एम डी जी

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यूनाइटेड नेशन्स मिलेनियम डेवलपमेंट गाल्स् रिपोर्ट 2009 के अनुसार- http://www.un.org/millenniumgoals/pdf/MDG%20Report%202009%
20ENG.pdf

 

संकल्प 1 :अति दरिद्रता और भुखमरी का उन्मूलन

लक्ष्य-जिन लोगों की आमदनी रोजाना एक डॉलर से कम है उनकी संख्या 1990 से 2015 के बीच आधी करना।

महिलाओं और युवाओं सहित सबके लिए पूर्ण, गरिमामय और उत्पादक रोजगार की स्थिति हासिल करना।

साल 1990 से 2015 के बीच विश्व में भुखमरी के शिकार लोगों की तादाद में 50 फीसदी की कमी लाना।

अफ्रीका के उपसहारीय देशों और दक्षिणी एशिया में गरीबों की संख्या और गरीबी की दर दोनों ही बढ़ने की आशंका है, खासकर कम वृद्धि वाली अर्थव्यवस्थाओं में यह स्थिति नजर आएगी।वैश्विक स्तर पर देखें तो 2015 तक गरीबों की तादाद को 50 फीसदी कम करना संभावित जान पड़ता है परंतु कुछ इलाके इस लक्ष्य को पाने से कुछ पीछे रह जाएंगे।आशंका है कि एक अरब लोग तयशुदा तारीख तक विश्व में गरीबों की श्रेणी में होंगे।

साल 1990-92 में विकासशील मुल्कों में भोजन की कमी से जूझ रहे लोगों की तादाद में कमी का रुझान देखने को मिला था लेकिन साल 2008 में इस रुझान की दिशा पलटी और खाद्य-पदार्थों बढ़ने से एक दफे फिर से भुखमरी के शिकार लोगों की संख्या बढ़ने लगी। साल 1990 के दशक के शुरुआती सालों में भुखमरी के शिकार लोगों की संख्या में 20 फीसदी की कमी आई थी लेकिन इसी दशक के मध्यवर्ती सालों में भुखमरी के शिकार लोगों की संख्या के घटने का औसत 16 फीसदी रह गया। अनुमानतया साल 2008 में भुखमरी के शिकार लोगों की तादाद 1 फीसदी बढ़ी है। अगर चीन को छोड़ दिया जाय तो सहारीय अफ्रीकी मुल्कों में ही नहीं पूर्वी एशिया के देशों में भी भोजन की कमी से जूझ रहे लोगों की संख्या बढ़ी है।

संकल्प 2 : सबको प्राथमिक शिक्षा हासिल हो।

लक्ष्य-इस बात को सुनिश्चित करना कि दुनिया में हर बच्चे को(लड़का हो या लड़की) 2015 तक प्राथमिक शिक्षा हासिल हो जाये। 

सार्विक प्राथमिक शिक्षा की दिशा में प्रगति तो हुई है लेकिन अब भी दुनिया में प्राथमिक शिक्षा के आयुवर्ग में आने वाले 10 फीसदी बच्चे प्राथमिक शिक्षा से वंचित हैं। विकासशील मुल्कों में  साल 2007 में प्राथमिक विद्यालयों में नामांकन का प्रतिशत 88 था जबकि साल 2000 में 83 फीसदी। प्राथमिक शिक्षा प्रदान करने की दिशा में सर्वाधिक सफलता सहारीय अफ्रीकी मुल्कों में हासिल हुई है जहां साल 2000 से 2007 के बीच नामांकन के प्रतिशत में 15 कों का इजाफा देखने को मिला। दक्षिण एशिया में इसी अवधि में नामांकन की तादाद में कुल 11 फीसदी की बढ़ोतरी हुई।

आबादी की तेज बढ़वार के बावजूद नामांकन प्रतिशत में बढोतरी का यह रुझान उत्साहवर्धक है। बहरहाल वैश्वविक स्तर पर देखें तो प्राथमिक स्कूलों की शिक्षा से वंचित बच्चों की तादाद बहुत धीमी गति से और क्षेत्रीय स्तर बड़े असमान ढंग से घट रही है इसलिए 2015 तक सबको प्राथमिक शिक्षा प्रदान करने का संकल्प लक्ष्य तक पहुंचा पाना फिलहाल कठिन जान पड़ रहा है।

