शिक्षा का अधिकार

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• अनुच्छेद २१-ए--- राज्य ६-१४ साल के सभी बच्चों को मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा प्रदान करेगा। शिक्षा किस रीति से प्रदान की जाय इसके बारे में राज्य कानून बना सकता है।.  (संविधान का ८६ वां संशोधन अधिनियम,२००२)

• अनुच्छेद ४१--- कुछेक मामलों में काम और शिक्षा के अधिकार तथा सरकारी सहायता प्रदान किए जाने की व्यवस्था की गई है। राज्य अपनी आर्थिक  क्षमता और विकास की सीमाओं के दायरे में काम और शिक्षा का अधिकार प्रदान करने की कारगर कोशिश करेगा। बेरोजगारी, बीमारी, बुढ़ापा, और इस जैसी अन्य परिस्थितियों में अगर जरुरत पड़े तो नागरिक को सरकार की तरफ से मदद मुहैया करायी जाएगी।

• अनुच्छेद-४५---बच्चों के लिए मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा का प्रावधान। संविधान के लागू होने के दस साल की अवधि के अंदर-अंदर राज्य १४ साल तक की उम्र के बच्चे को अनिवार्य और मुफ्त शिक्षा प्रदान करने के लिए कदम उठाएगा।

• बच्चे जब तक छह साल के नहीं हो जाते राज्य उनकी शुरुआती शिक्षा और देखभाल संबंधी व्यवस्था प्रदान करेगा।  (संविधान का ८६ वां संशोधन अधिनियम, २००२)।

• अनुच्छेद ४६ में अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और समाज के अन्य कमजोर तबके के शैक्षिक और आर्थिक हितों को बढ़ावा देने की बात कही गई है-राज्य विशेष ध्यान रखते हुए समाज के कमजोर वर्गों -खासकर अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के शैक्षिक और आर्थिक हितों को बढ़ावा देगा और हर तरह के शोषण और सामाजिक अन्याय से इनकी रक्षा करेगा।

कब क्या हुआ?(विभिन्न समाचार-पत्रों की रिपोर्ट के आधार पर संकलित)
http://infochangeindia.org/200812177540/Education/News/Rig
ht-to-Education-Bill-introduced-in-Rajya-Sabha.html

• सैकिया समिति की सिफारिशों के आलोक में सरकार नें साल १९९७ में ६-१४ साल के आयु-वर्ग के बच्चों को प्राप्त शिक्षा के अधिकार को बुनियादी अधिकार का दर्जा प्रदान करने के लिए संसद में ८३ वां संविधान संशोधन विधेयक पेश किया।

• सुप्रीम कोर्ट ने साल १९९३ के उन्नीकृष्णन फैसले में कहा था कि भारत के नागरिक को १४ साल की उम्र तक शिक्षा हासिल करने का बुनियादी अधिकार प्राप्त है।

• संविधान के ८६ वें संशोधन अधिनियम द्वारा ६-१४ साल के आयु वर्ग के बच्चों को मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा का बुनियादी अधिकार देने की बात कही गई है। शिक्षा का अधिकार अधिनियम संविधान के ८६ वें संशोधन को अमली जामा पहनाने का कानूनी रुप है।इस स्थिति तक पहुंचने में कुल ६१ साल लगे हैं।  (विधेयक का मूल प्रारुप पढ़ने के लिए देखें-
http://educationforallinindia.com/RighttoEducationBill2005.pdf 

• संविधान के ८६ वें संशोधन के द्वारा साल २००२ में जाकर स्वीकार किया जा सका कि नागरिकों को १४ साल की उम्र तक अनिवार्य और मुफ्त शिक्षा प्राप्त करने का अधिकार है। साल २००४ में सत्तासीन एनडीए ने इस अधिकार से संबंधित विधेयक का एक मसौदा तैयार किया लेकिन इसे संसद में पेश किए जाने से पहले ही एनडीए सरकार सत्ता से बाहर हो गई।

