वनाधिकार

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 रिपोर्ट ऑन द हाईलेवल कमिटी ऑन सोश्यो इकॉनॉमिक, हैल्थ एंड एजुकेशनल स्टेटस् ऑफ ट्राइबल कम्युनिटीज ऑफ इंडिया(मई 201र्) के तथ्यों के अनुसार

 

http://www.im4change.org/docs/99299TribalCommitteeReportMa
y-June2014.pdf

 

वामपंथी अतिवाद से प्रभावित नौ राज्यों में से छह राज्यों में अधिसूचित क्षेत्र(शिड्यूल्ड एरिया) हैं। कुल 83 जिलों में 42 जिले अधिसूचित क्षेत्र के अन्तर्गत आते हैं। ये इलाके  गहरी उपेक्षा और वंचना के शिकार है, गरीबी बहुत ज्यादा है, स्वास्थ्य और शिक्षा सुविधाओं का अभाव है।  इलाके के निवासी व्यापारियों, सूदखोरों के हाथो शोषित हैं और प्रशासन अक्षम-अकुशल है। विकास परियोजनाओं के कारण जनजातीय समूहों का यहां से बड़े पैमाने पर विस्थापन हुआ है। ये सारी बातें जनजातीय के हक की सुरक्षा के सांवैधानिक प्रावधानों और कानून के रहते हुई हैं।

    देश का तकरीबन 60 फीसदी वनाच्छादित हिस्सा जनजातीय इलाकों में है। जिन 58 जिलों में वनाच्छादन 67 प्रतिशत या उससे अधिक है उनमें 51 जिले जनजातीय बहुल हैं।

    ओडिशा, छत्तीसगढ़ और झारखंड में देश के कोयला-भंडार का 70 प्रतिशत हिस्सा मौजूद है। देश के लौह-अयस्क का 80% हिस्सा, बाक्साइट का 60% तथा क्रोमाइट का तकरीबन 100% हिस्सा इन्हीं तीन राज्यों में है।

    सेंटर फॉर साइन्स एंड एन्वायर्नमेंट स्टडी के एक अध्ययन रिच लैंड पुअर पीपल्स(2008) के मुताबिक सर्वाधिक खनिज-उत्पादन करने वाले कुल जिलों में 50 प्रतिशत जिले आदिवासी बहुल हैं। इन इलाकों में वनाच्छादन भी 28 प्रतिशत है जो कि राष्ट्रीय औसत( 20.9 प्रतिशत) से ज्यादा है।

    विस्थापन की बड़ी वजह अनुमानतया बांधों का निर्माण है। बांधों से विस्थापित होने वाले लोगों की संख्या 2 करोड़ से 5 करोड़ के बीच है। बहरहाल इस बात पर विद्वानों के बीच सहमति है कि विस्थापित लोगों में अनुसूचित जनजाति के लोगों की संख्या 40 प्रतिशत है जबकि देश की कुल आबादी में जनजातीय समुदाय के लोगों की संख्या 8 प्रतिशत है।

    विकास परियोजनाओं से विस्थापित होने वाले लोगों में 40 प्रतिशत तादाद जनजातीय समुदाय के लोगों की, 20 प्रतिशत तादाद अनुसूचित जाति की और 20 प्रतिशत तादाद अन्य पिछड़ी जाति श्रेणी के लोगों की है। शोधकर्ताओं ने उपलब्ध आंकड़ों के आधार पर अनुमान लगाया है कि लोगों को विकास परियोजनाओं के कारण ढाई करोड़ हैक्टेयर जमीन छोड़नी पड़ी है जिसमें 70 लाख हैक्टेयर वनभूमि भी शामिल है।  विस्थापित लोगों में से 25%  का पुनर्वास किया गया है जबकि विस्थापित जनजातीय समुदाय के कुल लोगों में केवल 21.16% का पुनर्वास हो पाया है। शेषf 79% का पुनर्वास बाकी है।