प्राथमिक शिक्षा के आयुवर्ग में आने वाले मगर स्कूली शिक्षा से वंचित बच्चों की तादाद में साल 1999 के बाद से 3 करोड़ 30 लाख की कमी आई है। फिर भी साल 2007 तक पूरी दुनिया में 7 करोड़ 20 लाख बच्चे स्कूली प्राइमरी स्कूली शिक्षा से वंचित थे। इस तादाद का 50 फीसदी उपसहारीय मुल्कों का निवासी है। इसके बाद दक्षिण एशिया का स्थान है जहां प्राथमिक स्कूली शिक्षा से वंचित कुल 1 करोड़ 80 लाख बच्चे रहते हैं। यूनेस्को ने साल 2006 के आंकड़ों के आधार पर अनुमान लगाया है कि 2015 तक प्राथमिक स्कूली शिक्षा से वंचित बच्चों की तादाद विश्व में कम से कम 2 करोड़ 90 लाख होगी। प्राथमिक शिक्षा को हासिल करने की दिशा में सामाजिक अवसरों की असमानता सबसे बड़ी बाधा है।इसकी एक मिसाल तो यही है कि साल 2007 में विश्व के स्कूल-वंचित बच्चों की कुल तादाद में लड़कियों की संख्या 54 फीसदी थी।

संकल्प 3- स्त्री-पुरूषों के बीच बराबरी को बढ़ावा देना और महिलाओं का सशक्तीकरण करना

लक्ष्य- प्राथमिक और माध्यमिक शिक्षा से लैंगिक गैरबराबरी को साल 2005 तक समाप्त करना और शिक्षा के सभी स्तरों पर इस गैरबराबरी को साल 2015 तक खत्म करना।

विकासशील देशों में साल 2007 में प्राथमिक स्कूलों में नामांकित बच्चों में प्रति सौ लड़कों पर लड़कियों की तादाद 95 थी जबकि साल 1999 में यही आंकड़ा 91 लड़कियों का था। इसके आधार पर कहा जा सकता है कि प्राथमिक शिक्षा के स्तर पर लैंगिक असमानता में कमी आ रही है।बहरहाल, साल 2005 तक प्राथमिक और माध्यमिक शिक्षा के स्तर से लैंगिक गैरबराबरी को खत्म करने के लक्ष्य से दुनिया के देश चूक गए हैं और 2015 तक शिक्षा के सभी स्तरों पर लैंगिक समानता स्थापित करने के लिए नए सिरे से कुछ पहलकदमियां करनी होंगी।साल 2007 तक 171 देशों में से केवल 53 देश ही प्राथमिक और माध्यमिक शिक्षा के मामले में लैंगिक बराबरी का लक्ष्य हासिल कर पाये थे(यूनेस्को के आंकड़ों के आधार पर)। साल 1999 में इस लक्ष्य को हासिल करने वाले देशों की तादाद इससे कम(39) थी। अब भी 100 देशों के लिए इस लक्ष्य को हासिल करना बाकी है और यह चिन्ताजनक बात है।

 सहारीय अफ्रीकी देशों और दक्षिणी एशिया में महिलाओं के रोजगार की स्थिति चिंताजनक है। दक्षिणी एशिया में महिलाओं की एक बड़ी तादाद(46 फीसदी) पारिवारिक कामों में अपना श्रमदान करती है। परिवार द्वारा चलाये जा रहे व्यवसाय में भी इनका श्रम लगता है लेकिन उस व्वसाय से होने वाली आमदनी में इन महिलाओं की हिस्सेदारी नहीं होती।अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन के आकलन के अनुसार दिसंबर 2008 में साल 2007 के दिसंबर की तुलना में बेरोजगार स्त्री(6.7फीसदी)और पुरूषों(12.8फीसदी) की संख्या में इजाफा हुआ। साल 2008 की दूसरी छमाही में बेरोजगार पुरूषों की संख्या बेरोजगार महिलाओं की संख्या की तुलना में कहीं ज्यादा तेज गति से बढ़ी। साल 2008 के वित्तीय संकट और सामानों के दामों में हुई तेज बढ़ोतरी से दुनिया भर में श्रम-बाजार पर ना दुष्प्रभाव पडा। अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन का आकलन है कि साल 2009 में बेरोजगारी की दर 6.3 से 7.1 फीसदी के बीच रहेगी। आईएलओ के अनुसार साल 2009 में 2 करोड़ 40 लाख से लेकर 5 करोड़ 20 लाख तक की संख्या में नए लोग बेरोजगार हो सकते हैं। इसमें महिलाओं की संख्या 1 करोड़ से लेकर 2 करोड़ 20 लाख तक होने की आशंका है।

