्य संबंधी देखभाल तक की अनदेखी होती है.

• इस रिपोर्ट में बताया गया है कि 1994 में जनसंख्या और विकास पर अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन (ICPD) में विश्व सरकारों ने महिला यौन और प्रजनन स्वास्थ्य के लिए आह्वान किया और निर्णायक रूप से हानिकारक प्रथाओं को समाप्त करने की मांग की.

• भारत में, लड़की पर लड़के की प्राथमिकता और बाल विवाह सबसे बड़ी सामाजिक चुनौतियों में से हैं जो पहले भी मौजूद थीं और आज भी जारी हैं.

बाल विवाह

• 2017 में, पूरे दक्षिण एशियाई क्षेत्र में प्रत्येक वर्ष बाल विवाह की संख्या सबसे अधिक थी, जोकि अनुमानित 41 लाख थी.

• 2005-2019 की अवधि के दौरान 18 वर्ष से कम उम्र की विवाहित लड़कियों के अनुपात के संदर्भ में, सबसे खराब स्थिति बांग्लादेश (59 प्रतिशत) में पाई गई, उसके बाद नेपाल (40 प्रतिशत), भारत (27 प्रतिशत), भूटान ( 26 प्रतिशत), पाकिस्तान (18 प्रतिशत), श्रीलंका (10 प्रतिशत) और मालदीव (2 प्रतिशत) का नंबर था.

• लड़कियों के बाल विवाह उनके परिवार की अत्यधिक दयनीय स्थिति के परिणामस्वरूप होते हैं. गरीबी, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा की असमान पहुंच और रोजगार के अवसरों से वंचित होने के कारण इन लड़कियों के गरीब माता-पिता अपनी बेटियों की कम उम्र में शादी करने के लिए मजबूर हो जाते हैं. इसके अलावा, पितृसत्तात्मक समाजों में महिलाओं के साथ होने वाले भेदभाव, जिसमें कि एक लड़की के कौमार्य (वर्जिनिटी) और उसकी कामुकता को "अक्षुण्ण" बनाए रखने से जुड़े भय को बहुत अधिक महत्व दिया जाता है, जोकि दक्षिण एशिया के अधिकांश हिस्सों और विशेष रूप से भारत में बाल विवाह में एक बड़ी भूमिका निभाता है.

• 2019 में यूनिसेफ द्वारा किए गए अध्ययन के अनुसार, देश में 18 साल से कम उम्र की विवाहित लड़कियों में 51 प्रतिशत लड़कियों को किसी तरह की औपचारिक शिक्षा नहीं मिली थी, 47 प्रतिशत लड़कियों को प्राथमिक शिक्षा, 29 प्रतिशत लड़कियों को माध्यमिक और केवल 4 प्रतिशत लड़कियों को ही माध्यमिक शिक्षा से अधिक पढ़ने दिया गया थी.

• वर्ल्ड बैंक के विश्व विकास संकेतक के बाल विवाह के आंकड़ों से पता चलता है कि देश में 18 वर्ष से कम उम्र की 46 प्रतिशत विवाहित लड़कियां सबसे कम आय वर्ग से थीं.

• भारतीय समाज में दहेज प्रथा के नाम पर दो प्रथाएं चलती हैं, जिनमें लड़की के माता-पिता, अपनी बेटी के रखरखाव के एवज में दूल्हे को भुगतान करते हैं, और लड़के के घरवाले, दुल्हन को "खरीदने" के लिए दूल्हन के परिवार को भुगतान करते हैं.

• प्रारंभिक गर्भावस्था और बच्चे के जन्म से मातृ मृत्यु और बच्चे के खराब स्वास्थ्य का खतरा बढ़ जाता है, इसके अलावा माता और बच्चे दोनों के बीच पोषण का स्तर कम होता है.

• भारत में, 18 वर्ष से कम उम्र की विवाहित महिलाओं में से, 60 प्रतिशत महिलाओं ने 18 वर्ष की उम्र से पहले और 20 वर्ष की उम्र से कम 79 प्रतिशत महिलाओं ने बच्चे को जन्म दिया था.

• साल 2017 में दक्षिण एशिया में, मातृ मृत्यु दर अफगानिस्तान (638) में सबसे अधिक थी, उसके बाद नेपाल (186), भूटान (183), बांग्लादेश (173), भारत (145), पाकिस्तान (140), मालदीव (53), श्रीलंका (36) और चीन (29) में थी. एक निश्चित समयावधि के दौरान प्रति 100,000 जीवित शिशुओं के जन्म पर मातृ मृत्यु की संख्या मातृ मृत्यु अनुपात कहलाता है.