    द राइट टू फेयर कंपेन्सेशन एंड ट्रान्सपेरेन्सी इन लैंड एक्वीजिशन रिहैबिलिटेशन एंड रिसेट्लमेंट एक्ट 2013 में विस्थापित लोगों के बीच पुनर्वास के लिए शेष बचे रह गये लोगों के बारे में कोई प्रावधान नहीं है।

   भू-संसाधन विभाग की वार्षिक रपट 2007-08 के तथ्यों के अनुसार ओड़िशा में जनजातीय लोगों के भूमि-अधिग्रहण से संबंधित सर्वाधिक मामले अदालतों में दायर हैं। इन मामलों की संख्या 1.05 लाख है। मध्यप्रदेश का ऐसे मामलों के निपटारे के मामले में प्रदर्शन अत्यंत निराशाजनक है। मध्यप्रदेश में भूमि-अधिग्रहण के एक भी मामले में फैसला आदिवासी आबादी के पक्ष में नहीं हुआ है। गुजरात में अधिग्रहित जमीन से संबंधित कुल 19,322 मामले आदिवासी समुदाय के पक्ष में सुनाये गये हैं लेकिन जमीन की वास्तविक वापसी मात्र 376 मामलों में हुई है।

    भारत सरकार ने अपने राष्ट्रीय आदिवासी नीति के प्रारुप(2006) में अनुसूचित जनजाति की संख्या 698  बतायी है। जनगणना(2011) में अनुसूचित जनजातीय समुदायों की संख्या 705 बतायी गई है।.

   तकरीबन 80 प्रतिशत अनुसूचित जनजाति के लोग अर्थव्यवस्था के प्राथमिक क्षेत्र में कार्यरत हैं जबकि अर्थव्यवस्था के प्राथमिक क्षेत्र में कार्यरत सामान्य श्रेणी के लोगों की तादाद 53% है। ये सभी मुख्यतया खेती-बाड़ी करते हैं। साल 2001 में खेती-बाड़ी करने वाले आदिवासी लोगों की संख्या 68 प्रतिशत से घटकर 45 प्रतिशत रह गई थी जबकि आदिवासी समुदाय के खेतिहर मजदूरों की संख्या 20 प्रतिशत बढ़कर 2001 तक 37 प्रतिशत हो गई थी। इससे आदिवासी आबादी के बीच बढ़ती भूमिहीनता का पता चलता है और इस रुझान को 2011 की जनगणना के आंकड़े पुष्ट करते हैं।

   अनुमानतया बीते एक दशक में तकरीबन 35 लाख आदिवासी लोगों ने खेती-बाड़ी या इससे जुड़े कामों को छोड़कर अनौपचारिक श्रम-बाजार का रुख किया है।

   अनुसूचित जनजाति के बीच ग्रामीण क्षेत्रों में लिंग-अनुपात प्रति 1000 पुरुष पर 991 महिलाओं का और शहरी क्षेत्र में प्रति हजार पुरुष पर 980 महिलाओं का है। राष्ट्रीय औसत प्रति हजार पुरुषों पर 990 महिलाओं का है।(2011 की जनगणना के अनुसार)

    भारत की कुल आबादी में जनजातीय समुदाय के लोगों की संख्या साल 2001 में 8.2 प्रतिशत थी जो 2011 में बढ़कर 8.6 प्रतिशत हो गई है।

    ओडिशा में सर्वाधिक अधिसूचित जनजातियां (62) हैं। इसके बाद कर्नाटक (50), महाराष्ट्र (45), मध्यप्रदेश (43) और छत्तीसगढ़ (42) का स्थान है।

    दक्षिण भारत के राज्यों में (वैसे राज्य जहां कोई अधिसूचित क्षेत्र नहीं है) कर्नाटक में आदिवासी समदायों की संख्या कर्नाटक में सर्वाधिक (50) है। इसके बाद तमिलनाडु (36) और केरल (36) का स्थान है।