संकल्प 4- बाल-मृत्यु की संख्या में कमी करना।

लक्ष्य-शून्य से पाँच साल तक की उम्र के बच्चों की मृत्यु की घटना में 1990 से 2015 के बीच की अवधि में दो तिहाई की कमी लाना।

शून्य से पाँच साल तक उम्र के बच्चों की मृत्यु की घटना में वैश्विक सत्र पर कमी आई है। साल 2007 में वैश्विक स्तर पर 1000 नवजात शिशुओं में मृत्यु के शिकार होने वाले शिशुओं की तादाद 67 थी जबकि साल 1990 में यह आंकड़ा प्रति हजार नवजात शिशुओं में 93 शिशुओं का था। साल 1990 में 1 करोड़ 20 लाख 60 हजार नवजात शिशु उन बीमारियों से मृत्यु का शिकार हुए जिनका उपचार मौजूद है। बहरहाल साल 1990 से 2007 के बीच नवजात शिशुओं की मृत्यु की घटना में काफी कमी (90लाख) आई है।

जहां तक विकासशील देशों का सवाल है, साल 1990 में इन देशों में 1000 नवजात शिशुओं में 103 मृत्यु का शिकार होते थे जबकि साल 2007 में यह संख्या घटकर 74 रह गई।बहरहाल, इस दिशा में अभी बहुत प्रगति करना बाकी है। अफ्रीका के उपसहारीय देशों में हर सात में से एक बच्चा अपना पांचवां जन्मदिन पूरा करने से पहले ही मृत्यु का शिकार हो जाता है। शिशु मृत्यु की घटना के साथ साथ उच्च प्रजनन दर का मामला भी जुड़ा है। इससे स्थिति और संगीन हो रही है। मिसाल के लिए उच्च प्रजनन दर के कारण ही उपसहारीय देशों में शिशु मृत्यु की घटना में साल 1990 (40लाख 20 हजार) से 2007(40 लाख 60 हजार) कके बीच इजाफा हुआ।

संकल्प 5- जननि-स्वास्थ्य में अपेक्षित सुधार करना

 लक्ष्य-साल 1990 से 2015 के बीच मातृ-मृत्यु दर में तीन चौथाई की कमी लाना और साल 2015 तक प्रजनन-स्वास्थ्य से संबंधित सुविधाओं को हरेक व्यक्ति तक पहुंचाना


हर साल ५३६००० महिलाएं गर्भावस्था की जटिलताओं और  प्रसवकालीन दिक्कतों के कारण अथवा प्रसव के छह हफ्ते के अंदर मृत्यु का शिकार होती हैं। इनमें से ज्यादातर महिलाएं(९९ फीसदी) विकासशील मुल्कों की होती हैं। जननी मृत्यु-दर स्वास्थ्य के सूचकांकों में शामिल है और इससे सहज ही पता चल जाता है कि किसी देश में या किन्हीं दो देशों के बीच धनी और गरीब के बीच सुविधाओं की खाई कितनी गहरी है।विकसित देशों में 100,000 जीवित प्रसव पर मातृ-मृत्यु की संख्या 1 है जबकि विकासशील मुल्कों में यही आंकड़ा 450 महिलाओं का है।कुल 14 विकासशील मुल्क ऐसे हैं जहां प्रति 100,000 जीवित प्रसव पर मातृमृत्यु की संख्या 1000 है।मातृ-मृत्यु की कुल संख्या का 50 फीसदी (265000) उपसहारीय अफ्रीकी देशों में घटित होता है जबकि दक्षिण एशिया में इसकी तादाद एक तिहाई(187000) है।इन दो क्षत्रों में कुल मातृ-मृत्यु की 80 फीसदी घटनाएं होती हैं।

