नरेगा

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What's Inside

सेंटर फॉर साईंस एंड एन्वायरन्मेंट के अनुसार- www.cseindia.org,

· सरकार ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम की संभावनाओं को साकार करने में असफल रही है। नरेगा के अन्तर्गत चलाए जा रहे कार्यक्रम का क्रियान्वयन और मूल्यांकन रोजगार सृजन को पैमाना मानकर किया जा रहा है जबकि ध्यान बात पर होना चाहिए कि स्थानीय स्तर पर ग्रामीणों के लिए जीविका के उत्पादक आधार तैयार हुए या नहीं।

 

· मजदूरी की गणना में युक्तिसंगत ना होने के कारण जल-संरक्षण जैसी परियोजनाएं कम लाभकारी साबित हो रही हैं।

 

· कुल ७६९,५८२ काम प्रगति पर हैं।इसमें केवल १५८,२७७ को यानी लगभग बीस फीसदी को पूरा किया जा सका है। २००७ के अगस्त तक नरेगा के अन्तर्गत जल संरक्षण के कुल १४ फीसदी कामों को ही अंजाम दिया जा सका था।

 

· सड़क निर्माण की परियोजनाएं अपेक्षाकृत ज्यादा तेजी से पूरी हो रही हैं।

 

· जल संरक्षण के लिए जिन ढांचों का निर्माण किया जा रहा है इसमें किसी सुव्यवस्थित दृष्टि का अभाव है और इस वजह से ढांचों का निर्माण हो जाने के बावजूद वे बेकार पड़े रहते हैं। मिसाल के लिए वर्षा-जल जमा करने के लिए अगर किसी किस्म का निर्माण हुआ है तो उसमें इस बात का ध्यान नहीं रखा गया है कि संग्रहित जल किस तरीके से सुरक्षित रहेगा। सबसे बड़ी बात तो यह कि ऱख-रखाव का जिम्मा नरेगा से जुड़े कामों के अन्तर्गत नहीं आता।नतीजतन कुछ जिलों में पानी को संरक्षित रखने के ढांचे पहले से बड़ी तादाद में मौजूद हैं और इन जिलों में असल समस्या इन ढांचों के रख-रखाव की है मगर प्रावधान ना होने के कारण नरेगा की रकम इस मद में खर्च नहीं की जा रही है।

 

पब्लिक इन्ट्रेस्ट फाऊंडेशन और नेशनल काऊंसिल ऑव अपलॉयड इकॉनॉमिक रिसर्च के दस्तावेज इवैल्यूएटिंग परफार्मेंस ऑव नेशनल रुरल एम्पलॉयमेंट गारंटी एक्ट के अनुसार-

http://www.publicinterestfoundation.com/index.php?option=c
om_content&task=view&id=47&Itemid=49

http://www.hindustantimes.com/StoryPage/StoryPage.aspx?sec
tionName=NLetter&id=afbf7ea0-234e-4572-ba5c-5404e635d3
b7&Headline=Shady+data%2c+sloppy+work%3a+study+slams+N
REGA

 

·आंकड़ों में हेरफेर के जरिए इस योजना के अन्तर्गत सृजित रोजगार की एक सुनहरी तस्वीर पेश की गई है।

 

·आधिकारिक आंकड़ों में शुरुआती चरण में दस फीसदी परिवारों को रोजगार मुहैया कराने की बात कही गई है लेकिन इस पर संदेह उठता है क्योंकि स्वतंत्र रीति से कराये गए शोध,सोशल ऑडिट,और फील्ड स्टडीज से खुलासा हुआ है कि कई मायनों में आंकड़े दुरूस्त नहीं हैं और ठीक इसी कारण प्रान्तीय अथवा राष्ट्रीय स्तर पर एक अच्छी तस्वीर पेश की जा रही है कि जितने लोगों ने रोजगार मांगे हैं उसे देखते हुए रोजगार मुहैया कराने की कोशिशें सराहनीय कही जा सकती हैं।

 

·कई राज्यों में ऐसे अनेक जिले पाये गए जहां कुल परिवारों की जितनी संख्या आबाद है उसकी तुलना में कहीं ज्यादा संख्या में जॉब-कार्ड जारी कर दिए गए।

 

इस अध्ययन में निम्नलिखित सुझाव दिए गए हैं-:

 

भारत सरकार की जिम्मेदारी बनती है कि वह आसान और सरल तरीके से नरेगा के लिए धन मुहैया कराये-

 

·नरेगा के लिए धन मुहैया कराने की मौजूदा प्रणाली में भारत सरकार मजदूरी के मद में दी जाने वाली पूरी रकम और काम के साजो सामान के मद में होने वाले खर्च की ७५ फीसदी राशि राज्यों को मुहैया कराती है। यह राशि सीधे राज्यों को ना देकर जिलों में भेजी जाती है।इस प्रकिया में मजदूरी,साजो-सामान और कर्मचारियों के मद में होने वाले खर्चे का आकलन कई चरणों में करना पड़ता है। साथ ही जिलावार आंकड़ा रखने के प्रावधान के चलते काम का बोझ भी बढ़ता है। इस प्रक्रिया में जिला स्तर के अधिकारियों को कई दफे दिल्ली का चक्कर लगाना पड़ता है ताकि उनके प्रस्ताव के अनुकूल राशि दी जा सके।

 

·इस पूरी प्रक्रिया को आसान बनाया जा सकता है।धन देने की नई प्रणाली कुछ इस प्रकार की हो सकती है कि केंद्र राज्यों को मजदूरी के मद में दी जाने वाली पूरी राशि दे और इस राशि का पचास फीसदी हिस्सा साजो-सामान आदि के खर्च के मद में दे दे। अगर धन प्रदान करने की ऐसी प्रणाली अपनायी जाय तो फिर राज्यों को साजो-सामान पर होने वाले खर्च,कर्मचारियों पर होने वाले खर्च और मजदूरों पर होने वाले खर्च को अलग-अलग नहीं जोड़ना होगा और ना ही उन खर्चों के बीच किसी किस्म के अनुपात का आकलन करना होगा।दूसरे,धन सीधे राज्यों को दिया जाय ना कि जिलों को और राज्यों से जिलों को रकम देने के क्रम में आधार यह बनाया जाय कि उन्होंने पिछली दफे दी गई रकम में से कितना खर्च किया है। इस प्रकार केंद्र को छह सौ जिलों का रिकार्ड अलग अलग रखने के बजाय बस राज्यों का रिकार्ड रखना होगा।

 

·धन देने की इस प्रणाली के साथ उसके जांच की भी व्यवस्था की जानी चाहिए।नरेगा के मद में दिया जाने वाला धन जब राज्यों को हासिल हो जाय तो केंद्र इसकी पावती की जांच के लिए अपना दल भेजे।नरेगा के मद मिले धन की जांच राज्यों द्वारा भी अर्ध-वार्षिक आधार पर करायी जाय और कंपट्रोलर एंड ऑडिटर जेनरल द्वारा इसकी जांच सालाना आधार पर की जाय।

 


Rural Expert
 

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