विस्थापन

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नहीं हासिल हुए घोषित लक्ष्य

- वाणिज्य मंत्रालय के सचिव ने मंजूर किया है कि जितने विशेष आर्थिक क्षेत्रों (SEZs) को मंजूरी दी गई है, उनमें से 40% कभी काम शुरू नहीं कर सकेंगे (सेज पर पानोस-कल्पवृक्ष मीडिया डायलॉग- दिसबंर 2008)। इसके अलावा SEZs से साढ़े तीन लाख रोजगार और इनमें 90,000 करोड़ रुपए के निवेश के दावों पर भी सवाल उठाए जा रहे हैं, क्योंकि इन आंकड़ों की विस्तृत एवं स्वंतत्र मूल्यांकन से पुष्टि अभी नहीं हुई है।

- इसके अलावा SEZs में ठेके के मजदूरों की स्थिति सबसे दयनीय है। अभी मौजूद  SEZs में न्यूनतम मजदूरी से भी नीचे वेतन दिया जाता है। 2007 में सेन और दासगुप्ता ने एक सर्वे में पाया कि नोएडा SEZ में मजदूरों को नौ घंटे काम करने पर 80 रुपए प्रति दिन के हिसाब से मजदूरी दी जाती थी। यही हाल पश्चिम बंगाल के फाल्टा में भी था।  
- भारत सरकार की नीति रही है कि किसी विशेष आर्थिक क्षेत्र में न के बराबर दखल दिया जाए। निर्यात उन्मुखता के दावों के बावजूद किसी सेज कारखाने पर सिर्फ एक ही अस्पष्ट शर्त लगाई जाती है। वो यह कि वो धनात्मक कुल विदेशी मुद्रा संतुलन का पालन करेंगे। यह भी क्षेत्र के भीतर सिर्फ औद्योगिक इकाइयों पर ही लागू होता है। अगर सेज का मकसद निर्यात है, तो निश्चित रूप से इन विशेष क्षेत्रों पर कहीं सख्त धाराएं लागू की जानी चाहिए।


यहां इस बात का जिक्र जरूर होना चाहिए कि विश्व अर्थव्यवस्था में आई महामंदी सेज को बढ़ावा देने के लिए लिहाज के कोई अच्छा संकेत नहीं है, क्योंकि मंदी के परिणामस्वरूप निर्यात का बाजार लगातार सिकुड़ेगा और संरक्षणवाद हावी होगा।

इसके अलावा यह भी साफ नहीं किया गया है कि अगर निर्यात की शर्तें कोई कंपनी पूरा नहीं करती है, तो उसके साथ क्या किया जाएगा।
 
इसी तरह यह साफ नहीं किया गया है कि अधिसूचना रद्द करने की प्रक्रिया क्या होगी। कंपनियों द्वारा मंदी के साथ अधिसूचना रद्द करने की बढ़ती मांग से यह खामी खुल कर सामने आ गई है। उस हालत में जमीन का क्या होगा? क्या यह किसानों को लौटाई जाएगी? अगर हां, तो कैसे?
 
सेज कानून (धाराएं 9, 11, 12 और 31) अधिकार वापस केंद्र और नौकरशाही को दे देता है। ऐसा बोर्ड ऑफ अप्रूवल, डेवलपमेंट कमिश्नर और सेज ऑथरिटी के निर्माण के माध्यम से किया गया है। ऐसे में जवाबदेही किसकी होगी, यह तय नहीं है।

तथ्य यह है कि सेज अपने नियम खुद बनाएंगे, उन्हें पर्यावरण एवं श्रम संबंधी मंजूरी का अधिकार होगा, उनकी अपनी सुरक्षा व्यवस्था होगी। इसका मतलब यह है कि वे एक निजीकृत स्वायत्त इकाई होंगे, जहां मौजूदा संवैधानिक अधिकारों पर अमल मुश्किल होगा।
 

विशेष आर्थिक क्षेत्रों के लिए अलग अदालतों का गठन मौजूदा न्यायिक प्रणाली का मखौल उड़ाना है। यह साफ नहीं है कि उन क्षेत्रों में चुनाव कैसे होंगे और संविधान के 73वें/74वें संशोधनों के तहत स्थापित ग्राम सभा/ नगरपालिका जैसी स्वशासन की संस्थाओं का क्या होगा।
 