    केंद्रशासित राज्यों में लक्षद्वीप में सर्वाधिक आदिवासी समुदाय के लोगों का आबादी में अनुपात सर्वाधिक(94.8 प्रतिशत) है। इसके बाद मिजोरम (94.4%), नगालैंड (86.5%), मेघालय (86.1%), और अरुणाचल प्रदेश (68.8%) का स्थान है। उत्तरप्रदेश में अनुसूचित जनजाति की आबादी वहां कुल आबादी में अपेक्षाकृत बहुत कम 0.56% है। इसके बाद तमिलनाडु (1.1%), बिहार (1.28%), केरल (1.45%), और उत्तराखंड (2.89%) का स्थान है।

    जहां तक राज्यों में अनुसूचित जनजाति समुदाय के लोगों की आबादी का प्रश्न हैं मध्यप्रदेश इस मामले में  14.7% प्रतिशत जनजातीय आबादी के साथ शीर्ष पर है। इसके बाद महाराष्ट्र (10.1%), ओड़िशा (9.2%), राजस्थान (8.9%), गुजरात (8.6%), झारखंड (8.3%), छत्तीसगढ़ (7.5%), आंध्रप्रदेश (5.7%), पश्चिम बंगाल (5.1%), कर्नाटक (4.1%), असम (3.7%), मेघालय (2.5%) का स्थान है। शेष राज्यों में कुल 11.6% जनजातीय आबादी रहती है। आदिवासी समुदाय के लोगों की कुल आबादी का आधे से ज्यादा हिस्सा मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र, ओडिशा, झारखंड और गुजरात में अवस्थित है।

    कर्नाटक और पश्चिम बंगाल में कोई भी अधिसूचित क्षेत्र नहीं है और इन दो राज्यों में देश की आदिवासी आबादी का क्रमश 4.1% तथा 5.1% हिस्सा रहता है।

   भारत के 90 जिलों में आदिवासी आबादी वहां की कुल जनसंख्या में 50 प्रतिशत से ज्यादा है। कुल 62 जिलों में आदिवासी आबादी कुल आबादी में 50 प्रतिशत से कम लेकिन 25 प्रतिशत से ज्यादा है। देश के कुल 543 जिलों में आदिवासी आबादी का निवास है।

    विशेष रुप से असहाय आदिवासी समूह(पीवीटीजी) के अंतर्गत फिलहाल 75 जनजातीय समुदाय शामिल हैं। इनकी पहचान के आधार हैं : 1) वनोपज आधारित जीविका, 2) अस्तित्व का गैर-कृषिगत आधार 3) घटती हुई आबादी 4) साक्षरता दर का कम होना 5) न्यूनतम जरुरत की पूर्ति कर सकने लायक अर्थव्यवस्था

        विशेष रुप से असहाय आदिवासी समूह(पीवीटीजी) मुख्य रुप से छह राज्यों में रहते हैं। इन राज्यों के नाम हैं- महाराष्ट्र, , मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, झारखंड, ओडिशा, आंध्रप्रदेश और तमिलनाडु

 

 

 

[inside]वनाधिकार कानून (2006) के बारे में कुछ बुनियादी जानकारी[/inside]

जनजातीय कार्य मंत्रालय द्वारा दिसंबर 2012 में प्रस्तुत निम्नलिखित लिंक के अनुसार http://tribal.nic.in/writereaddata/mainlinkFile/File1539.pdf:

शिड्यूल ट्राईब्स एंड
अदर ट्रेडिशनल फॉरेस्
डेवेलर्स(रिकॉग्निशन
ऑव फॉरेस्ट राइटस्) एक्
ट, 2006
आदिवासी जनता के सशक्तीकरण की दिशा में उठाया गया एक ऐतिहासिक महत्व का कदम है। यह अधिनियम जंगल तथा उससे जुड़ी अन्य वन्य-भूमि पर अनुसूचित जनजाति और वनों पर निर्भर अन्य परंपरागत समुदायों का अधिकार सुनिश्चित करता है। यह अधिनियम 1 जनवरी 2008 को जारी एक अधिसूचना के साथ अमल में आया और इसने जीविका तथा अस्तित्व के लिए वन तथा वनोपज पर निर्भर समुदायों का वनों पर अधिकार स्वीकार किया।

