विस्थापन

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विशेष आर्थिक क्षेत्रों (SEZs) के बारे में सिविल सोसायटी संगठन- साउथ एशियासिटिजन्स वेब- की तरफ से तैयार एक नागरिक रिपोर्ट के मुताबिक SEZs से संबंधित प्रमुख आंकड़े निम्नलिखित हैं  http://www.sacw.net/IMG/pdf/CITIZENSREPORTONSEZs.pdf

-    पूरे भारत में कुल 1,50,000 हेक्टेयर जमीन (राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र के बराबर के इलाके) का अधिग्रहण होना है। यह मुख्य रूप से खेती की और खासकर साल में अनेक फसल पैदा करने वाली जमीन है। इन पर दस लाख टन अनाज की पैदावार हो सकती है। अगर SEZs को सफल होना है, तो भविष्य में और भी ज्यादा खेती की जमीन का अधिग्रहण होगा और उससे देश की खाद्य सुरक्षा खतरे में पड़ेगी।

-    विशेष आर्थिक क्षेत्रों से संबंधित ताजा आंकड़ों के मुताबिक SEZs को मंजूरी देने के लिए अधिकृत वाणिज्य मंत्रालय के बोर्ड ऑफ अप्रूवल ने 578 SEZs प्रस्तावों को मंजूरी दी है, जिनमें से 315 की अधिसूचना जारी कर दी गई है।

-    8 दिसंबर 2008 तक के आंकड़ों के विश्लेषण से यह सामने आया कि विशेष आर्थिक कानून, 2005 के बनने के बाद से शुरू हुए रुझान 2008 तक जारी थे।

-    दिसंबर 2008 तक केंद्र सरकार 19 राज्यों में 552 SEZs को मंजूरी दे चुकी थी, जिनमें से 272 के लिए अधिसूचना जारी कर दी गई थी। अप्रैल 2009 तक 578 SEZs को औपचारिक मंजूरी मिल चुकी थी और उनमें से 330 के लिए अधिसूचना जारी हो चुकी थी।

-    2008 के आखिरी महीनों में आई मंदी के बाद यह पहली बार देखने को मिला कि  कंपनियां अपने विशेष आर्थिक क्षेत्रों का पंजीकरण या अधिसूचना रद्द कराने केलिए अर्जी देने लगीं। उसका कुल असर क्या होता है, यह अभी सामने आना है।

-    SEZs का बड़ा हिस्सा सूचना तकनीक (आईटी) और उससे संबंधित उद्योगों के लिएहै। आईटी कंपनियों के लिए 181 SEZs हैं, जो कुल SEZs का 66% है। इनके अलावा आईटी के 341 SEZs ऐसे हैं, जिन्हें मंजूरी मिल चुकी है, जबकि 11 को सिद्धांतरूप से मंजूरी मिल चुकी है।

-    अगर मंजूरी के विभिन्न स्तरों पर मौजूद सभी SEZs पर गौर किया जाए तो आईटी सेक्टर का हिस्सा 55% प्रतिशत बनता है। दूसरा बड़ा सेक्टर बहु-उत्पाद कंपनियों का है, जो 9% है।

-    -अधिसूचित विशेष आर्थिक क्षेत्रों के लिहाज से राज्यों में सबसे आगे आंध्र प्रदेश है, जहां ये संख्या 57 है। तमिलनाडु में 44 और महाराष्ट्र में 43 SEZs के लिए अधिसूचना जारी हो चुकी है।

-    लेकिन अधिसूचना के लिए इंतजार में खड़े SEZs की सबसे ज्यादा संख्या महाराष्ट्र में है। वहां हरी झंडी पा चुके 104 और सिद्धांत रूप से मंजूर 34 SEZs अधिसूचना का इंतजार कर रहे हैं। आंध्र प्रदेश में यह संख्या क्रमशः 99 और 2, और तमिलनाडु में 66 और 18 है।

-    इस तरह इन तीन राज्यों में ही देश के लगभग आधे SEZs हैं। अधिसूचित SEZs के मामलों में भी यह संख्या महत्त्वपूर्ण है। कुल 274 में से 144 ऐसे SEZs इन राज्यों में हैं।

-    अगर राज्यों के भीतर स्थलों पर गौर किया जाए तो यह इलाकाई असंतुलन और नजर आता है। आंध्र प्रदेश में औपचारिक रूप से मंजूरी पा चुके 99 में से 48 SEZs हैदराबाद में या उसके आसपास हैं। तमिलनाडु में मंजूर 66 में से 34 SEZs चेन्नई में या उसके आसपास हैं।

