जेंडर

जेंडर

Share this article Share this article

What's Inside

 " द लॉ एंड सन प्रीफेरेंस इन इंडिया: अ रियलिटी चेक - " कीर्ति सिंह, (संयुक्त राष्ट्र संघ, नवंबर 2013) नामक दस्तावेज के अनुसार

http://www.un.org.in/img/uploads/5_Laws_and_Son_Preference
_in_India.pdf
:

 

  • भारत में बाल-विवाह, दहेजप्रथा और प्रसव पूर्व बच्चे के लिंग परीक्षण को रोकने के लिए बनाये गये कानूनों पर अमल ढीले-ढ़ाले तरीके से होता है। कुछ कानून बेटियों और विधवाओं को भू-अधिकार देने के मामले में बाधक हैं। कुछ कानूनों बेटी की जगह बेटे को वरियता देते हैं।

 

  • भारतीय महिलाओं की आर्थिक स्थिति बड़ी कमजोर है।भारत में कानून और सरकारी नीतियों में यह नहीं स्वीकार किया जाता है कि महिलाओं का घरेलू कार्य उत्पादक है और इस कारण इसका कोई आर्थिक मोल है।

 

  • महिला एवं बाल-विकास मंत्रालय द्वारा प्रस्तुत " स्टडी ऑन चाइल्ड एब्यूज : इंडिया" नामक अध्ययन में कहा गया है कि बहुसंख्यक लड़कियों(70.57%) को अपने परिवार के हाथो एक ना एक किस्म की उपेक्षा का शिकार होना पड़ता है;  कुछ लड़कियों की आधी तदाद (48.4%) का कहना है कि वे एक ना एक दफे यह जरुर सोचती हैं कि काश ! लड़का होते ; ज्यादातर लड़कियों (70.38%) ने कहा कि बर्तन-बासन, झाड़ू-पोंछा और पानी भरने सरीखे काम उन्हें अपने भाइयों की अपेक्षा ज्यादा करना पड़ता है; तकरीबन 49 फीसदी लड़कियों का कहना था कि उन्हें अपने से छोटे भाई-बहनों की देखभाल करनी पड़ती है ; अपने भाइयों की तुलना में कम भोजन हासिल करने वाली लड़कियो की तदाद 27.33 फीसदी थी। उत्तरप्रदेश, गुजरात और बिहार में ऐसी लड़कियों की संख्या क्रमश 69.04 फीसदी, 67.83 फीसदी और 65.63 फीसदी पायी गई।

 

  • लैंगिक भेदभाव के कारण भारत में बाल लैंगिक अनुपात(इसकी गणना में यह देखा जाता है कि 0-6 आयु-वर्ग में प्रति हजार लड़कों की तुलना में लड़कियों की संख्या कितनी है) कम है। साल 2011 की जनगणना में बाल लैंगिक अनुपात 919 बतायी गई है जो साल 2001 के बाल लैंगिक अनुपात(927) से कम है।
  • नेशनल क्राइम रिकार्ड ब्यूरो के आंकड़ों से स्पष्ट है कि महिलाओं और लड़कियों के विरुद्ध हिंसा की घटनाएं बढ़वार पर हैं। आंकड़े बताते हैं कि साल 2005 से अबतक महिलाओं के विरुद्ध हिंसा की घटनाओं में 31.02 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है। नेशनल क्राइम रिकार्ड ब्यूरो के आंकड़ों के अनुसार महिलाओं पर होने वाली हिंसा की घटनाओं में बलात्कार की घटनाएं 10.6 फीसदी हैं। सबसे दर्दनाक बात यह है कि बलात्कार का शिकार होने वाली महिलाओं में 10.6 फीसदी की उम्र 14 साल से भी कम है जबकि बलात्कार का शिकार हुई महिलाओं में 14-18 साल की उम्र की महिलाओं की संख्या 19 प्रतिशत और 18-30 साल की महिलाओं की संख्या 54.7 प्रतिशत है। दुराचार करने वालों में 94 प्रतिशत लोग महिलाओं की जान-पहचान के थे। साल 2011 में छेड़खानी के कुल 42,968 मामले दर्ज किए गए जबकि यौन-दुर्व्यवहार के 8750 मामले। महिलाओं के विरुद्ध होने वाले अपराधों में सालाना 9.2 फीसदी की बढ़ोतरी हो रही है।