• अध्ययन से पता चलता है कि भारत में आंध्र प्रदेश, बिहार, झारखंड , महाराष्ट्र और राजस्थान में बाल विवाह अत्यधिक प्रचलित है. वहां 18 वर्ष से कम उम्र की विवाहित महिलाओं को अक्सर लिंग आधारित हिंसा का सामना करना पड़ता है. 18 साल से ज्यादा उम्र की 17 प्रतिशत विवाहित महिलाओं की तुलना में 18 वर्ष से कम उम्र की विवाहित एक-तिहाई महिलाओं (यानी 32 प्रतिशत) को उनके पति द्वारा की गई शारीरिक हिंसा का सामना करना पड़ता है.

• महिलाओं के सशक्तीकरण और भलाई के लिए सतत विकास लक्ष्यों में 2030 तक बाल विवाह को खत्म करने के लक्ष्य को पूरा करने के लिए, सभी देशों को विभिन्न अन्य पहलों और कार्यक्रमों पर दस वर्षों में $ 35 बिलियन डॉलर खर्च करने की आवश्यकता है.

बेटे की चाह

• भारतीय समाज में प्रचलित बेटे की चाहत महिलाओं, लड़कियों और बेटियों के प्रति नकारात्मक भाव पैदा करती है, और यह लैंगिक असमानता को जन्म देती है. हमारे समाज में कई कुप्रथाएँ मौजूद हैं जो लैंगिक भेदभाव को दर्शाती हैं, जैसे कन्या भ्रूण का गर्भपात, लड़कियों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा से वंचित रखना और लड़कियों के लिए स्तनपान का समय कम होना, जिससे अधिकांश लड़कियों का पोषण स्तर और स्वास्थ्य कमजोर होता है. लिंग आधारित भेदभावपूर्ण प्रथाओं के परिणामस्वरूप लड़कियों को लड़कों की तुलना में अधिक मृत्यु दर का सामना करना पड़ता है.  

• साल 2017 में पूरे दक्षिण एशिया में, जन्म के समय लिंग अनुपात सबसे खराब चीन में (1.143), उसके बाद भारत (1.098), नेपाल (1.073), मालदीव (1.066), पाकिस्तान (1.064), अफगानिस्तान (1.059), बांग्लादेश (1.055), भूटान (1.051) और श्रीलंका (1.039) में रहा. जन्म के समय लड़कों के जन्म पर प्रति लड़की जन्म को लिंग अनुपात कहते हैं.

• अफगानिस्तान, बांग्लादेश, चीन, नेपाल और पाकिस्तान जैसे देशों की तुलना में, भारत में 2012 में प्रति 1,000 महिला जन्मों में 13.5 महिलाओं की मृत्यु की दर सबसे अधिक थी, जो इंगित करती है कि अनुमानित 5 साल आयु की नौ में से एक लड़की की मौत के लिए प्रसवोत्तर लिंग चयन को जिम्मेदार ठहराया जा सकता है.

• 2013 और 2017 के बीच, देश में लगभग 4.6 लाख लड़कियां हर साल जन्म से पहले ही “कम” हो गई थीं, यानी उन्हें जन्म लेने ही नहीं दिया गया. एक विश्लेषण से पता चलता है कि लिंग-पक्षपाती सेक्स चयन के कारण जन्म से पहले ही “कम” हो गईं लड़कियां लगभग दो-तिहाई और जन्म के बाद महिला मृत्यु दर लगभग एक-तिहाई है.

• चीन और भारत में दुनिया की सबसे अधिक जन्म से पहले ही “कम” हो गईं लड़कियां थीं, जो कि जन्म से पहले ही “कम” हो गईं 12 लाख लड़कियों के सालाना जन्म का लगभग 95.7 प्रतिशत है (पांच साल की अवधि 2013-2017 की औसत).

• एक अध्ययन से पता चलता है कि लिंग-पक्षपाती (प्रसवपूर्व) लिंग चयन के कारण चीन और भारत ने मिलकर दुनिया भर में अनुमानित 12 लाख से 15 लाख जन्म से पहले ही “कम” हो गईं महिला जन्मों में से लगभग 90 प्रतिशत से 95 प्रतिशत का अनुमान लगाया है.