आंकड़ों पर आधारित मौजूदा रुझान से पता चलता है कि मातृ-मृत्यु की तादाद कम करने के मामले में प्रगति कुछ खास नहीं हो पायी है।मिसाल के लिए साल 1990 में 1 लाख जीवित शिशु के जन्म पर मातृमृत्यु की संख्या 480 थी जबकि साल 2005 में यह आंकड़ा बहुत थोड़ा घटकर 450 पर पहुंचा और प्रगति विश्व के बड़े थोड़े से इलाकों मसलन पूर्वी एशिया, उत्तरी अफ्रीका,दक्षिण-पूर्वी एशिया(30 फीसदी की कमी) में नजर आई।दक्षिण एशिया में इस मामले में कुल 20 फीसदी की कमी आई।बावजूद इसके इस इलाके में मातृमृत्यु की संख्या बहुत ज्यादा है।विश्व के उपसहारीय अफ्रीकी देशों ने इस मामले में 1990-2005 के बीच बड़ी कम प्रगति की जबकि वहां गर्भावस्था या प्रसव के दौरान महिलाओं की मृत्यु की आशंका सर्वाधिक है।

साल 1995 के बाद से तकरीबन सभी विकासशील देशो में प्रसव के दौरान प्रशिक्षत स्वास्थकर्मियों(डाक्टर,नर्स,दाई) की मौजूदगी की परिघटना में विस्तार हुआ है। प्रसव के दौरान प्रशिक्षित स्वास्थ्यकर्मियों की मौजूदगी का आंकड़ा साल 1990 में इन देशों में 53 फीसदी का था जो साल 2007 में बढ़कर 61 फीसदी तक जा पहुंचा।बहरहाल, अब भी उपसहारीय अफ्रीकी देशों और दक्षिण एशिया में आधे से ज्यादा प्रसव प्रशिक्षित स्वास्थ्यकर्मियों की गैरमौजूदगी में होते हैं।कम उम्र में गर्भधारण की घटना के कारण हर साल 15-19 आयुवर्ग की कुल 70,000 लड़कियां गर्भावस्था की जटिलताओं या प्रसवकाल में मृत्यु का शिकार होती हैं।इससे जुड़ा एख तथ्य यह भी है कि अगर कोई स्त्री 18 साल से कम उम्र में गर्भधारण करती है तो उसके शिशु के जन्म से एक साल की अवधि के अंदर मरने की आशंका 18 या उससे अधिक उम्र में गर्भधारण करने वाली स्त्री की तुलना 60 फीसदी ज्यादा होती है।

संकल्प 6- एचआईवी-एडस्,मलेरिया और अन्य बीमारियों की रोकथाम।

लक्ष्य- साल 2015 तक एचआईवी एडस् के प्रसार पर रोक लगाना और इसके बाद एचआईवी-एडस् की घटना का उन्मूलन।

विश्वस्तर पर देखें तो साल 1996 में एचआईवी के नवसंक्रमित लोगों की तादाद सर्वाधिक थी और इसके बाद के सालों में एचआईवी से संक्रमित होने वाले लोगों की संख्या में कमी आई तथा साल 2007 में एचआईवी से नवसंक्रमित लोगों की संख्या घटकर 20 लाख 70 हजार हो गई।इसका कारण रहा एशिया,लातिनी अमेरिका और उपसहारीय अफ्रीकी देशों में एचआवी संक्रमण की घटना में आई कमी।बहरहाल,पूर्वी योरोप और मध्य एशिया में एचआईवी से संक्रमित होने वाले नये लोगों की तादाद अब भी ज्यादा है।इन इलाकों में एचआईवी संक्रमित लोगों की तादाद 2001 की तुलना में दोगुनी बढ़ी है जबकि इसी साल यूएन का एचआईवी एडस् की रोकथाम संबंधी घोषणा पर हस्ताक्षर किए गए थे।इन इलाकों में एचआईवी संक्रमित लोगों की संख्या बढ़कर 630,000 से एक करोड़ 60 लाख हो गई है।साल 2005 में एडस् से मरने वाले लोगों की विश्वव्यापी तादाद 20 लाख 20 हजार थी जो साल 2007 में घटकर 20 लाख पर पहुंची।इसका एक कारण रहा एडस्-निरोधी दवाओं का दुनिया के गरीब देशों में बढ़ता उपयोग।एडस् निरोधी दवाओं के इस्तेमाल के बावजूद दुनिया में एचआईवी संक्रमित लोगों की संख्या बढ़ रही है क्योंकि एचआईवी संक्रमित लोग अब दवाओं के इस्तेमाल के कारण कहीं ज्यादा समय तक जीवित रह पाने में सक्षम हैं।साल 2007 में तकरीबन 3 करोड़ 30 लाख लोग दुनिया में एचआईवी से संक्रमित थे।

