खेती पर असर

खेती पर असर

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• जलवायु परिवर्तन के कारण साल 2050 तक 15 से 37 फीसदी पादप और जंतु प्रजातियां विलुप्त हो जायेंगी।

• पिछले 30 सालों में ग्रीनहाऊस गैसों का उत्सर्जन सालाना 1.6 फीसदी की दर से बढ़ा है।

• खेती और निर्वनीकरण का हिस्सा ग्रीन हाऊस गैसों के उत्सर्जन में 30 फीसदी है।

• जलवायु परिवर्तन के कारण कुछ देशों में वर्षासिंचित खेती से मिलने वली ऊपज में साल 2020 तक 50 फीसदी की कमी होने की आशंका है।

• दक्षिणी और मध्य एशिया के देशों में ऊपज 2050 तक 30 फीसदी घटने की आशंका है।
 
इंटरनेशनल असेसमेंट ऑव एग्रीकल्चर नॉलेज, साईंस एंड टेकनॉलोजी फॉर डेवलेपमेंट की अप्रैल 2008 में प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार- http://www.agassessment.org/index.cfm?Page=IAASTD%20Reports&ItemID=2713
 
साल 2008 की गरमियों में खाद्यान्न आपूर्ति की कमी और मूल्य वृद्धि के कारण कई देशों में दंगे की स्थिति आ पहुंची। तकरीबन एक अरब लोग आहार असुरक्षा की स्थिति में हैं और जलवायु परिवर्तन सहित ऊर्जा संकट तथा वित्तीय संकट के कारण यह स्थिति आगे और गंभीर हो सकती है।

• खेती की आधुनिक तकनीकों से ग्रीन हाऊस गैसों का उत्सर्जन बढ़ा है और जैव विविधता का नाश हुआ है, साथ ही ऊर्जा का उपभोग भी बढ़ा है।नई तकनीकों के उपयोग में कई दफे पर्यावरण पर होने वाले असर की अनदेखी की गई है।

• जैव ईंधन के इस्तेमाल से ग्रीनहाऊस गैसों के उत्सर्जन में प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष बढ़ोतरी को लेकर पर्याप्त बहस हुई है। लेकिन इस बात में कोई शंका नहीं हो सकती कि ऊर्जाप्रदायी फसलों की खेती से जमीन और भूजल पर विपरीत असर पड़ता है और निर्वनीकरण को बढ़ावा मिलता है।
 


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