सूचना का अधिकार

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                                            सूचना का अधिकार- कुछ अंतर्राष्ट्रीय मानकों की एक बानगी

 

  • "सूचना की स्वतंत्रता एक बुनियादी मानवाधिकार है..और इन सभी मानवाधिकारों की कसौटी है जिनके प्रति संयुक्त राष्ट्रसंघ प्रतिबद्ध है."
  • संयुक्त राष्ट्रसंघ की आमसभा ने साल १९६६ में नागरिक और राजनीतिक अधिकारों से संबंधित इंटरनेशनल कोवेनेंट ऑन सिविल एंड पॉलिटिकल राइटस् को स्वीकार किया। इसमें अभिमत की स्वतंत्रता(फ्री़म ऑव ओपीनियन) की गारंटी दी गई है।
    साल १९९३ में मानवाधिकारों से संबंधित संयुक्त राष्ट्र संघ के आयोग ने अभिमत और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता (फ्री़डम ऑव ओपीनियन एंड एक्सेप्रेसन)  से संबंधित एक विशेष पीठ की स्थापना की। इसे ऑफिस ऑव द यूएन स्पेशल रपॉटियर ऑन फफ्री़डम ऑव ओपीनियन एंड एक्सप्रेसन कहा जाता है। इसकी भूमिकाओं में एक है-अभिमत और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के दायरे में आने वाली बातों के बारे में स्पष्टता कायम करना।
    साल १९८० में राष्ट्रकुल के देशों के विधि मंत्रियों की एक बैठक बारबडोस में हुई। इस बैठक में कहा गया- "शासकीय और लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं में जनता की भागीदारी सबसे ज्यादा सार्थक तब होती है जब नागरिकों के पास पर्याप्त संख्या में आधिकारिक सूचनाएं होती हैं।".
  • साल १९९९ के मार्च महीने में राष्ट्रकुल के देशों के एक्सपर्ट ग्रुप की एक बैठक लंदन में हुई। इस बैठक में एक प्रस्ताव को मंजूर किया गया। इस प्रस्ताव में जानने के अदिकार और सूचना पाने की स्वतंत्रता को मानवाधिकार मानने के बारे में कई दिशानिर्देश दिये गए।
    साल १९९२ में पर्यावरण और विकास पर केंद्रित रियो उदघोषणा  के सिद्धांत-सूत्र १० में सबसे पहले इस तथ्य की पहचान हुई कि टिकाई विकास के लिए पर्यावरण सहित अन्य विषयों से जुड़ी जो जानकारियां सरकारी अधिकारियों के हाथ में हैं उन्हे सार्वजनिक करना जरुरी है ताकि पर्यावरण के लिहाज से एक सक्षम शासकीय ढांचे में लोगों की भागीदारी हो सके।
  • रियो उदघोषणा से जुड़ी नीतियों का एक सहायक दस्तावेज है-एजेंडा २१,ब्लूप्रिंट फॉर सस्टेनेबल डेवलपमेंट। इसमें कहा गया है कि किसी व्यक्ति, समूह या संगठन की पहुंच पर्यावरण और विकास से जुड़ी वैसी सूचनाओं तक होनी चाहिए जो सरकारी अधिकारियों या संगठनों के पास हैं। इन जानकारियों में वैसी उन उत्पादों और गतिविधियों की सूचनाएं भी शामिल हैं जिनका असर पर्यावरण पर पड़ सकता है अथवा सूचना को छुपाने के लिए किया जा सकता है।
  • अनेक देशों मे सूचना के अधिकार के संबंध में कानून हैं। इन्हें रियो घोषणा के अनुच्छेद १० में अंशतः या पूर्णतः संहिताबद्ध किया गया है।
  • साल १९९८ में रियो घोषणा और एजेंडा़ २१ के अनुपालन में संयुक्त राष्ट्रसंघ के योरोपीय आर्थिक आयोग(यूएनईसीई) के सदस्य देशों और योरोपीय संघ ने एक कानूनी रुप से बाध्यकारी संधि पर हस्ताक्षर किए। इस संधि में सूचना पाने की स्वतंत्रता, नीति-निर्धारण में जनता की भागीदारी और पर्यावरणीय मामलों में न्याय पाने की स्वतंत्रता के लिए हामी भरी गई है।
  • स्वीडेन में लागू फ्रीडम ऑव प्रेस एक्ट में विधान किया गया है कि अगर कोई नागरिक, नागरिक समूह अथवा संगठन मांग करे तो आधिकारिक दस्तावेजों में दर्ज सूचना सार्वजनिक करनी होगी।
  • कोलंबिया में सूचना के अधिकार से संबंधित कानूनों का इतिहास बड़ा पुराना है। कोलंबिया में एख कानून है कोड ऑव पॉलिटिकल एंड म्युनिस्पल आर्गनाइजेशन(१८८८)। इस कानून के अन्तर्गत नागरिकों को अधिकार दिया गया है कि वे सरकारी एजेंसियों अथवा सरकारी अभिलेखागार में सुरक्षित दस्तावेजों की जानकारी जरुरत पड़ने पर मांग सकें।
  • संयुक्त राज्य अमेरिका में साल १९६७ में सूचना के अधिकार से संबंधित एक कानून पारित हुआ। इसी राह पर आस्ट्रेलिया, कनाडा और न्यूजीलैंड में साल १९८२ में कानून बने।
  • एशिया में सबसे पहले सूचना के अधिकार को स्वीकार करने वाला देश फिलीपीन्स है। साल १९८७ में इस देश में सरकारी अधिकारियों और कर्मचारियों की आचार संहिता तैयार की गई और इसमें सूचना के अधिकार को मान्यता दी गई। हांगकांग में सूचना के अधिकार से संबंधित कानून १९९५ में बना जबकि थाईलैंड ऑफिशियल इन्फारमेशन एक्ट साल १९९७ के दिसंबर से अमल में आया। साल १९९८ में दक्षिण कोरिया में सूचना के अधिकार से संबंधित एक्ट ऑन डिस्क्लोजर ऑव इन्फारमेशन बाई पब्लिक एजेंसिज बना। जापान में सूचना के अधिकार से संबंधित कानून अप्रैल २००१ में बना।
  • अफ्रीकी देशों में सूचना के अधिकार को मान्यता देने वाला एकमात्र देश दक्षिण अफ्रीका है।

 

  


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