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नेशनल एकेडमी ऑफ एग्रीकल्चरल साइंसेज (एनएएएस) द्वारा जलाने वाले फसल अवशेषों पर सुपर स्ट्रॉ मैनेजमेंट सिस्टम-फिटेड कंबाइन और टर्बो हैप्पी सीडर का उपयोग कर चावल-गेहूं के अवशेषों को जलाने से रोकने के लिए नए व्यवहारिक समाधान (अक्टूबर 2017) नामक नीति संक्षेप के अनुसार (एक्सेस करने के लिए कृपया यहां क्लिक करें):

• अनुमान से पता चलता है कि पंजाब में किसानों द्वारा 80 प्रतिशत तक धान की पराली जलायी जाती है. अन्य उत्तर पश्चिमी राज्यों में भी, पराली को बड़े पैमाने पर जलाया जाता है. ऐसा अनुमान है कि भारत के उत्तर-पश्चिम राज्यों में लगभग 2.3 करोड़ टन धान की पराली/अवशेष सालाना जलाई जाती है. इतनी बड़ी मात्रा में पराली का संग्रह और भंडारण न तो व्यावहारिक रूप से संभव है और न ही किफायती.

• नवंबर 2016 की शुरुआत में नासा द्वारा जारी सैटेलाइट तस्वीर (चावल के अवशेष जलने की पीक अवधि) दक्षिण एशिया में पराली जलाए जाने वाले स्थानों को दर्शाती है और दिखाती है कि पंजाब, हरियाणा, पश्चिमी उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड में पराली जलाने की तीव्रता बहुत अधिक है.

• फसल अवशेष जलाने से उत्सर्जित प्रमुख प्रदूषक तत्वों - CO2, CO, CH4, N2O, NOx, SO2, ब्लैक कार्बन, नॉन मिथाइल हाइड्रोकार्बन (NMHC), वाष्पशील कार्बनिक यौगिक (VOC) और पार्टिकुलेट मैटर (PM2.5 और PM10), का ग्लोबल वार्मिंग में बहुत बड़ा योगदान है.

• यह अनुमान लगाया गया है कि जलाए जाने पर एक टन पराली 13 किलोग्राम पार्टिकुलेट मैटर, 60 किलोग्राम सीओ, 1460 किलोग्राम सीओ 2, 3.5 किलोग्राम एनओएक्स, 0.2 किलोग्राम एसओ 2 उत्सर्जित करती है. अवशेषों को जलाने के दौरान उत्सर्जित ब्लैक कार्बन निम्न वायुमंडल को गर्म करती है और यह CO2 के बाद ग्लोबल वार्मिंग में दूसरा सबसे महत्वपूर्ण योगदानकर्ता है.

• वायु प्रदूषण से होने वाले नुकसान के अलावा, धान के अवशेषों को जलाने से मिट्टी के कार्बनिक पदार्थों और पौधों के पोषक तत्वों की कमी होती है और स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है. चावल के अवशेषों में पाई जाने वाली एन और एस के लगभग 90 प्रतिशत और 15-20 प्रतिशत पी और के जलने के दौरान खत्म हो जाती है.  उत्तर-पश्चिम भारत में 2.3 करोड़ टन चावल के अवशेषों को जलाने से प्रति वर्ष लगभग 9.2 करोड़ टन कार्बन (CO2-लगभग 3.4 करोड़ टन के बराबर) की हानि होती है और लगभग 1.4 × 105 t (N के बराबर) का सालाना नुकसान होता है (200 करोड़). इसके अलावा, फसल अवशेषों को जलाने से मिट्टी के फायदेमंद सूक्ष्म वनस्पतियों और जीवों को भी नष्ट कर दिया जाता है, जिससे मिट्टी के स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है.

• धान के अवशेषों को बड़े पैमाने पर जलाए जाने के कारण पीएम 2.5 और पीएम 10 की सांद्रता में वृद्धि एक प्रमुख स्वास्थ्य खतरा है. उदाहरण के लिए, बच्चों को वायु प्रदूषण (स्मॉग) का अधिक खतरा होता है, क्योंकि धान के अवशेष जलने से उनके फेफड़ों पर लाइलाज प्रभाव पड़ता है.