-    -इस तरह यह कहा जा सकता है कि विशेष आर्थिक क्षेत्रों की सबसे ज्यादा
-    संख्या मुख्य रूप से आईटी सेक्टर में और पश्चिमी या दक्षिणी राज्यों के शहरों में मौजूद है।

-    वैसे हर राज्य ने कम से कम दो SEZs हासिल करने की कोशिश जरूर की है। छोटे से केंद्र शासित प्रदेश दादरा और नगर हवेली में चार और पॉन्डिचेरी में भी एक  SEZ को मंजूरी मिल चुकी है।

-    53 बहु-उत्पाद SEZs मंजूरी की अग्रिम अवस्था में हैं। यानी उनके लिए जल्द
-    ही अधिसूचना जारी हो सकती है। ये वो क्षेत्र हैं, जिनके लिए बड़े इलाके की
-    जरूरत है और जिनसे होने वाले विस्थापन के खिलाफ संघर्ष चल रहा है।

-    हाल ही में 5,000 हेक्टेयर से ज्यादा SEZs पर रोक लगाने वाले नियम को हटा लिया गया, जिससे अडानी ग्रुप की उसके तीन विशेष आर्थिक क्षेत्रों (4498 + 2658 + 2648 हेक्टयर) के विलय की अर्जी को मंजूरी मिल सकी। पहले इस ग्रुप ने भूमि सीमा से बचने के लिए गुजरात में मुदंरा के पास ये तीन अलग-अलग SEZs बनाए थे।

-    सबसे बड़े विशेष आर्थिक क्षेत्रों में अडानी के मुंदरा स्थित SEZ के अलावा एपीआईआईसी के विशाखापत्तनम और काकीनाडा स्थित SEZ हैं, जो क्रमशः 2,206 और  1,035 हेक्टेयर में हैं। महाराष्ट्र में नवी मुंबई SEZ 1,223 हेक्टेयर में है।

-    कई बड़े विशेष आर्थिक क्षेत्र मंजूरी मिलने की अग्रिम अवस्था में हैं, जिनके लिए 1 लाख 22 हजार हेक्टेयर यानी औसतन प्रति SEZ 869 हेक्टेयर जमीन की जरूरत होगी।

 मुद्दे
-    बड़े पैमाने पर जमीन की आवश्यकता और भूमि का जबरन अधिग्रहण- मांग के आधार पर SEZ बनाने का भारत में अपनाया गया तरीका अनोखा है। मतलब यह कि यहां SEZ की जगह, आकार और प्रकार पर फैसला सरकार की आर्थिक नीति के मुताबिक नहीं, बल्कि निजी पूंजी की मांगों के मुताबिक हो रहा है।

-    केंद्रीय वाणिज्य मंत्रालय और मंत्रियों के अधिकार-प्राप्त समूह द्वारा 15 जून 2007 को यह दिशा निर्देश जारी किया गया कि निजी SEZs के लिए जबरन भूमि अधिग्रहण ना किया जाए। इसके बावजूद लगभग सभी राज्य निजी SEZs के लिए 1894 के भूमि अधिग्रहण कानून का इस्तेमाल भू अर्जन के लिए कर रहे हैं और वह भी पुनर्वास के बिना किसी प्रावधान के।

-    तमिलनाडु और आंध्र प्रदेश जैसे कुछ राज्यों में तो जमीन के अनिवार्य अधिग्रहण के लिए सरकारें भूमि अधिग्रहण कानून की आपात धारा 17/4 का इस्तेमाल कर रही हैं। यह दलील दी जा रही है कि SEZs को दी जा रही काफी जमीन पहले से राज्य औद्योगिक विकास निगमों के पास उपलब्ध रही है। लेकिन यहां बात ध्यान देने की है कि कई मामलों में इन निगमों ने जो जमीन अधिग्रहीत की थी और जिसे अब SEZ को दिया जा रहा है, वह अधिग्रहण भी भू अर्जन कानून के तहत ही हुआ था।

-    किसानों से जिस कीमत पर वह जमीन ली गई थी, निश्चित रूप से आज उससे बहुत ऊंची दर उसे बेचा जा रहा है।
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-    जमीन मालिकों को बाजार दर पर मुआवजा देने का मुद्दा भी निरर्थक है, क्योंकि पूरा सौदा निजी खरीदारों और सरकारी औद्योगिक निगमों के पक्ष में झुका हुआ है।पैकेज की कीमत भी आखिर वही तय करते हैं।



