वनाधिकार

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[inside]अजय दांडेकर और चित्रांगदा चौधरी द्वारा प्रस्तुत  पेसा, लेफ्ट-विंग एक्सट्रीमिज्म एंड गवर्नेंस: कन्सर्नस् एंड चैलेंजेज इन इंडियाज् ट्रायबल डिस्ट्रिक्टस् नामक रिपोर्ट[/inside](इंस्टीट्यूट ऑव रुरल मैनेजमेंट, आणंद) के अनुसार, http://www.downtoearth.org.in/dte/userfiles/images/PESAcha
pter.pdf
: 



    • भारत की आबादी में जनजातीय समुदाय के लोगों की संख्या 8.2% है यानी हर 100 भारतीय में तकरीबन 8 व्यक्ति जनजातीय समुदाय के हैं। यह समूह सांस्कृतिक रुप से विशिष्ट और आर्थिक-राजनीतिक-सामाजिक रुप से अत्यंत कमजोर है।


    • साल 1996 में संसद ने पंचायत(एक्सटेंशन टू शिड्यूल्ड एरिया) एक्ट यानी पेसा कानून पारित किया। इस कानून को पारित करके नेतृवर्ग ने माना कि अधिसूचित क्षेत्र-पाँच के अंतर्गत रहने वाले समुदायों के अधिकार और संसाधनों की रक्षा अत्यंत जरुरी है, और इसके लिए इन समुदायों को स्वशासन का अधिकार देना होगा। दिलीप सिंह भूरिया समिति ने इस मसले पर काम किया था और इस समिति के अध्यक्ष के रुप में दिलीप सिंह भूरिया ने कहा कि पेसा कानून आदिवासी समुदाय के इतिहास में एक नए युग की शुरुआत की तरह है।

    • पेसा कानून ने ग्राम-सभा को मान्यता दी है और उसे प्रमुख माना है( यह निर्वाचित ग्राम-पंचायत से भिन्न है। ग्राम-सभा किसी प्राकृतिक वासस्थान में रहने वाले समुदाय के सदस्यों से बनती है। समुदाय के हर व्यस्क व्यक्ति इसका सदस्य होता है।

    • पेसा कानून के अन्तर्गत आदिवासी स्वशासन की परिकल्पना कुछेक आधार-बिन्दुओं के इर्द-गिर्द की गई है, जैसे प्राकृतिक वास स्थान की मान्यता और उस वासस्थान में रहने वाले समुदाय को वास-स्थान का अभिन्न हिस्सा मानना।

    • साल 1996 में पारित किए जाने के समय इस कानून के माध्यम से अपेक्षा की गई कि वे नौ राज्य जहां अधिसूचित क्षेत्र- 5 के तहत दर्ज इलाके हैं, पेसा कानून की भावनाओं के अनुरुप अपने विशेष कानून तैयार करेंगे और अपने इलाके के आदिवासी समुदायों को विशेष अधिकार देंगे। साथ ही अपेक्षा की गई कि अगर इन राज्यों में पहले से कोई ऐसा कानून मौजूद है जो पेसा कानून की भावनाओं के विपरीत है तो उसमें सुधार करके उसे एक साल के अंदर पेसा कानून की भावनाओं के अनुरुप बनाया जाएगा।

    • विभिन्न राज्यों ने अपने प्रदेश के पंचायत राज कानून में पेसा कानून के प्रावधानों को अलग-अलग रुप में अपनाया है। मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ इस मामले में सर्वाधिक प्रावधानों को अपनाने वाले राज्यों में हैं।

    • राज्यसत्ता के विभिन्न अंग अधिसूचित क्षेत्र-पाँच के अन्तर्गत आने वाले इलाकों से संबद्ध पेसा कानून के प्रावधानों को सुसंगत रीति से जोड़कर नहीं देखते।

