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इंटरनेशनल पैनल ऑन क्लाइमेट चेंज द्वारा प्रस्तुत क्लाइमेट चेंज २००७- सिंथेसिस रिपोर्ट के अनुसार (http://www.ipcc.ch/pdf/assessmentreport/ar4/syr/ar4_syr.pdf):

  • पिछले १२ सालों में से ११ साल (१९९५-२००६) साल सन् १८५० के बाद के वर्षों में सर्वाधिक तापमान वाले वर्ष रहे।

    आर्कटिक प्रदेश का तापमान पिछले सौ सालों में दोगुना से ज्यादा बढ़ चुका है।

    साल १९६१ से अबतक की अवधि के आंकड़ों से जाहिर होता है कि विश्वस्तर पर समुद्र का तापमान ३००० मीटर की गहराई तक बढ़ चुका है।

    तापमान के बढ़ने के साथ समुद्रतल ऊंचा उठ रहा है। साल १९६१ से २००३ के बीच समुद्रतल में सालाना ३.१ मिमी. की दर से बढ़ोतरी हुई है।

    उपग्रह से प्राप्त आंकड़े बताते हैं आर्कटिक प्रदेश में मौजूद बर्फ का विस्तार प्रतिदशक २.७ फीसदी कम हो रहा है।

    मौसम में विश्वव्यापी स्तर पर बड़ी तेजी से बदलाव हो रहा है। बीसवीं सदी के आखिर के पचास सालों में विश्व के विशाल भूभाग में अतिशय गर्मी या ठंढक से भरे रात-दिन अब ज्यादा संख्या और बारंबारता में घटित हो रहे हैं।

    मानवीय क्रियाकलापों से ग्लोबल ग्रीनहाऊस गैस का उत्सर्जन औद्योगीकरण के वक्त से पहले की तुलना में अब कहीं ज्यादा परिमाण में हो रहा है। साल १९७० से २००४ के बीच में इसमें ७० फीसदी का इजाफा हुआ है।

    कार्बन डायआक्साइड मानवजनित एक ग्रीनहाऊस गैस है और साल १९७० से २००४ के बीच इसके उत्सर्जन में ८० फीसदी का इजाफा हुआ है।

  • ग्रीनहाऊस गैसों के उत्सर्जन में साल १९७० के बाद के समय में सर्वाधिक योगदान उर्जा-क्षेत्र, परिवहन और उद्योगों का है। 

    प्रति व्यक्ति आय, प्रति व्यक्ति ग्रीनहाऊस गैस उत्सर्जन और उर्जा की उपलब्धता के आधार पर देखें तो संयुक्त राष्ट्र संघ के फ्रेमवर्क कंवेंशनन ऑन क्लाइमेट चेंज में जिन देशों को एनेक्स-१ का देश(विकसित और औद्योकृत) कहा गया है उनमें विश्व की कुल २० फीसदी आबादी निवास करती है जबकि विश्व के सकल उत्पाद में इन देशों का हिस्सा ५७ फीसदी है जबकि ग्रीन हाऊस गैसों के उत्सर्जन में इन देशों का योगदान विश्वस्तर पर ४६ फीसदी का है।

  • मौसम में परिवर्तन से टुन्ड्रा प्रदेश, पर्वतीय इलाकों, समुद्रतट के पास के क्षेत्रों और भूमध्यसागरीय इलाकों के पारिस्थितिकी तंत्र पर गंभीर असर पड़ेंगे।

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