कानून के अमल में आने के बाद से उसके क्रियान्वन को लेकर कुछ दिक्कतें आ रही हैं जिन पर जनजातीय कार्य मंत्रालय ने ध्यान दिया है। जो बड़ी शिकायतें सामने आई हैं उनमें शामिल है - वनभूमि पर दावे की अर्जियों का बड़े पैमाने पर खारिज होना, दावेदार को उसकी अर्जी की नामंजूरी की सूचना ना देना, किसी खास तरह के प्रमाण को प्रस्तुत करने पर जोर देना तथा वनाधिकार कानून के बारे में लोगों में समुचित जानकारी की कमी। इन बाधाओं को ध्यान में रखते हुए जनजातीय कार्य मंत्रालय ने साल 2012 के जुलाई महीने में राज्यों को एक विस्तृत दिशा-निर्देश जारी किया और इसी साल सितंबर महीने में वनाधिकार कानून में संशोधन की अधिसूचना जारी की गई ताकि वनाधिकार कानून के बारे में जानकारी स्पष्ट हो सके और उसके क्रियान्वयन में आ रही बाधाएं दूर की जा सकें।

जनजातीय कार्य मंत्रालय ने यूएनडीपी के साथ मिलकर 22 राज्यों को पाँच क्षेत्रों में बांटकर हर क्षेत्र में एक परामर्शी बैठक की और नियमों में किए गए हालिया संशोधनों के बारे में जानकारी का साझा किया गया। नीचे दी गई जानकारी क्षेत्रीय बैठकों में उठे मुद्दों को चिह्नित करके उनके समाधान के ख्याल से दी जा रही है, यह प्रश्नोत्तरी के रुप में है-

प्रश्न-  वनाधिकार कानून के सेक्शन 3(1)(c) में लघु वनोपज पर अधिकार अनुसूचित जनजाति तथा अन्य परंपरागत वनवासी समुदायों को दिया गया है।  तेंदू / केंदू या बांस को राज्य के वन कानूनों में राष्ट्रीयकृत वनोपज माना गया है, क्या इन पर मालिकाना अधिकार वनाधिकार कानून के तहत दिया जा सकता है?

उत्तर- हां, बांस और तेंदू-केंदू सहित सभी लघु वनोपजों पर अनुसूचित जनजाति और अन्य परंपरागत वनवासी समुदायों को वनाधिकार कानून के तहत मालिकाना हक दिया जा सकता है, बशर्ते ऐसे वनोपज पर दावे की अर्जी पेश की जाय। वनाधिकार कानून के सेक्शन  2(i) में लघु वनोपज की साफ-साफ परिभाषा की गई है और इसमें बांस तथा तेंदूपत्ता को शामिल किया गया है।

 

प्रश्न- अगर कुछेक राष्ट्रीयकृत लघु वनोपज जैसे तेंदूपत्ता का मालिकाना हक राज्यों से लेकर हस्तांतरित कर दिया जाता है तो क्या निजी व्यापारियों के हाथों तेंदूपत्ता एकत्र करने वाले आदिवासी समुदाय के शोषण होने की आशंका नहीं है?

उत्तर- अधिकार जिसे मिला है, उसके हाथ में मालिकाना हक चले जाने का यह मतलब कत्तई नहीं कि राज्य सरकारें वनोपज के व्यापार से अपना हाथ हर तरह से खींच लें। राज्य स्तर की एजेंसियों को सलाह दी गई है कि वे लघु वनोपज एकत्र करने वालों के लिए अपना समर्थन-ढांचा बनाये रखें और उनके द्वारा एकत्र किए हुए लघुवनोपज की खरीदारी न्यूनतम समर्थन मूल्य पर करें, साथ ही खरीदारों के हाथो उनके शोषण की स्थितियों के विरुद्ध सुरक्षा प्रदान करें। इस सिलसिले में कुछ-कुछ वैसी ही व्यवस्था की गई है जैसी चावल और गेहूं के खरीद के मामले में है।

