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आर्थिक सर्वेक्षण 2017-18, खंड -1 (जनवरी, 2018 में जारी)के अनुसार, (अधिक जानकारी के लिए कृपया यहां क्लिक करें:)

• भारत में कृषि विकास की अस्थिरता समय के साथ काफी कम हो गई है: 1960 से 2004 के बीच 6.3 प्रतिशत और 2004 से अब तक 2.9 प्रतिशत के के मानक विचलन से कृषि विकास की अस्थिरता कम हुई है. विशेष रूप से, अनाज का उत्पादन और अधिक हो गया है.

• 1970 के दशक के बाद बढ़ते तापमान का व्यापक पैटर्न दोनों मौसमों के लिए आम है. सबसे हाल के दशक और 1970 के दशक के बीच तापमान में औसत वृद्धि क्रमशः खरीफ और रबी मौसम में लगभग 0.45 डिग्री और 0.63 डिग्री है. ये रुझान राजीवन (2013) की रिपोर्ट के अनुसार हैं. 1970 और पिछले दशक के बीच, खरीफ वर्षा में औसतन 26 मिलीमीटर और रबी में 33 मिलीमीटर की गिरावट आई है. इस अवधि में औसतन प्रति वर्ष औसत बारिश में लगभग 86 मिलीमीटर की गिरावट आई है.

• शुष्क दिनों के अनुपात (प्रति दिन 0.1 मिमी से कम वर्षा), साथ ही साथ नमी वाले दिनों (बारिश प्रति दिन 80 मिमी से अधिक) में 1970 के बाद से समय के साथ लगातार वृद्धि हुई है. इस प्रकार, चरम मौसम परिणामों की बढ़ती आवृत्ति के चलते जलवायु परिवर्तन की छाप स्पष्ट रूप से दिखाई पड़ती है.

• पिछले दशक (2005-2015) और 1950-1980 की अवधि के बीच, उत्तर-पूर्व, केरल, तमिलनाडु, केरल, राजस्थान और गुजरात में तापमान में वृद्धि विशेष रूप से महसूस की गई है. भारत के कुछ हिस्सों, उदाहरण के लिए, पंजाब, ओडिशा और उत्तर प्रदेश सबसे कम प्रभावित हुए हैं. इसके विपरीत, पिछले दशक (2005-2015) और 1950-1980 के बीच वर्षा में अत्यधिक कमी उत्तर प्रदेश, उत्तर-पूर्व और केरल, छत्तीसगढ़ और झारखंड में देखी गई है.

• अत्यधिक तापमान के झटकों से जब एक जिला प्रभावित (सामान्य से काफी अधिक गर्म) होता है (जिला-विशिष्ट तापमान वितरण के शीर्ष 20 प्रतिशत में), तो खरीफ के मौसम में कृषि पैदावार में 4 प्रतिशत की गिरावट और रबी की पैदावार में 4.7 प्रतिशत की गिरावट आती है. इसी तरह, बारिश के मामले में, जब सामान्य से कम बारिश होती है (जिला-विशिष्ट वर्षा वितरण के निचले 20 प्रतिशत), तो नतीजतन खरीफ की पैदावार में 12.8 प्रतिशत की गिरावट, और रबी की पैदावार में 6.7 प्रतिशत की गिरावट होती है जोकि मामूली गिरावट नहीं है.

Impact of weather shocks on agricultural yields

• असिंचित क्षेत्र - उन जिलों के रूप में परिभाषित किया गया है जहाँ 50 प्रतिशत से कम फसली क्षेत्र सिंचित है – मौसम की जटिलताओं का खामियाजा भुगतना पड़ता है. उदाहरण के लिए, असिंचित क्षेत्रों में अत्यधिक तापमान होने के कारण खरीफ फसल की पैदावार में 7 प्रतिशत और रबी फसल की पैदावार में 7.6 प्रतिशत की कमी आती है. इसी प्रकार, अत्यधिक वर्षा होने के कारण खरीफ और रबी फसल की पैदावार में क्रमशः 14.7 प्रतिशत और 8.6 प्रतिशत की कमी आती है. जोकि सिंचित जिलों में होने वाले प्रभावों से बहुत बड़ा है.

• वर्षा का स्तर नियंत्रित रहने के बाद भी, शुष्क दिनों की संख्या (मानसून के दौरान 0.1 मिलीमीटर से कम दिनों के रूप में परिभाषित) उत्पादकता पर महत्वपूर्ण नकारात्मक प्रभाव डालती है: वर्षा की मात्रा स्थिर होने पर भी, मानसून के दौरान प्रत्येक अतिरिक्त शुष्क दिन औसतन सिंचित क्षेत्रों में 0.2 प्रतिशत और असिंचित क्षेत्रों में 0.3 प्रतिशत पैदावार कम करता है.

• अत्यधिक तापमान के प्रभाव के चलते क्रमशः खरीफ और रबी के दौरान किसान की आय में 4.3 प्रतिशत और 4.1 प्रतिशत की कमी आती है, जबकि अस्थिर वर्षा के प्रभाव के कारण उनकी आय में 13.7 प्रतिशत और 5.5 प्रतिशत की कमी आती है.