• हवा में पीएम 2.5 और पीएम 10 के उच्च स्तर के उत्सर्जन से उत्तर-पश्चिम भारत की मानवीय आबादी में कार्डियोपल्मोनरी विकार, फेफड़ों के रोग या अस्थमा जैसी पुरानी बीमारियां होती हैं. सर्वेक्षण और आर्थिक मूल्यांकन में पंजाब में प्रत्येक वर्ष धान के अवशेष जलने की अवधि (सितंबर-नवंबर) के दौरान चिकित्सा और स्वास्थ्य संबंधी खर्च और कार्यदिवस में स्पष्ट वृद्धि देखी गई.

• ये स्वास्थ्य संबंधी खर्च बच्चों, वृद्धों और खेत श्रमिकों के लिए अधिक होते हैं, जो सीधे तौर पर धान के अवशेषों को जलाने से संबंधित है. पंजाब के ग्रामीण क्षेत्रों में धान के अवशेषों से मानव स्वास्थ्य की लागत का अनुमान 7.61 करोड़ रुपये सालाना है. अगर गतिविधियों पर खर्च, बीमारी के कारण उत्पादकता की कमी, असुविधा के मौद्रिक मूल्य, आदि को भी शामिल कर लें तो लागत बहुत अधिक होगी.

• धान के अवशेषों के उपयोग के लिए वर्तमान में पशु चारा, पशुधन बिस्तर, इन-सीटू निगमन, खाद बनाना, बिजली पैदा करना, मशरूम की खेती, छत बनाना, बायोगैस (अवायवीय पाचन), भट्ठी ईंधन, जैव ईंधन, कागज और लुगदी बोर्ड निर्माण शामिल हैं. वर्तमान में इन विकल्पों पर उत्तर-पश्चिम भारत में उत्पादित कुल धान अवशेषों के 15 प्रतिशत से कम का उपयोग होता है. विभिन्न उपलब्ध विकल्पों में से, विद्युत उत्पादन, जैव-तेल का उत्पादन और धान के अवशेषों का खेत में ही उपयोग वर्तमान में कुछ प्रमुख चलन हैं.

• बिजली का उत्पादन एक आकर्षक विकल्प है, लेकिन वर्तमान में, केवल सात-बायोमास ऊर्जा संयंत्र पंजाब में स्थापित किए गए हैं व छह और बनने जा रहे हैं. हालाँकि, ये बायोमास ऊर्जा संयंत्र मिलकर राज्य में लगभग 10 प्रतिशत धान के अवशेषों का इस्तेमाल कर सकते हैं. एक 12 मेगावाट धान के अवशेष बिजली संयंत्र के लिए एक वर्ष में 1.20 लाख टन अवशेषों की आवश्यकता होती है, जिसे एक बड़े डंपिंग ग्राउंड की आवश्यकता होती है. इसके अलावा, ये बायोमास ऊर्जा संयंत्र बड़ी मात्रा में राख का उत्पादन करते हैं और इसका निपटान करना एक गंभीर चुनौती है. इस समय तो, इस राख को ईंट भट्टों द्वारा बनाए गए लैंडफिल या गड्डों में डंप किया जाता है.

• जैव-तेल (पायरोलिसिस) और गैसीकरण का उत्पादन करने के लिए प्रौद्योगिकी अभी भी आर्थिक रूप से व्यवहार्य बनाने के लिए अनुसंधान और विकास के अधीन हैं. पंजाब में अधिकांश भट्टियां 25-30 प्रतिशत धान के अवशेषों का 70-75 प्रतिशत अन्य बायोमास के साथ मिश्रित करती हैं और चावल के भूसे का वर्तमान उपयोग केवल 5 लाख टन सालाना है. इस तकनीक का सीमित उपयोग मुख्य रूप से धान के भूसे में उच्च सिलिका सामग्री के कारण होता है, जो बॉयलर में क्लिंकर बनाने में मददगार होता है.