    • इस कानून का क्रियान्वयन अधिसूचित क्षेत्र में अभिशासन के पूर्ण रुपांतरण की क्षमता रखता है। कानून के क्रियान्वयन और आदिवासी मामलों से जुड़े मुद्दों की देखरेख का जिम्मा औपचारिक रुप से दो मंत्रालयों के अन्तर्गत है। इनके नाम हैं- पंचायती राज मंत्रालय और आदिवासी मामलों का मंत्रालय। ये दोनों मंत्रालय पेसा कानून के मामले में आपस में संवाद में नहीं रहते और एक-दूसरे से अलग-थलग रहकर काम करते हैं।

    • इस कानून के बारे में जन-सामान्य के बीच जानकारी और समझ कदरन कम है। प्रशासक और राजनेता भी इस कानून के मूलगामी स्वभाव से अपरिचित हैं।.

    • पेसा कानून के बारे में जानकारी के प्रसार की दिशा में प्रयास ना के बराबर हुए हैं।

    • ऐसे कई उदाहरण हैं जहां राज्यों ने पेसा कानून के प्रावधानों के अनुरुप अपना विधान तैयार करते समय मूल प्रावधान की ताकत को शब्दों के हेर-फेर से कम करने की कोशिश की है। मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ को छोड़ दें तो ज्यादातर राज्यों की विधायिका ने इस कानून के अनुरुप बने प्रावधानों के सहारे ताकत ग्रामसभा के बदले ग्राम-पंचायत को सौंपी है जो कि पेसा कानून के सेक्शन 4 (n) का उल्लंघन है।

    • प्रदेशों में इस कानून के अनुरुप जो प्रावधान किए गए हैं उनमें यह नहीं बताया गया है कि समुदाय अपनी शक्ति का इस्तेमाल जमीन, विस्थापन, शराब-बंदी आदि के मामले में कैसे करेगा।  प्रावधानों में यह भी नहीं बताया गया कि समुदाय के अधिकारों का उल्लंघन होता हो तो वे अपनी शिकायत के निवारण के लिए क्या करेंगे। सिर्फ मध्यप्रदेश के पेसा-अनुरुपी कानून में भूमि-अधिग्रहण के बारे में थोड़ा बताते हुए कहा गया है कि आदिवासी समुदाय को अधिग्रहित की गई जमीन वापस नहीं मिलती तो वह तीन महीने बाद आधिकारिक तौर पर इसके लिए शिकायत कर सकता है।

    • अधिकतर राज्यों में लघु-खनिज, जल-भंडारों के प्रबंधन और नियंत्रण, लघुवनोपज के प्रबंधन और नियंत्रण तथा भूमि-अधिग्रहण को रोकने से संबंधित कानून या तो हैं ही नहीं या फिर अस्पष्ट हैं। इससे साबित होता है कि राज्य सरकारें पेसा कानून की भावनाओं के अनुरुप काम नहीं कर रही हैं। आंध्रप्रदेश और गुजरात में तो पेसा कानून के तर्ज पर विधान का बनाया जाना अभी शेष ही है।


    • इस कानून की धाराT4(i) में कहा गया है कि भूमि-अधिग्रहण से पहले सम्मति ली जाएगी, लेकिन सम्मति की इस प्रक्रिया को अनेक राज्यों में औपचारिक रुप नहीं दिया गया है। मध्यप्रदेश( छत्तीसगढ़) ने ग्राम-सभाओं से भूमि-अधिग्रहण करने से पहले के सम्मति हासिल करने की प्रक्रिया के बारे में साल 2000 में विस्तृत नियम बनाये। इन नियमों में कहा गया है कि भूमि-अधिग्रहण की अधिसूचना जारी करने से पहले ग्राम-सभाओं से जरुरी सम्मति हासिल की जाएगी।

    • इस कानून के उपखंड 4(k) और 4(l) में कहा गया है कि लघु-खनिजों की लीज देने  के मामले में ग्राम सभा से सम्मति ली जाएगी लेकिन खान संबद्ध मंत्रालय द्वारा जारी निर्देशों के बावजूद लीज देने से पहले सम्मति हासिल करने प्रक्रिया पर अमल करने के मामले में राज्यों ने अनसुनी की है। इस संदर्भ में मध्यप्रदेश राज्य द्वारा बनाये गए विधानों को सर्वाधिक प्रगतिशील कहा जा सकता है।