• 2020 में, लड़कों की संख्या के मुकाबले लड़कियों की ‘कमी’ की वैश्विक ("14.26 करोड़") संख्या की तुलना में चीन और भारत में यह संख्या क्रमशः लगभग 50.7 प्रतिशत (7.23 करोड़) और 32.1 प्रतिशत (4.58 करोड़) थी. प्रसव के बाद (जन्म के बाद) और प्रसवपूर्व (जन्म से पहले, यानी गर्भावस्था के दौरान) सेक्स चयन के कारण आबादी में लड़कियां “कम” हो जाती हैं. लिंग-पक्षपाती (प्रसवपूर्व) लिंग चयन जन्म के समय लिंगानुपात के असंतुलन को दर्शाता है.

• 2020 में, कुल अतिरिक्त महिला मृत्यु (17.1 लाख) की वैश्विक संख्या के मुकाबले चीन और भारत में अतिरिक्त महिला मृत्यु लगभग 36.3 प्रतिशत (6.2 लाख) और 21.1 प्रतिशत (3.6 लाख) थी. प्रसव के बाद के लिंग चयन से होने वाली महिला मौतों की संख्या को अतिरिक्त महिला मृत्यु कहा जाता है.  

• 2020 में, जन्म के समय लड़कियों की कमी की कुल वैश्विक (15 लाख) संख्या के मुकाबले चीन और भारत में लगभग 48.7 प्रतिशत (7.3 लाख) और 39.3 प्रतिशत (5.9 लाख) है. यानी लिंग-पक्षपात के कारण लड़कियों को जन्म लेने ही नहीं दिया गया.

• राष्ट्रीय औसत स्पष्ट रूप से जन्म के समय घटे हुए लिंग अनुपात का डेटा देश के विशिष्ट क्षेत्रों के हिसाब से उपलब्ध नहीं है. जन्म के समय लिंग अनुपात में बदलाव का डेटा ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों या देश के दक्षिणी और उत्तरी हिस्सों के रूप में उपलब्ध है.

• भारत में, जन्म के समय लिंग अनुपात आम तौर पर ग्रामीण क्षेत्रों के मुकाबले शहरी में अधिक है.

• हालांकि लिंग-पक्षपाती लिंग चयन शुरू में धनी वर्गों के बीच उच्चतर होता है, और समय के साथ-साथ निम्न-आय वाले परिवारों में भी प्रचलित हो जाता है, क्योंकि लिंग जांच करवाने की सुविधा देने वाली प्रौद्योगिकियां अक्सर अधिक सुलभ और सस्ती हो जाती हैं.

• भारत में बेटे की प्राथमिकता से लिंगानुपात में भारी बदलाव आया है, यानी महिलाओं की तुलना में अधिक पुरुष हैं. इस जनसांख्यिकीय असंतुलन का देश में विवाह प्रणालियों पर अपरिहार्य प्रभाव पड़ता है. उल्लेखनीय है कि 35 वर्ष से कम आयु के पुरुष जनसंख्या 35 वर्ष से कम आयु की महिला जनसंख्या से 11 प्रतिशत अधिक है.

• उपर्युक्त जनसांख्यिकीय असंतुलन समाज में वैवाहिक असंतुलन पैदा कर देता है, जिससे की भावी दूल्हनों के मुकाबले भावी दुल्हों की संख्या अधिक होती है. जिसके परिणामस्वरूप, कई पुरुष पूरी तरह शादी से वंचित या देरी से शादी कर पाते हैं. लिंगानुपात असंतुलन के परिणामस्वरूप बाल विवाहों में भी बढ़ोतरी होती है.

अन्य संकेतक

• वर्ष 2020 के लिए, जन्म के समय जीवन प्रत्याशा मालदीव (79 वर्ष) में सबसे अधिक होने का अनुमान है, इसके बाद चीन और श्रीलंका (77 वर्ष), बांग्लादेश (73 वर्ष), भूटान (72 वर्ष), नेपाल (71 वर्ष)  भारत (70 वर्ष), पाकिस्तान (67 वर्ष) और अफगानिस्तान (65 वर्ष) है. जीवन प्रत्याशा दर एक दी गयी उम्र के बाद जीवन में शेष बचे वर्षों की औसत संख्या है. व्यक्ति के औसत जीवनकाल के अनुमान को जीवन प्रत्याशा के रूप में परिभाषित किया गया है.

• 2014-2019 की अवधि के दौरान, भारत में लगभग 81 प्रतिशत नवजातों का जन्म कुशल स्वास्थ्य कर्मियों (यानी डॉक्टर, नर्स या दाई) की देखरेख में हुआ.