• उत्तर पश्चिम भारत में, सुपर स्ट्रॉ मैनेजमेंट सिस्टम (एसएमएस)- लगी हुई फसल कटाई की मशीनों का उपयोग चावल-गेहूं की फसल प्रणाली (आरडब्ल्यूसीएस) के तहत 70-90 प्रतिशत क्षेत्र में चावल की कटाई के लिए किया जाता है, जिससे भारी मात्रा में अवशेष और पराली खेत रह जाते हैं. इन कार्यों को पूरा करने के लिए लगभग 15 दिनों की उपलब्धता के कारण 8-10 टन/ हेक्टयर भूसे का कुशल और आर्थिक प्रबंधन और समय पर गेहूं की फसल का बीजारोपण किसानों के लिए चुनौतीपूर्ण कार्य है.

• प्रत्येक सुपर स्ट्रॉ मैनेजमेंट सिस्टम (एसएमएस) अटैचमेंट की लागत लगभग 1.2 लाख रुपये, और टर्बो हैप्पी सीडर की लागत लगभग 1.3 लाख रुपये है. कस्टम हायरिंग सेवा प्रदाताओं द्वारा किराए में मामूली वृद्धि कर इन लागतों को आसानी से पूरा किया जा सकता है.

• गेहूं की बुवाई के लिए एसएमएस-फिटेड कंबाइन और टर्बो हैप्पी सीडर के समवर्ती उपयोग के अलग-अलग उत्पादन, आर्थिक, पर्यावरणीय और सामाजिक फायदे हैं, जिनमें से कुछ इस प्रकार हैं: 

(क) गेहूं बिजाई की पारंपरिक विधि की तुलना में गेहूं की औसत उपज में 2-4 प्रतिशत की वृद्धि;

(ख) श्रम, ईंधन, रसायन, आदि की लागत में बचत के कारण लागत कम होना; एक ही ऑपरेशन में गेहूं की बुवाई के कारण प्रति हेक्टेयर लगभग 20 लीटर ईंधन बचता है. कुल बचत - 20 × 4.3 Mha = 8.6 करोड़ लीटर डीजल ईंधन प्रति फसल चक्र; 

(ग) 3-4 वर्ष से अधिक के लिए टर्बो हैप्पी सीडर का उपयोग करके अवशेषों के निरंतर पुनर्चक्रण द्वारा पोषक तत्वों के उपयोग की क्षमता में वृद्धि, 30-40 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर कम नाइट्रोजन उपयोग के साथ एक ही उपज का उत्पादन करती है.

(घ) बुवाई से पहले सिंचाई की जरूरत न होने के कारण प्रति हेक्टेयर 10 लाख लीटर पानी की बचत करके, कम पानी में अधिक फसल पैदा करता है. इसके अलावा, अवशेषों के मल्च से गेहूं के मौसम में लगभग 45 मिमी (4.5 लाख लीटर) के बराबर वाष्पीकरण नुकसान को कम करता है;

(ड) खरपतवार, फसल की कटाई, करनल बंट इन्फेक्शन और दीमक के हमले को कम करके जैविक और अजैविक बिमारियों के जोखिम को कम करता है. जब 2014-15 में फसल की कटाई के समय हुई भारी बारिश के दौरान पारंपरिक तरीक से गेहूं की पैदावार करने वाले किसानों की तुलना में हैप्पी सीडर से खेती करने वाले किसानों को लगभग 16 प्रतिशत अधिक पैदावार हुई,;

(च) धान के अवशेष, समय के साथ मिट्टी के कार्बनिक पदार्थों में सुधार करते है, जिससे की मिट्टी के स्वास्थ्य में सुधार होता है, जो मिट्टी के स्वास्थ्य, उत्पादकता की क्षमता और मिट्टी की जैव विविधता आदि को बढ़ाता है.

• यह अनुमान है कि भारत में आरडब्ल्यूसीएस के तहत कुल एकड़ का 50 प्रतिशत (50 लाख हेक्टेयर) कवर करने के लिए लगभग 60000 टर्बो हैप्पी सीडर्स और 30000 सुपर एसएमएस फिट कंबाइन की आवश्यकता होगी; वर्तमान में, केवल 3000 हैप्पी सीडर्स और 1000 सुपर एसएमएस फिट कंबाइन उपलब्ध हैं.



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