भोजन का अधिकार

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राष्ट्रीय आहार सुरक्षा अधिनियम 2009 ( मसौदा )

यूपीए-2 के वायदे

नरेगा को अपनी चुनावी सफलता का महत्वपूर्ण कारण मानते हुए नवगठित सरकार ने अपने शासन के पहले 100 दिनों के अंदर आहार सुरक्षा अधिनियम लाने की बात उठायी।

• राष्ट्रपति प्रतिबा देवी सिंह पाटील ने 4 जून 2009 को कहा कि राष्ट्रीय आहार सुरक्षा अधियनियम बनाया जाएगा जिसमें गरीबी रेखा से नीचे रहने वाले परिवारों को प्रति माह 25 किलो चावल या गेहूं 3 रुपये के दर से देने का प्रावधान होगा।

• 4 जून 2009 के दिन प्रस्तावित विधेयक का एक संकल्प पत्र भी उपभोक्ता मामलों, खाद्य और सार्वजनिक वितरण मंत्रालय द्वारा जारी हुआ। इसमें कहा गया कि बीपीएल परिवारो की गणना योजना आयोग द्वारा प्रस्तुत 2004-05 के आंकड़ों को आधार मानकर की जाएगी।योजना आयोग के अनुसार देश में 6.52 करोड़ की तादाद में गरीब परिवार हैं जबकि राज्यों ने कुल 10.28 करोड़  परिवारों को गरीब मानकर बीपीएल कार्ड जारी किए हैं। इसके अतिरिक्त अगर योजना आयोग के आकलन को मानें तो गरीबों की तादाद लगातार कम हो रही है और उनकी संख्या इस साल घटकर 5.91 करोड़ हो जानी चाहिए। आयोग यह भी मानता है कि गरीबी रेखा से ऊपर रहने वाले परिवारों की संख्या बढ़कर 15.84 करोड़ हो गई है। इस आकलन की वजह से राज्यों और केंद्र के बीच मौजूदा मसौदे पर मतभेद हैं।

 • 6 जुलाई 2009 के दिन अपने बजटीय अभिभाषण में वित्तमंत्री प्रणब मुखर्जी ने कहा कि सरकार आहार सुरक्षा विधेयक लाने की तैयारी में है और इसमें गरीबी रेखा से नीचे रहने वाले परिवारों को 3 रुपये की दर से 25 किलो अनाज(चावल या गेहूं) प्रति माह दिया जाएगा।

• 13 जुलाई 2009 को प्रणब मुखर्जी की अगुवाई में मंत्रियों का एक समूह प्रस्तावित विधेयक की रुपरेखा तैयार करने के लिए गठित हुआ। इसमें मोंटेक सिह अहलूवालिया (योजना आयोग के उपाध्यक्ष) विशेष अतिथि के रुप में आमंत्रित किए गए हैं।

प्रोफेसर ज्यां द्रेज और उनकी टोली द्वारा तैयार किए गए वैकल्पिक मसौदे की मुख्य बातें-

24 जून 2009 के दिन जारी किए गए इस मसौदे में कहा गया कि मौजूदा वक्त में सुप्रीम कोर्ट के आदेश के अनुरुप कुल 8 भोजन और पोषण से संबंधित योजनाएं चल रही हैं। इन्हें भी प्रस्तावित विधेयक में कानूनी रुप दिया जाना चाहिए।

हर बीपीएल परिवार को 35 किलो अनाज प्रतिमाह 3 रुपये की दर से (गेहूं के मामले में 2 रुपये प्रति किलो) दिया जाय। हर एकल परिवार को अलग इकाई माना जाय। गरीब परिवारों की पहचान के लिए एक नई कसौटी तैयार की जाय जिसमें सत्यापन की आसानी और पारदर्शिता हो।

• वैकल्पिक मसौदे में कहा गया है कि जनता की सेहत से खिलवाड़ करने वाली कंपनियों और व्यक्तियों को कठोर दंड दिया जाय क्योंकि वे सुरक्षित आहार के मानकों के पालन न करने के अपराधी हैं।