• 2014-2019 के दौरान, कुशल स्वास्थ्य कर्मियों की देखरेख में नवजातों के जन्म लेने के मामले में अफगानिस्तान (59 प्रतिशत), पाकिस्तान (69 प्रतिशत), नेपाल (58 प्रतिशत), म्यांमार (60 प्रतिशत) और बांग्लादेश (53 प्रतिशत)  जैसे दक्षिण एशियाई देश भारत से बदत्तर स्थिति में थे. इसके विपरीत, चीन (100 प्रतिशत), श्रीलंका (100 प्रतिशत), मालदीव (100 प्रतिशत) और भूटान (96 प्रतिशत) भारत के मुकाबले बेहतर रहे.

• 2019 में, यौन और प्रजनन स्वास्थ्य देखभाल, सूचना और शिक्षा तक पहुंच की गारंटी देने वाले कानूनों और विनियमों का प्रतिशत पूरी दुनिया के लिए 73 प्रतिशत था, जबकि वही अधिक विकसित क्षेत्रों के लिए 84 प्रतिशत था, कम विकसित देशों के लिए 69 प्रतिशत, और सबसे कम विकसित देशों के लिए 71 प्रतिशत था.

• 2019 के दौरान, यौन और प्रजनन स्वास्थ्य देखभाल, सूचना और शिक्षा तक पहुंच की गारंटी देने वाले कानूनों और विनियमों के संदर्भ में सबसे कम विकसित देशों (71 प्रतिशत) के वैश्विक आंकड़ों की तुलना में, अफगानिस्तान (54 प्रतिशत), मालदीव (45 प्रतिशत), नेपाल (48 प्रतिशत) और पाकिस्तान (65 प्रतिशत) का प्रदर्शन अपेक्षाकृत खराब था. हालांकि, श्रीलंका (89 प्रतिशत) और म्यांमार (82 प्रतिशत) ने अपेक्षाकृत कम विकसित देशों की तुलना में बेहतर प्रदर्शन किया.

• 2003-2018 की अवधि के दौरान, भारत में किशोर जन्म दर 11 वर्ष थी. इसी अवधि के दौरान, दक्षिण एशियाई देशों, जैसे श्रीलंका (21), अफगानिस्तान (62), पाकिस्तान (46), नेपाल (88), म्यांमार (28), भूटान (28), और बांग्लादेश (74) में भारत की तुलना में किशोर जन्म दर अधिक थी. मालदीव और चीन (दोंनो में 9) में भारत की तुलना में किशोर जन्म दर कम थी. किशोर जन्म दर 15-19 वर्ष की आयु की प्रति 1,000 लड़कियों पर जन्म की संख्या है.

• 2020 में, दुनिया में किशोर जन्म दर 41 होने का अनुमान है. सबसे कम विकसित देशों में, किशोर जन्म दर 91 है, जबकि कम विकसित क्षेत्रों में 45 और अधिक विकसित क्षेत्रों में 12 है.

• 2009-2019 के दौरान, भूटान में प्राथमिक शिक्षा में दाखिल लड़कों की शुद्ध नामांकन दर 89 प्रतिशत, भारत 97 प्रतिशत, मालदीव 94 प्रतिशत, म्यांमार 90 प्रतिशत, पाकिस्तान 74 प्रतिशत और श्रीलंका 98 प्रतिशत थी. प्राथमिक शिक्षा में दाखिल शुद्ध नामांकन दर का अर्थ है आधिकारिक प्राथमिक आयु वर्ग के बच्चों का अनुपात जो प्राथमिक या माध्यमिक शिक्षा में नामांकित हैं.

• 2009-2019 के दौरान, भूटान में प्राथमिक शिक्षा में दाखिल लड़कियों की शुद्ध नामांकन दर 91 प्रतिशत, भारत 99 प्रतिशत, मालदीव 96 प्रतिशत, म्यांमार 88 प्रतिशत, पाकिस्तान 62 प्रतिशत और श्रीलंका में 97 प्रतिशत थी.

• 2018 में विश्व स्तर पर, प्राथमिक शिक्षा में दाखिल शुद्ध नामांकन दर लड़कों के लिए 91 प्रतिशत और लड़कियों के लिए 89 प्रतिशत थी.