बिना के मुआवजे के विस्थापित हुए भूमिहीन और खेतिहर मजदूर

-    भारत में लगभग 80% कृषि आबादी के पास कुल कृषि भूमि का सिर्फ 17% हिस्सा है। यानी यह आबादी लगभग भूमिहीन मजदूर ही है। जितने जमीन के मालिक हैं, उनसे कहीं ज्यादा परिवार और समुदाय जमीन के किसी टुकड़े पर (मजदूरी, चरागाह आदि के रूप में) निर्भर करते हैं। जबकि मुआवजे की चर्चा सिर्फ उनके लिए हो रही है, जो जमीन के मालिक हैं। जो मालिक नहीं हैं, उनके लिए किसी तरह के मुआवजे की योजना नहीं है।

-    गुजरात जैसे राज्यों में SEZs को जो जमीन दी जा रही है, उनमें बड़ा हिस्सा आम इस्तेमाल वाली जमीन का है (जिसे गलती से वेस्टलैंड यानी परती भूमि बता दिया गया है।) चूंकि ये साझा जमीन हैं, इनका कोई व्यक्ति मालिक नहीं है,इसलिए इन्हें बिना समुदायों या पंचायतों से राय-मशविरा किए हस्तांतरित किया जा रहा है।

-    तमिलनाडु में पंचामी भूमि यानी मंदिर की जमीन और आंध्र प्रदेश में वक्फ बोर्ड की जमीन को SEZs को सौंप दिया गया है। सार्वजनिक जमीन को हड़प कर निजी क्षेत्र को देने की यह एक मिसाल है।

-    खुल्लमखुल्ला जमीन हड़पने की सबसे ज्यादा घटनाएं आंध्र पर्देश में हो रही हैं, जहां सबसे ज्यादा संख्या में SEZs को मंजूरी मिली है। वहां दलितों और आदिवासियों को आवंटित की गई जमीन अब SEZs को दी जा रही है। पोलेपल्ली,काकीनाडा, चित्तूर और अनंतपुर में ऐसी घटनाएं देखने को मिली हैं।



कृषि आधारित एवं ग्रामीण अर्थव्यवस्थाओं का विनाश

SEZs के लिए अधिग्रहीत की जा रही ज्यादातर जमीन उपजाऊ, खेती की जमीन है। खासकर बहु-उत्पाद क्षेत्रों के लिए ऐसा किया जा रहा है। कृषि वैज्ञानिकों ने अनुमान लगाया है कि इससे करीब 1 लाख 14 हजार परिवार (हर परिवार में औसतन पांच सदस्य) और उनके अलावा उस जमीन पर आजीविका के निर्भर खेतिहर मजूदरों के 82,000 परिवार विस्थापित होंगे।

इससे किसानों और खेतिहर मजदूरों के परिवारों की आमदनी का कुल सालाना नुकसान 212 करोड़ रुपए होगा। यह अनुमान 2006 में SEZ की आरंभिक परियोजनाओं को मंजूरी मिलने के बाद लगाया गया था। आज इसमें तीन गुना बढ़ोतरी हो चुकी है।

श्रम कानून को रद्द किए जाने से शोषण आधारित रोजगार के अवसरों और कार्य-स्थितियों का निर्माण

सरकार की SEZ नीति के तहत राज्य श्रम आयुक्त के सारे अधिकार SEZs के विकास आयुक्तों को मिल जाते हैं।
 इन विकास आयुक्तों को अधिकार है कि वे SEZs को औद्योगिक विवाद कानून केतहत "सार्वजिक उपयोगिता सेवा" (public utility services) घोषित कर दें। इसकामतलब यह होगा कि SEZ क्षेत्र में मजदूरों को हड़ताल करने या यहां तक कि यूनियन बनाने और बेहतर वेतन एवं कार्य-स्थितियों के लिए सामूहिक सौदेबाजी करने का कोई अधिकार नहीं होगा।


आर्थिक परिणाम

-    वित्त मंत्रालय के एक अध्ययन के मुताबिक SEZs को दी गई कर छूट की वजह से सरकार को 2004-05 से 2009-10 तक 1,75,487 करोड़ रुपए के राजस्व का नुकसान हुआ।

-    केंद्र सरकार के परोक्ष करों के बारे में सीएजी की एक परफॉर्मेंस ऑडिट रिपोर्ट 11 मार्च 2008 को संसद में पेश की गई थी। सीएजी ने 370 SEZ इकाइयों का यह जानने के सीमित उद्देश्य से अध्ययन किया था कि क्या उन्होंने मौजूद कस्टम कानून, नियमों और अधिसूचनाओं आदि का पालन किया है। इस समीक्षा से यह साफ हुआ कि व्यवस्थागत एवं पालन संबंधी खामियों की वजह से सरकार को 2 अरब 46 करोड़ 72 लाख रुपए का नुकसान हुआ।




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