 

  • प्रीकनसेप्शन एंड प्री-नॉटल डायग्नॉस्टिक टेक्नीक्स (प्रॉबिहिशन ऑफ सेक्स सलेक्शन) एक्ट 1994 जिसे संक्षेप में पीसीपीएनडीटी एक्ट कहा जाता है- इस उद्देश्य के साथ लागू किया गया था कि लोग बच्चे के जन्म से पूर्व भ्रूणावस्था में उसके लिंग का परीक्षण ना करवा सकें। मंशा यह थी कि इस अधिनियम के कारण कोई भी व्यक्ति कन्या-शिशु की भ्रूणावस्था में हत्या ना कर सकेगा और लैंगिक भेदभाव भरे जन्म की समस्या से मुक्ति मिल सकेगी। लेकिन कानून बनने के बाद ना को केंद्रीय स्तर पर और ना ही राज्य स्तर पर इसका क्रियान्वयन कारगर तरीके से हो पाया है। कुछ राज्य तो ऐसे हैं जहां हाल-हाल तक इस कानून के लागू होने की अधिसूचना जारी नहीं हुई थी। एक मामला ऐसा भी देखने में आया जब दोषी पर कार्रवाई इसलिए नहीं की जा सकी क्योंकि राजपत्र में अधिनियम की अधिघोषणा प्रकाशित नहीं की गई थी। पीसीपीएनडीटी एक्ट में कहा गया है कि क्लिनिक, काउंसेलिंग सेंटर और लैबोरेट्ररी विधिवत पंजी और रिकार्ड रखेंगे लेकिन अधिकतर मामलों में इस विधान का पालन नहीं हो पाया है।

 

  • भारत में दहेज से संबंधित अपराध भयावह ढंग से बढ़ रहे हैं और महिलाओं के विरुद्ध होने वाले कुल अपराधों में दहेज के कारण होने वाले अपराधों की संख्या 42 प्रतिशत है। दहेजरोधी डॉवरी प्रोहिबिशन एक्ट में साल 1981, 1983 तथा 1986 में अत्यंत महत्वूर्ण और दूरगामी प्रभाव वाले परिवर्तन किए गए। इसके अतिरिक्त महिलाओं के साथ किए जाने वाले क्रूर व्यवहारतथा दहेज-हत्या जैसे विषय भारतीय दंड विधान में शामिल किए गए, साथ ही एविडेंस एक्ट में भी बदलाव किया गया। बहरहाल, कानून के क्रियान्वयन में कमी की वजह से इसका खास प्रभाव नहीं हो सका है। और वह भी तब, जबकि कानून की मौजूदगी के कारण बड़ी संख्या में केस दर्ज हो रहे हैं। दहेज-प्रताड़ना या फिर दहेज-हत्या जैसे मामले में पुलिस पक्षपाती रवैया अपनाती है। इस वजह से दोषसिद्धि की दर कम है और दहेज लेने के अपराधी पूर्ववत बिना किसी भय के जीवन-यापन करते हैं। कई मामलों में यह भी देखने में आया है कि पुलिस प्राथमिकी ही दर्ज नहीं करती जबकि कानूनन ऐसा करना अनिवार्य है। पुलिस समुचित जांच-पड़ताल करने और जरुरी साक्ष्य जुटाने में भी असफल रहती है। वह पीड़ित और अन्य गवाहों का समय रहते बयान लेने में चूक जाती है, भले ही गवाह मुकरने वाला ना हो। इन वजहों से दहेजरोधी कानून को हर राज्य में जिला स्तर पर कारगर ढंग से क्रियान्वित करना जरुरी है।.

