Resource centre on India's rural distress
 
 

नरेगा

खास बात

• मनरेगा में वित्तवर्ष 2015-16 में 235.6 करोड़ व्यक्ति-दिवसों के बराबर रोजगार का सृजन हुआ है. यह पिछले पांच सालों में अधिकतम है.

 

• वित्तवर्ष 2015-16 में कुल 5.35 करोड़ परिवारों ने मनरेगा के तहत रोजगार की मांग की लेकिन केवल 4.82 करोड़ परिवारों को ही रोजगार दिया जा सका यानी 9.9 फीसद परिवारों को मांग के बावजूद रोजगार नहीं हासिल हुआ.

 

• वित्तवर्ष 2015-16 में मनरेगा में प्रति परिवार औसतन 49 व्यक्ति दिवसों के बराबर रोजगार हासिल हुआ जो कि बीते तीन सालों में अधिकतम है.

 

• वित्तवर्ष 2015-16 में मनरेगा में तकरीबन 48.5 लाख परिवारों को 100 दिन का रोजगार हासिल हुआ.

 

• सूखा प्रभावित राज्यों में 28.35 लाख परिवारों को मनरेगा के अंतर्गत 100 दिन का रोजगार हासिल हुआ यानी कुल सूखा प्रभावित राज्यों कुल परिवारों में कुल 5.9 फीसद परिवार ही 100 दिन का रोजगार पा सके.

 

• वित्तवर्ष 2015-16 में मनरेगा में प्रति व्यक्ति प्रतिदिन औसत मजदूरी 154 रुपये की रही. 

 

इन तथ्यों के स्रोत के लिए देखें आगे के पृष्ठ

 

एक नजर

नरेगा को लेकर पक्ष और विपक्ष से अतिवादी प्रतिक्रियाएं आती हैं।साल 2005 में यह योजना 200 जिलों में शुरु की गई (और बाद के दिनों में इसका विस्तार पूरे देश में हुआ), थी तो इस योजना के समर्थकों ने कहा कि यह ग्रामीण भारत में एक नये युग की शुरुआत है। बहरहाल, नरेगा से नव-उदारवादी खेमे के प्रभावशाली अर्थशास्त्री इतने नाराज थे कि उनमें से एक ने कहा-पैसा ही बर्बाद करना है तो इससे बेहतर तरीका है कि हेलिकॉप्टर से नोटों की बरसात कर दी जाय। आज स्थिति दूसरी है और नरेगा पर अंगुलि उठाने वाले मुख्यतः तीन वजहों से चुप हैं-(क) योजना को आम तौर पर सफल हुआ बताया जा रहा है, (ख) माना जा रहा है कि यूपीए के दोबारा सत्तासीन होने में नरेगा की महत्त्वपूरण भूमिका है और (ग) मंदी की मारी पश्चिमी दुनिया अब लोक-कल्याणकारी कामों में सरकारी खर्च की दुहाई देने लगी है। नरेगा के आलोचक अब इस योजना में जारी भ्रष्टाचार और गड़बड़ घोटाले की ही बात कर रहे हैं और सच पूछें तो नरेगा में भ्रष्टाचार बड़े पैमाने पर हो रहा है मगर इतना नहीं कि पानी के सर कुजरने की नौबत आन पड़ी हो।

 

नरेगा गरीबी उन्मूलन की अधिकतर योजनाओं से एक बुनियादी अर्थ में भिन्न है। नरेगा में इस बात की पहचान की गई है कि व्यक्ति को रोजगार का वैधानिक अधिकार होता है।नरेगा के फुटकल फायदों में शामिल है-ग्रामीण गरीबों को बैंकिंग व्यवस्था से जोड़ना, सामुदायिक संपदा का जिर्णोद्धार और स्त्री-पुरुष की बराबरी।नरेगा को जब याद किया जाएगा तो यह भी कहा जाएगा कि नरेगा ने भारत में नागरिक समूहों की आवाज को एक नई धार दी।कल्पनालोक में आदर्श की हांडी में पकायी गई खिचड़ी जान पड़ने वाला एक विचार कई नागरिक-समूहों, प्रतिबद्ध विशेषज्ञों और तृणमूल स्तर के संगठनों के साल-दर-साल चलने वाले प्रयासों के बूते आखिरकार हकीकत की जमीन पर नमूदार हुआ। इनमें से कई कार्यकर्ता अब कारगर सामाजिक अंकेक्षण(सोशल ऑडिट) और मजदूरी के भुगतान में हुई देरी के लिए मुआवजा देने की मांग उठा रहे हैं और इसके लिए काम कर रहे हैं।

 

छत्तीसगढ़, राजस्थान और आंध्रप्रदेश के कुछ प्रमुख स्वयंसेवी संस्थाओं ने अग्रणी विश्वविद्यालयों के स्नातकों और शहरी युवाओं को अपने काम से जोड़कर नरेगा से संबद्ध हेल्पडेस्क चलाना शुरु किया है। कुछ जगहों पर ये युवा सोशल-ऑडिट के काम में बी मदद कर रहे हैं। मिसाल के लिए दिल्ली विस्वविद्यालय के स्वयंसेवकों की मदद एक महीने तक संघर्ष चलाने के बाद झारखंड के खूंटी और मूरहू प्रखंड के 174 ग्रामीणों को साल 2009 के जून में 2-2 हजार रुपये का मुआवजा हासिल हुआ जिसे एक साथ जोड़ दें तो यह रकम 3 लाख 48 हजार रुपये की बैठती है। मुआवजा हासिल करने वाले ग्रामीणों को नरेगा के अंतर्गत किए गए काम का भुगतान नहीं किया गया था जो इसके प्रावधानों को घनघोर उल्लंघन है। 

 

नरेगा के लागू होने से आशाए भले परवान चढ़ी हों मगर इसके साथ एक आशंका यह भी लगी है कि स्थानीय स्वशासन और सार्वजनिक सेवाओं को मुहैया कराने वाले तंत्र में अगर व्यापक सुधार नहीं होते तो यह योजना कहीं सरकारी धर्मखाते से दी गई एक और खैरात ना साबित होकर रह जाय।अनेक विशेशज्ञों का तर्क है कि नरेगा को प्रभावकारी ढंग से लागू करने के लिए पर्याप्त धन और कार्यदिशा के साथ कार्यकर्ताओं की एक टोली तैयार की जाय जो पंचायत स्तर पर नरेगा के काम की जिम्मेवारी ले।