लघु वनोपज एकत्र करने वाले सहकारी समितियां बनाकर एकजुट हो सकते हैं, वे खुद को एक निर्माता-कंपनी के रुप में प्रस्तुत कर सकते हैं ताकि उनके मोल-तोल की क्षमता में इजाफा हो सके।

राष्ट्रीयकृत लघुवनोपज के व्यापार में राज्यस्तरीय एजेंसियों के एकाधिकार को खत्म करने से लघुवनोपज के व्यापार में लगी संस्थाओं को मजबूती मिलेगी, उनमें प्रतिस्पर्धा बढेगी और चूंकि इस व्यापार पर राज्य की निगाह होगी इसलिए लघुवनोपज के अधिकारी समुदाय के शोषण की आशंका कम होगी।

प्रश्न- क्या ग्राम-सभा लघु वनोपज के संदर्भ में ट्रांजिट-परमिट जारी कर सकती है, और अगर ऐसा होता है तो फिर मौजूदा ट्रांजिट-नियमों का क्या होगा?

उत्तर- हां, ग्राम-सभा को वनाधिकार कानून के तहत लघु वनोपज के मामले में ट्रांजिट-परमिट के नियमन का अधिकार है।

6 सितंबर 2012 को जारी वनाधिकार कानून के संशोधनों में कहा गया है कि लघु वनोपजों की ढुलाई के बाबत ट्रांजिट परमिट ग्राम-सबा द्वारा गठित समिति या उसके द्वारा अधिकृत कोई व्यक्ति नियम 4(1)(e) के अंतर्गत जारी कर सकता है। इस नियम में आगे यह भी स्पष्ट किया गया है कि ट्रांजिट-परमिट के संदर्भ में ग्राम-सभा इस समिति के सारे फैसलों का अनुमोदन करेगी।

राज्यों- केंद्रशासित प्रदेशों को चाहिए कि वे लघु वनोपज की ढुलाई के संबंध में ट्रांजिट-परमिट से बावस्ता अपने मौजूदा नियमों को वनाधिकार कानून के प्रावधानों के हिसाब से संशोधित करें और उसे वनाधिकार कानून के समरुप बनायें।

प्रश्न- पेसा कानून के अंतर्गत लघु वनोपज पर मालिकाना हक ग्राम-सभा को दिया जा चुका है। ऐसे में क्या जरुरत आन पड़ी थी कि कि वनाधिकार कानून के विविध प्रावधानों के अंतर्गत लघु वनोपज पर मालिकाना हक और नियमन का अधिकार एसडीएलसी / डीएलसी को दिया गया और इसकी वैधानिकता क्या है?

उत्तर- पेसा कानून की अमलदारी अधिसूचित क्षेत्र तक सीमित है इस कारण इस कानून में लघु वनोपज पर अधिकार उन्हीं ग्राम-सभाओं को दिया गया है जो अधिसूचित क्षेत्र में हैं। आदिवासी जन-समुदाय का एक बड़ा हिस्सा अधिसूचित क्षेत्र से बाहर भी रहता है। इसके अतिरिक्त पेसा-कानून में नहीं कहा गया कि प्रत्येक अधिकार-धारक को प्रशासन की तरफ अधिकार-धारण का पत्र लिखित रुप में दिया जाएगा जबकि वनाधिकार कानून में ऐसा अनिवार्य किया गया है।

एसडीएलसी/डीएलसी सिर्फ अधिकारों को चिह्नित करने की प्रक्रिया के हिस्सा भर हैं। लघु वनोपज से संबंधित नियमन का अधिकार ग्राम-सभा को है।

कृपया ऐसे अन्य शंका-समाधान के लिए यहां क्लिक करें।

 


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