• 2009-2019 की अवधि के दौरान, भारत, भूटान और मालदीव (1.02 प्रत्येक) में 1.0 से ऊपर की प्राथमिक शिक्षा में जेंडर समानता सूचकांक (जीपीआई) था. 2009-2019 में प्राथमिक शिक्षा में जीपीआई पाकिस्तान (0.84), म्यांमार (0.99) और श्रीलंका (0.98) के लिए 1.0 से नीचे था. प्राथमिक शिक्षा में जेंडर समानता सूचकांक समायोजित प्राथमिक विद्यालय शुद्ध नामांकन अनुपात के महिला-पुरुष संख्या का अनुपात है. 0 और 1 के बीच जीपीआई पुरुषों के पक्ष में असमानता इंगित करता है, जबकि 1 से अधिक जीपीआई महिलाओं के पक्ष में असमानता को इंगित करता है.

• 2018 में, प्राथमिक शिक्षा के लिए जेंडर समानता सूचकांकपूरी दुनिया के लिए 0.98 था, जबकि अधिक विकसित क्षेत्रों के लिए 1.00 का अनुमान था, कम विकसित क्षेत्रों के लिए 0.97 और कम विकसित देशों के लिए 0.95 था.

• 2009-2019 की अवधि में अफगानिस्तान में माध्यमिक शिक्षा में दाखिल लड़कों की शुद्ध नामांकन दर 63 प्रतिशत, बांग्लादेश 61 प्रतिशत, भूटान 64 प्रतिशत, भारत 61 प्रतिशत, म्यांमार 61 प्रतिशत, नेपाल 61 प्रतिशत, पाकिस्तान 40 प्रतिशत और श्रीलंका में 90 प्रतिशत थी. माध्यमिक शिक्षा में शुद्ध नामांकन अनुपात का अर्थ है आधिकारिक माध्यमिक आयु वर्ग के बच्चों का अनुपात जो माध्यमिक शिक्षा में नामांकित हैं.

•2009-2019 की अवधि में अफगानिस्तान में माध्यमिक शिक्षा में दाखिल लड़कियों की शुद्ध नामांकन दर 37 प्रतिशत, बांग्लादेश 72 प्रतिशत, भूटान 77 प्रतिशत, भारत 62 प्रतिशत, म्यांमार 67 प्रतिशत, नेपाल 63 प्रतिशत, पाकिस्तान 34 प्रतिशत और श्रीलंका में 92 प्रतिशत थी.

• 2018 में, विश्व स्तर पर पुरुषों और महिलाओं दोनों के लिए माध्यमिक शिक्षा में शुद्ध नामांकन दर 66 प्रतिशत थी.

• 2009-2019 की अवधि के दौरान, माध्यमिक शिक्षा में भारत (1.02), बांग्लादेश (1.18), भूटान (1.19), नेपाल (1.03), म्यांमार (1.08), और श्रीलंका (1.03) में जेंडर समानता सूचकांक (GPI) 1.0  से ऊपर था. 2009-2019 में माध्यमिक शिक्षा में GPI अफगानिस्तान (0.58) और पाकिस्तान (0.85) के लिए 1.0 से नीचे था. माध्यमिक शिक्षा में जेंडर समानता सूचकांक, माध्यमिक विद्यालय में दाखिल लड़के-लड़कियों की संख्या का अनुपात है.

• 2018 में, माध्यमिक शिक्षा के लिए जेंडर समानता सूचकांक पूरी दुनिया के लिए 1.00 था, जबकि कम से कम विकसित देशों के लिए समान 0.89 था, कम विकसित क्षेत्रों में 1.00 था और अधिक विकसित क्षेत्रों में 1.01 था.

• 2020 में, प्रति महिला कुल प्रजनन दर (TFR) अफगानिस्तान के लिए 4.2, बांग्लादेश के लिए 2.0, भूटान के लिए 1.9, चीन के लिए 1.7, भारत के लिए 2.2, मालदीव के लिए 1.8, म्यांमार के लिए 2.1, नेपाल के लिए 1.8, पाकिस्तान के लिए 3.4 और श्रीलंका के लिए 2.2 है.

• 2020 में वैश्विक स्तर पर प्रति महिला कुल प्रजनन दर 2.4 आंकी गई है.

[सखी अरुण जगदाले और मेघना म्याडम, जो टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज, हैदराबाद से डेवलपमेंट स्टडीज (प्रथम वर्ष) में एमए कर रहे हैं. इन दोनों ने इस रिपोर्ट का सारांश तैयार करने में इनक्लूसिव मीडिया फॉर चेंज की मदद की. सखी अरुण और मेघना ने जुलाई 2020 में इनक्लूसिव मीडिया फॉर चेंज प्रोजेक्ट में अपनी इंटर्नशिप के दौरान यह काम किया है.]


 

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