विस्थापन

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भारत में बांध, विस्थापन, नीति और कानून विषय पर योजना आयोग का एक अध्ययन: (http://planningcommission.nic.in/reports/articles/ncsxna/a
rt_dam.pdf
)

आजादी के बाद भारत में नियोजित विकास की नीति अपनाई गई। इसमे नीति निर्माताओं की एक खास प्राथमिकता सिंचाई और बिजली पैदा करने के लिए जल संसाधनों के उपयोग की रही। आजादी के बाद आरंभिक वर्षों में ही भाखड़ा, हीराकुड, तुंगभद्रा, और दामोदार घाटी बांध जैसी जल संचय की बड़ी परियोजनाएं लागू की गईं।

बड़े बांधों की कई परियोजनाओं के बारे में स्वतंत्र अनुभजन्य अनुसंधान से यह बात साबित हुई है कि कैसे इन परियोजनाओं का नियोजन करते समय उनसे जुड़ी सामाजिक, मानवीय और पर्यावरण संबंधी कीमत की अनदेखी की गई या उन्हें कम करके बताया गया। बड़े बांधों के ऐसे जिन पक्षों की उपेक्षा की गई, उनमें से कुछ के समाज और मानवीय जीवन के लिए बेहद गंभीर परिणाम हुए।

आजादी के बाद बड़ी परियोजनाओं से विस्थापित हुए लोगों के बारे में कोई विश्वसनीय सरकारी आंकड़ा मौजूद नहीं है। कई अनुसंधानकर्ताओं ने यह अनुमान एक से ढाई करोड़ तक बताया है। 1989 में एक प्रभावशाली अध्ययन में फर्नांडिस, दास और राव ने दो करो़ड़ दस लाख लोगों के विस्थापन का अनुमान पेश किया। मशहूर विद्वान और प्रशासक डॉ. एनसी सक्सेना ने 1947 के बाद से बड़ी परियोजनाओं द्वारा विस्थापित हुए लोगों की संख्या इससे दो गुना से भी ज्यादा- पांच करोड़ बताई है।

अधिकांश परियोजनाओं के नियोजन की शुरुआत और विस्थापन एवं पुनर्वास के विभिन्न चरणों के दौरान यह अपेक्षा की जाती है कि जिन लोगों पर परियोजनाओं का बुरा असर पड़ रहा है, उनकी राय जानी जाए और इस रूप में उन्हें जानकारी दी जाती रहे, जिससे वे अपने उजड़े जीवन को यथासंभव सर्वश्रेष्ठ ढंग से फिर से बसा सकें। लेकिन हकीकत इससे बहुत दूर है। अध्ययनों से यह बात सामने आई है कि बांध, डूब और उससे होने वाले विस्थापन के बारे में प्रभावित लोगों के पास बेहद कम सूचना थी।

यह सिर्फ हाल के वर्षों के में ही हुआ है, और वह भी जन आंदोलनों के असर से, जब परियोजना अधिकारियों, राज्य सरकारों और अंतरराष्ट्रीय फंडिंग एजेंसियों ने ऐसे पुनर्वास को अपनी जिम्मेदारी के रूप में स्वीकार किया है, जिसमें लोगों से ली गई उनकी जायदाद के बदले नकदी मुआवजे से आगे जाने और उन्हें घर बनाने की जगह देने के बारे में सोचा जाता है। पुनर्वास की उपेक्षा उन पुरानी परियोजनाओं के मामले में सबसे गंभीर दिखती है, जो आजादी के बाद पहले तीन दशकों में शुरू हुईं या शुरू होकर पूरी हो गईं।

यह देखा गया है कि परियोजना अधिकारियों का प्रेरक उद्देश्य प्रभावित परिवारों की जिंदगी धीरे-धीरे कम कष्टकर बनाना और इसके लिए उन्हें दोबारा बसने योग्य बनाना एवं इस कार्य में मददगार बनना नहीं रहा है। बल्कि अक्सर उनका एकमात्र उद्देश्य डूब वाले इलाकों को खाली करना रहा है और इसके लिए जरूरत पड़ने पर राज्य की निर्मम ताकत का इस्तेमाल भी किया गया है। अक्सर गांवों को निर्ममता के साथ खाली कराया गया है और गांववासियों को असहाय हालत में छो़ड़ दिया गया है।

पुनर्वास स्थल अक्सर कई मायनों में रहने लायक अवस्था में नहीं रहे हैं। इन स्थलों का चयन आजीविका के अवसरों की उपलब्धता या विस्थापित लोगों की प्राथमिकताओं का बिना ख्याल किए किया गया है।

सामुदायिक और सामाजिक रिश्तों के नष्ट हो जाने से विस्थापित लोग अकेलेपन और असहायता की गहरी भावना से साथ जीने को मजबूर हो जाते हैं। नकद धन आने से पारिवारिक रिश्तों पर दबाव पैदा होता है। इसका परिणाम मनोवैज्ञानिक रोगों और शराबखोरी जैसी बुराइयों में सामने आता है। ऐसी शिकायतें विस्थापित आबादियों में आम रही है।

कहा जा सकता है कि विस्थापित लोगों पर सरकार द्वारा थोपी गई दयनीयता का सबसे बुरा पहलू कई बार विस्थापित होने की परिघटनाएं हैं। यह दस्तावेजों में दर्ज है कि सिंचाई, ताप बिजली और कोयला खनन एजेंसियों के बीच तालमेल की कमी के कारण सिंगरौली में ज्यादातर विस्थापित दो या तीन दशकों के भीतर कम से कम दो बार उजड़े। कुछ तो तीन या चार बार भी विस्थापित हुए।

इस गंभीर समस्या की अक्सर अनदेखी की गई है कि विस्थापितों को जहां बसाया जाता है, वहां पहले से मौजूद लोग उन्हें स्वीकार करने में अनिच्छुक रहते हैं।

बड़ी परियोजनाओं से विस्थापित आदिवासियों की बहुसंख्या पर लुप्त हो जाने का खतरा रहता है, क्योंकि वे प्राकृतिक संसाधनों पर ज्यादा निर्भर रहते हैं। उन्हें लगातार जायदाद खोने, बेरोजगारी, कर्ज-बंधुआ बनने और भुखमरी के दुश्चक्र में धकेल दिया जाता है।

आजीविका के पारंपरिक स्रोतों- भूमि, वन, समुद्र, नदी, चरागाह, पशु आदि- खोने से महिलाएं मजदूर बनने को विवश हो जाती हैं। ऐसी महिलाएं न सिर्फ स्वास्थ्य और पौष्टिकता की समस्या से पीड़ित हो गई हैं, बल्कि अपने बच्चों को सुरक्षित भविष्य दे सकने की क्षमता भी  को देती हैं।

विस्थापितों में एक और बेहद कमजोर समूह भूमिहीन विस्थापितों का है, जिनमें खेतिहर मजदूर भी शामिल हैं। भारतीय कानून में क्षतिपूर्ति का प्रावधान मात्र उन विस्थापित लोगों के लिए है, जिनकी जायदाद `सार्वजनिक उद्देश्य' की परियोजना के लिए ली जाती है। जबकि अधिग्रहीत जमीन पर अपनी आजीविका के लिए निर्भर भूमिहीन परिवार विस्थापन से सबसे गंभीर रूप से दरिद्र हो सकते हैं, क्योंकि वे अपनी जिंदगी के अकेले आर्थिक स्रोत को खो देते हैं। लेकिन कानून और ज्यादातर पुनर्वास नीतियों में ऐसे लोगों के अधिकार को कोई मान्यता नहीं दी गई है।



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