    • साल 2009 के दिसंबर महीने में पंचायती राज मंत्रालय ने नौ राज्यों को इस कानून से जुड़े सर्वाधिक महत्वपूर्ण बिन्दुओं का एक मसौदा भेजा लेकिन इस पर समयबद्ध तरीके से राज्यों ने अमल नहीं किया। मसौदे में यह बात तो कही गई है कि समुदाय-विशेष को अधिकार देना जरुरी है लेकिन समुदाय के अधिकारों का उल्लंघन हो तो कौन-से दंडात्मक कदम उठाए जायेंगे, इसके बारे में कुछ नहीं कहा गया है।
     
    • इस कानून के लागू होने के बाद से राज्यपाल इस कानून में वर्णित अपने दायित्वों के निर्वाह नें कोताही बरत रहे हैं। कई पेसा-गांवों में सहभागिता आधारित स्वशासन से अपेक्षित शांति-स्थापना की प्रक्रिया ठप्प पड़ी हुई है।

    • विगत सालों में केंद्र को राज्यपालों ने जो सालाना रिपोर्ट सौंपी है उनके विश्लेषण से पता चलता है कि इन रिपोर्टों में वस्तुगत स्थिति के आकलन का ध्यान नहीं रखा गया है। बस, विभिन्न योजनाओं के अंतर्गत किए गए आबंटन और लक्ष्यों के बारे में जैसे-तैसे एक सूची बना दी गई है। किसी भी रिपोर्ट में आदिवासी इलाकों से जारी विस्थापन, पलायन, प्रशासन की ढिलाई और हिंसात्मक गतिविधियों सरीखे विषयों को नहीं छुआ गया है।

    • केंद्रीय भू-अधिग्रहण कानून में ऐसा कोई बदलाव अभी तक नहीं किया गया है जिससे जाहिर हो कि इस कानून को पेसा-कानून की भावनाओं के संगत बनाने की कोशिश की गई है। भू-अधिग्रहण कानून की जगह लाया जाना वाला नया कानून अभी संसद में पेश किया जाना बाकी है।

    • पेसा-कानून ने ग्राम-सभा को अधिकार दिया है कि वह आदिवासी-भूमि को गैर-आदिवासी हाथों में जाने से रोके। द ओडीसा शिड्यूल्ड एरियाज् ट्रांसफर ऑव इमोवेवल प्राप्रटी एक्ट से इस सिद्धांत को मजबूती मिली है। लेकिन ये नियम जमीनी स्तर पर कारगर नहीं हो पा रहे। यह बात 2002 के संशोधन में कही गई है।.

    • वनाधिकार कानून यानी शिड्यूल्ड ट्राईब्स एंड अदर ट्रेडिशनल फॉरेस्ट डेवलर्स(रिकॉग्निशन ऑव फॉरेस्ट राइट एक्ट) 2006 आदिवासी समुदाय के निरंतर संघर्ष और उनके हक को आवाज देते आंदोलनों का परिणाम है। इस कानून के जरिए माना गया कि जीविका के लिए वनोपज पर निर्भर समुदायों को वन-संपदा पर अधिकार है। इस कानून ने अंग्रेजी जमाने से चले आ रहे कानून की बातों को एकदम उलट दिया। यह कानून चूंकि ग्राम-सभा के अधिकारों को मान्यता देता है इसलिए पेसा-कानून की भावनाओं के अनुरुप है। लेकिन, नौकरशाही के नियंत्रण और वन-विभाग के अधिकारियों के रवैये के चलते समुदायों को वन-संपदा विषयक मिल्कियत हासिल नहीं हो रही। अप्रयाप्त प्रयास और जानकारी की कमी के कारण कानून का पालन कारगर तरीके से नहीं हो पा रहा।

    • देश में जिन 76 जिलों को वामपंथी अतिवाद से पीड़ित घोषित किया गया है उनमें 32 जिले पेसा-कानून के दायरे में वर्णित इलाकों वाले जिले हैं।




Rural Expert


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