Impact of weather shocks on farm revenue

• एक वर्ष में जहां तापमान 1 डिग्री सेल्सियस अधिक है, उन असिंचित जिलों में किसानों की आय में खरीफ मौसम के दौरान 6.2 प्रतिशत और रबी के दौरान 6 प्रतिशत गिरावट आएगी. इसी तरह, एक साल में जब वर्षा का स्तर औसत से 100 मिलीमीटर कम होता है, तो खरीफ के दौरान किसान की आय में 15 प्रतिशत और रबी के मौसम में 7 प्रतिशत की गिरावट होगी.

• स्वामीनाथन एट. अल. (2010) से पता चलता है कि तापमान में 1 डिग्री सेल्सियस की वृद्धि से गेहूं के उत्पादन में 4 से 5 प्रतिशत की कमी आती है, जोकि अन्य प्रभावों के समान ही है.

• आईएमएफ द्वारा एक अध्ययन, (2017) में पाया गया है कि उभरती बाजार अर्थव्यवस्थाओं के लिए तापमान में 1 डिग्री सेल्सियस की वृद्धि से कृषि विकास में 1.7 प्रतिशत की कमी होगी, और बारिश में 100 मिलीमीटर की कमी से विकास में 0.35 प्रतिशत की कमी आएगी.

• जलवायु परिवर्तन पर अंतर-सरकारी पैनल (IPCC) द्वारा विकसित किए गए जलवायु परिवर्तन मॉडल, भविष्यवाणी करते हैं कि 21 वीं सदी के अंत तक भारत में तापमान 3-4 डिग्री सेल्सियस बढ़ने की संभावना है (पाठक, अग्रवाल और सिंह, 2012). हमारे प्रतिगमन अनुमानों के साथ संयुक्त इन भविष्यवाणियों का मतलब है कि किसानों द्वारा किसी भी अनुकूलन के अभाव में और नीति में परिवर्तन (जैसे कि सिंचाई) न होने के कारण, आने वाले वर्षों में कृषि आय औसतन लगभग 12 प्रतिशत कम होगी. 18 प्रतिशत वार्षिक राजस्व की संभावित हानि के साथ, असिंचित क्षेत्र सबसे गंभीर रूप से प्रभावित होंगे.

• आईपीसीसी-अनुमानित तापमान को लागू करने और भारत के हालिया रुझानों को बारिश में शामिल करने, और कोई नीतिगत प्रतिक्रिया नहीं मानने के चलते, औसतन 15 प्रतिशत से 18 प्रतिशत की कृषि आय के नुकसान का अनुमान संभव है. असिंचित क्षेत्रों के लिए 20-25 प्रतिशत तक बढ़ सकता है, जोकि खेत की आमदनी के मौजूदा स्तरों पर मंझोले किसान परिवार के लिए प्रति वर्ष 3,600 रुपये तक हो सकता है.

• भारत चीन या संयुक्त राज्य अमेरिका (शाह, 2008) के मुकाबले दोगुने से अधिक भूजल का इस्तेमाल करता है. इसी वजह से वास्तव में भूजल की वैश्विक कमी उत्तर भारत में सबसे अधिक चिंताजनक है.

• भूजल स्टेशनों के विश्लेषण के अनुसार पिछले 30 वर्षों में जल तालिका में 13 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई है.

• ड्रिप सिंचाई, स्प्रिंकलर, और जल प्रबंधन की तकनीकें - "हर बूंद से अधिक फसल" अभियान भविष्य में भारतीय कृषि की सफलता की कुंजी हो सकता है (शाह समिति रिपोर्ट, 2016; गुलाटी, 2005) और इसलिए इसे संसाधन आवंटन में प्राथमिकता देकर अधिक से अधिक इस्तेमाल जाना चाहिए.

• वर्तमान फसल बीमा कार्यक्रम (प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना), के लिए मौसम आधारित मॉडल और प्रौद्योगिकी (उदाहरण के लिए ड्रोन) का निर्माण कर इसका इस्तेमाल फसल के नुकसान का निर्धारण करने और हफ्तों के भीतर किसानों की क्षतिपूर्ति करने के लिए उपयोग करने की आवश्यकता है (केन्या कुछ दिनों में ऐसा करता है).

• अपर्याप्त सिंचाई, निरंतर वर्षा निर्भरता, अप्रभावी खरीद, और अनुसंधान और प्रौद्योगिकी में अपर्याप्त निवेश (दाल, सोयाबीन, और कपास जैसे अनाज), उच्च बाजार बाधाएं और कमजोर फसल उपरांत अवसंरचना (फल और सब्जियां), और चुनौतीपूर्ण गैर संयुक्त नीति (पशुधन) भारतीय कृषि के भविष्य पर चौकड़ी मारे बैठी है.

 


Rural Expert
 

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