 

  • कीर्ति सिंह कृत सेपरेटेड एंड डायवोर्स्ड विमेन इन इंडिया, इकॉनॉमिक राइटस् एंड एन्टाइटलमेंटस्नामक अध्ययन में चयनित 405 वियुक्त और तलाकशुदा महिलाओं में ज्यादातर(71.4 फीसदी) को संबंध टूटने के बाद अपने मायके लौटना पडा। अध्ययन से यह भी पता चला कि जिन महिलाओं को बच्चे थे उनमें से 85.6 फीसदी को संबंध टूटने के बाद बच्चों की परवरिश की जिम्मेदारी खुद उठानी पड़ी। अध्ययन का एक निष्कर्ष यह भी था कि मात्र 18.5 फीसदी महिलाओं ने ही अपनी तरफ से तलाक की मांग की। इससे वैवाहिक संबंध वियुक्त महिलाओं के साथ काम करने वाले समूहों की इस मान्यता की पुष्टि होती है कि वित्तीय और सामाजिक असुरक्षा की भय-भावना के कारण बहुत ही कम महिलाएं तलाक की मांग कर पाती हैं।

 

 

  • विवाह-संबंध के भीतर भी बलात्कार हो सकता है- कानून इस बात को अब भी नहीं स्वीकारता। हां, भारतीय दंड संहिता में 15 साल से कम उम्र की विवाहित कन्या के साथ वैवाहिक संबंध के भीतर यौन-दुर्व्यवहार की बात जरुर एक अपराध के रुप में स्वीकृत है।क्रिमिनल लॉ अमेंडमेंट बिल 2013 के जरिए हाल में जो संशोधन प्रस्तावित हैं उनमें यौनकर्म के लिए सहमति की उम्र 16 साल से बढ़ाकर 18 कर दी गई है। इससे नवउम्र लोगों के बीच सहमति से भी यौनसंबंध बनने पर उसे अपराध करार देने का खतरा उत्पन्न हो गया है। बच्चों के विरुद्ध की गई यौनहिंसा को दंडित करने के लिए बने अधिनियम में भी 18 साल से कम उम्र के प्रत्येक व्यक्ति को बच्चा माना गया है और इस तरह 18 साल से कम उम्र में कृत सहवास को अपराधिक करार दे दिया गया है। ये दोनों ही कानून इस सामाजिक सच्चाई की अनदेखी कर रहे हैं कि नवउम्र(जिसमें 18 साल से कम उम्र के लोग भी शामिल हैं) सहमति से यौन-संबंध बनाने की तरफ उन्मुख हो सकते हैं।.

 

  • सेक्शुअल हैरसमेंट ऑव विमेन ऐट वर्कप्लेस(प्रीवेंशन, प्रोहिबिशन एंड रीड्रसल) कानून यों तो अपने आप में अत्यंत व्यापक है लेकिन इसमें एक ऐसा भी प्रावधान है जिसमें कहा गया है कि अगर कोई स्त्री दुर्भावना से यौन-दुर्व्यवहार की शिकायत करती है तो उसे दंडित किया जायेगा। अगर इस प्रावधान को नहीं हटाया गया तो यह महिलाओं के हित के विरुद्ध साबित हो सकता है।एक तो यह विशाखा दिशानिर्देशों के विरुद्ध है, दूसरे यह भी हो सकता है कि अपने ऊपर आरोप लगाये जाने के डर से महिला शिकायत ही ना करे।

 

  • हाल ही में हिन्दू एडाप्शन एंड मेंटेनेंस एक्ट 1956 में संशोधन किया गया ताकि विवाहित महिला को गोद लेने के मामले में बराबर का अधिकार दिया जाय। द गार्जियनशिप एंड वार्ड एक्ट का भी संशोधन हुआ है ताकि माता के जीवित रहते अदालते अभिभावक ना नियुक्त कर पायें। पहले सिर्फ पिता के जीवित रहते अदालत अभिभावक नियुक्त नहीं कर पाती थी। बहरहाल इस संशोधन के बावजूद हिन्दू महिला को अब भी अपने बच्चे के अभिभावकत्व के मामले में बराबरी का हक हासिल नहीं है क्योंकि हिन्दू माइनॉरिटी एंड गार्जियनशिप एक्ट में पिता को बच्चे का स्वाभाविक अभिभावक माना गया है।

 

  • बाल-विवाह अगर छुटपन में हो गया हो या फिर लड़की के 18 साल की उम्र पूरी करने के पहले कभी भी हुआ हो तो वह विवाह के रुप में अवैध करार नहीं दिया गया है। बाल विवाह निरोधक कानून 2006 में सिर्फ उनको दंडित करने की बात कही गई है जो बाल-विवाह कराते हैं, या जो इसके लिए जिम्मेदार हैं, बढ़ावा या अनुमति देते हैं या बाल-विवाह की उपेक्षा करते हुए उसे रोकने में असमर्थ रहते हैं। 2006 के संशोधन के जरिए दंड का परिमाण तो बढ़ा दिया गया है लेकिन  बाल-विवाह को मौलिक रुप से अविधिमान्य(void ab initio) करार नहीं दिया गया है।.