प्रस्तावित विधेयक पर नागरिक संगठनों की मांग-(देखें नीचे दी गई लिंक)

http://www.righttofoodindia.org/data/rtf_act_essential_demands_of_the_rtf_campaign%20_220709.pdf)

•  इस विधेयक द्वारा यह सुनिश्चित किया जाय कि कोई भी व्यक्ति ( स्त्री, पुरुष, बुजुर्ग या बच्चा) किसी भी दिन भूखे पेट सोने के लिए बाध्य ना हो और ना ही कुपोषण का शिकार हो ।

 • विधेयक के जरिए सरकार पर जिम्मेदारी डाली जाय कि वह खाद्योत्पादन को टिकाऊ तरीके से बढ़ाये और हर समय हर जगह समुचित मात्रा में आहार उपलब्ध कराये।

• मौजूदा वक्त में चल रही भोजन और पोषण की योजनाओं में कटौती नहीं होनी चाहिए बल्कि विधेयक में इन्हें समेकित करके अधिकार मानते हुए कानूनी रुप दिया जाना चाहिए। खासकर समेकित बाल विकास योजना, मिड डे मील योजना और अंत्योदय योजना के संदर्भ में यह व्यवस्था होनी चाहिए।

• भोजन और पोषण की मौजूदा योजनाओं दायरे में जो लोग नहीं हैं मसलन- स्कूल-वंचित बच्चे, आप्रवासी मजदूर और उनके परिवार, बंधुआ मजूरी के शिकार परिवार, विस्थापित और बेघर लोग और शहरी क्षेत्र के गरीब आदि- उनके लिए प्रस्तावित विधेयक में अधिकारों की निशानदेही करते हुए व्यवस्था की जानी चाहिए। 

• नरेगा के अन्तर्गत हासिल काम के अधिकार, वृद्धावस्था पेंशन, मातृत्व से जुड़े अधिकारों की गणना अलग की जाय। इनमें बढ़ोतरी हो ना कि प्रस्तावित विधेयक में इन्हें भी भोजन के अधिकार के अन्तर्गत शामिल मानकर सीमित किया जाय।

• 0-6 बच्चे को भी भोजन का अधिकार हासिल है। उसके इस अधिकार की रक्षा उसकी मां को कुछेक सेवाएं प्रदान करके की जायें। मसलन- जन्म के समय सहायता, स्तनपान के लाभ बताने के लिए विशेषज्ञ की सलाह, मातृत्व से जुड़े लाभाधिकार और कार्यस्थल पर पालने की व्यवस्था।

• चंद धनिको को छोड़कर देश के सभी लोगों को सार्वजनिक वितरण प्रणाली के अंतर्गत प्रति व्यक्ति 7 किलो अनाज प्रति माह 2 और 3 रुपये प्रति किलो की दर से मुहैया कराया जाना चाहिए। अगर अवाम चाहे तो मोटहन भी दिया जाय। इसके अतिरिक्त दाल और खाद्य-तेल भी दिया जाना चाहिए।

• राशनकार्ड के बंटवारे के मामले में घर की स्त्री को ही प्रधान स्वीकार किया जाय।

• भोजन और पोषण से जुड़ी किसी भी योजना में आहार की जगह नकदी देने का प्रावधान ना किया जाय.

• प्रस्तावि विधेयक में ध्यान रखा जाय कि आहार-सुरक्षा के नीतिगत मामले या पोषण से संबंधित योजनाओं में व्यवसायिक घरोने के हितों की घुसपैठ ना हो। इस बात का विशेष ध्यान रखा जाना चाहिए कि भोजन में जीन संशोधित चीजें या फिर संदूषित पदार्थ ना हों।व्यवसायिक हितों के साथ जहां इन मामलों में टकराहट हो वहीं सरकार निजी-सार्वजनिक भागीदारी से बचे।

 

Rural Expert


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