शिक्षा का अधिकार विधेयक-मुद्दे की बात

• बच्चों को अनिवार्य और मुफ्त शिक्षा हासिल करने का अधिकार देने वाला विधेयक(२००८) एक सहायक कानून है। इस कानून के बिना साल २००२ में शिक्षा के अधिकार को बुनियादी अधिकार का दर्जा देने का संसद का फैसला अमल में नहीं आ सकता।

• छह साल पहले(यानी २००२ में) ,संसद ने संविधान का ८६ वां संशोधन अधिनियम पारित किया था। इसके अन्तर्गत ६-१४ साल के ायु वर्ग के बच्चों को अनिवार्य और मुफ्त शिक्षा देने की बात कही गई। इससे जुड़े शिक्षा का अधिकार विधेयक में प्राथमिक शिक्षा से जुड़े मानकों की बात भी कही गई है-यानी शिक्षकों की न्यूनतम योग्यता क्या हो, छात्र-शिक्षक अनुपात कितना हो और शिक्षकों द्वारा निजी तौर पर ट्यूशन पढ़ाने की मनाही इत्यादि।

• विधेयक में उद्देश्य और कारण बताते हुए जो कुछ कहा गया है उससे कई बातें स्वयं स्पष्ट हो जाती हैं- ‘प्रस्तावित विधेयक इस प्रत्याशा के साथ पेश किया जा रहा है कि समानता, सामाजिक न्याय के मूल्य और लोकतंत्र तथा एक मानवीय और न्यायपरक समाज रचना सबको समावेशी प्रकृति की प्राथमिक शिक्षा देकर की जा सकती है।’

• इस विधेयक में आगे कहा गया है-‘समाज के वंचित और कमजोर तबके के बच्चों को संतोषजनक स्तर की मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा देने की जिम्मेदारी सिर्फ सिर्फ सरकार द्वारा संचालित या सरकारी सहायता प्राप्त स्कूलों की ही नहीं है बल्कि उन स्कूलों की भी है जिन्हें सरकारी सहायता नहीं मिलती।’ 

• विधेयक में प्रावधान है कि किसी बच्चे के पास अगर जन्म-प्रमाण पत्र नहीं है तो इस आधार पर उसे स्कूल में दाखिला लेने से नहीं रोका जा सकता। सरकार की जिम्मेदारी बनती है कि वह लक्षित आयु वर्ग के हर विद्यार्थी को कानून के लागू होने के तीन साल के अंदर नजदीकी स्कूल में शिक्षा मुहैया कराना शुरु कर दे।

• विधेयक में निजी स्कूलों के बारे में कहा गया है कि उन्हें हर साल पहली कक्षा की २५ फीसदी सीटों पर समाज के कमजोर और वंचित तबके के बच्चों को दाखिला देना होगा। सरकार इन बच्चों की पढ़ाई का खर्च वहन करेगी।

• विधेयक में कैपीटेशन फीस वसूलने पर प्रतिबंध लगाया गया है और उसे दंडनीय अपराध की श्रेणी में ऱखते हुए कहा गया है कि सजा के तौर पर स्कूल को वसूली जा रही कैपीटेशन फीस से दस गुनी ज्यादा रकम जमा करनी होगी। दाखिले के लिए बच्चे या फिर उसके अभिभावक जांच-परीक्षा करने की भी विधेयक में मनाही है। अगर इस नियम का कोई स्कूल उल्लंघन करता है तो पहली दफा उसे २५००० और दूसरी दफे ऐसा करने पर ५०००० रुपये का जुर्माना भरना होगा। प्राथमिक शिक्षा के पूरा होने से पहले किसी छात्र को स्कूल से निष्कासित या प्रतिबाधित नहीं किया जा सकता। छात्रों को शारीरिक दंड देना भी विधेयक में प्रतिबंधित है।

 


Rural Expert


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