बोर्ड ऑफ अप्रूवल द्वारा सेज प्रस्तावों के चयन, सुधार एवं अस्वीकृति के लिए तय दिशानिर्देशों में कोई पारदर्शिता नहीं है। प्रशासनिक सुधार समिति के पूर्व अध्यक्ष एम वीरप्पा मोइली की रिपोर्ट में कहा गया था कि 'बोर्ड ऑफ अप्रूवल में ऐसे लोगों को रख कर जो वस्तुगत और संतुलित नजरिया अपना सकें, इस संस्था को पुनर्गठित करने की जरूरत है।'  

वाणिज्य मंत्रालय ने सेज के बारे में हुए अध्ययनों/ अन्य देशों से तुलना के बारे में सार्वजनिक घोषणाएं की थीं। किरित सोमैया ने इस बारे में एक आरटीआई याचिका दायर की। उन्हें दिए गए जवाब में यह टिप्पणी की गई- "निकटस्थ देशों बांग्लादेश और श्रीलंका को हुए निर्यात का अध्ययन किया गया है। इसके अलावा कोई और अध्ययन या वैज्ञानिक विश्लेषण उपलब्ध नहीं है।

वाणिज्य मंत्रालय ने आरटीआई कानून 2005 के तहत स्वीकृत परियोजनाओं के बारे में मांगी गई जानकारी को "व्यापार गोपनीयता" की दलील देते हुए देने से इनकार कर दिया।

पर्यावरण संबंधी मंजूरी देने के ईआईए अधिसूचना और सेज कानूनों के बीच मौजूद प्रक्रियाओं पर गौर करें, तो इन दोनों के बीच भारी अस्पष्टता और अंतर्विरोध नजर आते हैं।

हालांकि सेज के तहत बनने वाली इकाइयों को पर्यावरण संबंधी मंजूरी की जन सुनवाइयों से छूट दी गई है, लेकिन लेकिन खुद सेज को जन सुनवाई से गुजरना पड़ता है। लेकिन मुंदरा सेज जैसी मिसालें भी हैं, जहां पर्यावरण मंत्रालय ने बहु-उत्पाद सेज की स्थापना के लिए जन सुनवाई से छूट देने की सिफारिश की थी।  

गोवा औद्योगिक विकास निगम के बारे में जून 2008 में भारत सरकार को सौंपी गई सीएजी की रिपोर्ट में निम्लिखित निष्कर्ष निकाले गए (रिपोर्ट से उद्धरण)-   
- निगम ने जमीन के अधिग्रहण और उसे सीधे उद्यमी को आवंटित करने के नियम से भटकते हुए भूमि किसी अन्य को देने के लिए डेवलपर्स को आवंटित कर दी।

- बिना किसी पारदर्शी चयन प्रक्रिया के आवंटन किए गए।
- सेज के लिए आवंटन बिना विज्ञापन दिए कर दिए गए। यह काम राज्य सरकार द्वारा सेज नीति बनाने के पहले ही कर दिया गया।
- आईजीसी (औद्योगिक विकास केंद्र) योजना के तहत लघु एवं मध्यम उद्योगों के लिए अधिग्रहीत जमीन भारत सरकार के दिशानिर्देशों का उल्लंघन करते हुए सेज को आवंटित कर दी गई।
- वेरना फेज IV (हाउस सेज के प्रस्तावित औद्योगिक एस्टेट) की प्रीमियम दर का संशोधन एक बड़े हिस्से को निम्न दर आवंटित करने के बाद ही किया गया, जिससे 36.89 करोड़ रुपए की हानि हुई।
- चार विशेष आर्थिक क्षेत्रों को आवंटित जमीन से लगी जमीन का कम दर पर आवंटन किए जाने से 39.47 करोड़ रुपए का नुकसान हुआ।
- दो सेज डेवलपर्स को बिना किसी स्वीकृत फॉर्मूले के 14.36 लाख वर्ग मीटर जमीन के आवंटन से 17.76 करोड़ रुपए की हानि हुई।

(स्रोतः कॉम्पट्रोलर एंड ऑडिटर जेनरल ऑफ इंडिया, गोवा स्टेट रिपोर्ट, अध्याय- VII सरकार की  वाणिज्यिक एवं व्यापारिक गतिविधियां)



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