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[inside]भारतीय रिज़र्व बैंक की वार्षिक रिपोर्ट 2019-20 (अगस्त, 2020 में जारी)[/inside] में चरम मौसम की घटनाओं और पर्यावरण के बारे में कुछ टिप्पनियां की गई हैं (इस रिपोर्ट का उपयोग करने के लिए कृपया यहां क्लिक करें). वे इस प्रकार हैं:

जलवायु परिवर्तन के मॉडल के अनुरूप, भारत में वर्षा के अत्यधिक दिनों में बढ़ोतरी के साथ-साथ शुष्क दिनों की संख्या में भी वृद्धि हुई है - अधिक तीव्र सूखा; 2000 के बाद से 59 मिमी औसत बारिश में डाउवर्ड शिफ्ट; चक्रवातों की उच्च आवृत्ति – भारत में साल 2019 में 8 चक्रवात आए जोकि 1976 के बाद किसी साल में चक्रवातों की सबसे अधिक संख्या है; उच्च / सामान्य और कमी / अल्प मानसूनी बारिश से प्रभावित रहने वाले उपखंडों की संख्या में अधिक भिन्नता; और बेमौसम बारिश और भारी बाढ़ के कारण क्षतिग्रस्त हुई फसल के क्षेत्र में वृद्धि हुई है. कृपया संबंधित चार्ट देखने के लिए यहां क्लिक करें.

ग्लोबल वार्मिंग की वजह से भारत में साल 1901 और 2000 के बीच हुई 0.5 ° C की औसत तापमान वृद्धि की तुलना में साल 1997 और 2019 के बीच 1.8 ° C की वार्षिक औसत तापमान वृद्धि अधिक तेजी से है. तापमान में इतनी तेजी से हुई बढ़ोतरी से फसल की पैदावार में गिरावट की संभावना है, और यह खेती और उससे संबंधित आय को नुकसान पहुंचा रही है. कृपया संबंधित चार्ट देखने के लिए यहां क्लिक करें.

वर्ष 2008 और 2018 के बीच जल स्तर में गिरावट दर्ज करने वाले भारत में लगभग 52 प्रतिशत कुओं का जलस्तर खतरनाक दर से कम हुआ है. इससे संकेत मिलता है कि हमें खुली बाढ़ सिंचाई को छोड़कर सूक्ष्म सिंचाई विधियों जैसे ड्रिप या होज़ रील जैसी विधियों को अपना लेना चाहिए. इन विधियों से इस्तेमाल किए गए पानी का 60 प्रतिशत तक बचाया जा सकता है और कीड़े-कीटों के प्रकोप को रोकने में भी मददगार साबित हो सकती हैं. वर्तमान में, सूक्ष्म सिंचाई का कवरेज/चलन उन राज्यों में बहुत कम है, जिनमें भूजल स्तर में अधिक गिरावट हुई है. इसके साथ-साथ, फसल चक्र, क्रेडिट चक्र और खरीद पैटर्न को मानसून शिफ्ट में अपनाने की आवश्यकता है. कृपया संबंधित चार्ट देखने के लिए यहां क्लिक करें.

तालिका-2 गिरता भूजल स्तर (2008-18) और सूक्ष्म सिंचाई कवरेज क्षेत्र (2015-18)

 



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