 

  • कानून में लड़के के लिए विवाह की न्यूनतम उम्र 21 साल और लड़की के लिए विवाह की न्यूनतम उम्र 18 साल रखी गई है। उम्र का यह अन्तर क्यों रखा गया है- इसके कारण स्पष्ट नहीं हैं। सुझाव के तौर पर कहा जाता रहा है कि लड़के और लड़की दोनों के मामले में विवाह की न्यूनतम उम्र एक समान होनी चाहिए।

 

 

  • प्रथागत कानून जैसे छोटा नागपुर टिनेंसी एक्ट 1908(झारखंड) तथा बिहार, ओडिशा और पूर्वोत्तर के राज्यों में लागू ऐसे अन्य कानूनों का गहराई से अवलोकन और संशोधन होना चाहिए ताकि बेटियों को मिलने वाले उत्तराधिकार के संबंध में व्याप्त भेदभाव दूर हो। सरकार द्वारा भूमि-आबंटन से संबंधित कुछ कानून, जैसे राजस्थान कॉलोनाइजेशन(एलॉटमेंट एंड सेल ऑव गवर्नमेंट लैंड इन राजस्थान कैनाल कॉलोनी एरिया) रुल्स 1975 स्त्रियों के हक के मामले में भेदभाव भरे हैं। इस कानून में कहा गया है कि सिर्फ बेटे को ही भूमि के आबंटन के योग्य माना जायेगा।

 

  • एक परिवार में दो बच्चे हों- इस मानक को लागू करने वाले कानून और उपाय मानवाधिकार के विरुद्ध हैं। ये समाज के सबसे दीन-हीन और कमजोर तबके के अधिकारों के भी विरुद्ध पड़ते हैं। यह बात भी बार-बार उठायी जाती रही है कि अगर लोगों को परिवार छोटा रखने के लिए बाध्य किया जाता है तो वे बेटी की जगह बेटा पैदा करने को तरजीह देते हैं और इस क्रम में बेटियों की भ्रूणहत्या होती है।

 

  • मध्यप्रदेश की जनसंख्या-नीति में ग्रामीण विकास योजनाओं, महिलाओं के लिए आय उपार्जन की योजनाओं तथा गरीबी उन्मूलन की योजनाओं को किसी परिवार की परिवार-नियोजन की दशा से जोड़ा गया है। राजस्थान और मध्यप्रदेश में राजकीय सेवा के कर्मचारियों के लिए दो बच्चे के मानक का पालन अपरिहार्य किया गया है। आंध्रप्रदेश में भी एक नीति इसी तरह की है जिसमें स्कूलों के निर्माण, अन्य सार्वजनिक निर्माण कार्य तथा ग्रामीण-विकास की योजनाओं को होने वाले निधिदान को परिवार-नियोजन के मामले में हासिल की गई सफलता से जोड़ा गया है।

 

  • मादा शिशु के जन्म को बढ़ावा देने वाली नीतियों का पुनरावलोकन होना चाहिए क्योंकि ऐसी कुछ योजनाओं में लाभ सिर्फ दो शिशुओं तक देने की बात प्रावधानित है इससे यह बात अस्पष्ट रह जाती है कि आखिर कानून की मंशा क्या है। कुछ योजनाओं के तहत विवाह-खर्च में मदद देने अथवा विवाह में मददगार होने की बात प्रावधानित है। इससे समाज में यह धारणा बलवती होती है कि बेटियां एक बोझ हैं।.

 



Related Articles

 

Write Comments

Your email address will not be published. Required fields are marked *

*

Video Archives

Archives

share on Facebook
Twitter
RSS
Feedback
Read Later

Contact Form

Please enter security code
      Close