साल 2007 में तकरीबन एक तिहाई(वैश्विक स्तर पर कुल संख्या के) एचआईवी नवसंक्रमण के मामले और एडस् से होने वाली मृत्यु के 38 फीसदी मामले सिर्फ दक्षिणी अफ्रीका में दर्ज किए गए।उपसहारीय अफ्रीकी देशों में दुनिया की एचआईवी संक्रमित आबादी का 67 फीसदी हिस्सा रहता है।महिलाओं की संख्या दुनिया के एडस् संक्रमित लोगों की तादाद में आधी है।उपसहारीय अफ्रीकी देशों में एचआईवी संक्रमित आबादी में महिलाओं की संख्या 60 फीसदी है।

विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार साल 2006 में मलेरिया से मरने वाले लोगों की तादाद लगभग 10 लाख थी।इनमें से 90 फीसदी लोग उपसहारीय अफ्रीकी देशों के थे और मलेरिया की चपेट में आने वाले ज्यादातर पाँच साल से कम उम्र के बच्चे थे।इस साल मलेरिया से तकरीबन 19 से 33 करोड़ लोग ग्रसित हुए जिसमें 88 फीसदी मामले सिर्फ उपसहारीय अफ्रीकी देशों के थे,6 फीसदी मामले दक्षिणी एशिया के और 3 फीसदी मामले दक्षिमी पूर्वी एशिया से संबंद्ध थे।

मलेरिया से मिलता जुलता मामला यक्ष्मा(टीबी) का है। साल 2007 में टीबी के 90 लाख 30 हजार नये मामले दर्ज किए गए जबकि साल 2006 में टीबी के नए मरीजों की तादाद 90 लाख 20 हजार और साल 2000 में 80 लाख 30 हजार थी।साल 2007 में टीबी के नए मामले सर्वाधिक(55 फीसदी) एशिया में दर्ज किए गए जबकि 31 फीसदी मामले अफ्रीका में।

संकल्प 7 - पर्यावरण के टिकाऊपन को सुनिश्चत करना।लक्ष्य-देश के नीतियों और कार्यक्रमों में टिकाऊ विकास के सिद्धांतों को जगह देना और प्राकृतिक संसाधनों के नाश की प्रवृति पर रोक लगाना।

जैव विविधता के नाश को कम करना और 2010 तक जैव विविधता के नाश की दर में सुनिश्चित कमी लाना।जो लोग स्वच्छ पेयजल और साफ-सफाई की बुनियादी सुविधा से वंचित हैं उनकी संख्या 2015 तक कम करके आधी करना।

साल 2020 तक कम से कम 10 करोड़ झुग्गीवासी जनता की रहन-सहन स्थिति में उल्लेखनीय सुधार करना।

कार्बन डाय आक्साइड का उत्सर्जन ग्रीनहाऊस प्रभाव का प्रमुख कारण है और इससे वैश्विक तापमान में बढ़ोतरी हो रही है।साल 2006 में वैश्विक स्तर पर कार्बन डाय आक्साइड के उत्सर्जन में बढ़ोतरी जारी थी।पिछले साल के मुकाबले इसके उत्सर्जन में ढाई फीसदी की बढ़ोतरी हुई और उत्सर्जन 1990 के स्तर से 31 फीसदी की ऊँचाई लांघकर 29 अरब मीट्रिक टन पहुंच गया।प्रति व्यक्ति कार्बन डायआक्साइड के उत्सर्जन का हिसाब लगायें तो विकसित मुल्क बहुत आगे नजर आयेंगे।वहां प्रति व्यक्ति कार्ब डायआक्साइड के उत्सर्जन की दर 12 मीट्रिक टन सालाना प्रति व्यक्ति है जबकि उपसहारीय अफ्रीका में 0.8 मीट्रिक टन।इस लिहाज से साल 2009 के दिसंबर में होने वाले कोपेनहेगन सम्मेलन में इस समस्य़ा का निदान निकालना अत्यंत जरुरी है।मांट्रियल प्रोटोकोल के अन्तर्गत आने वाले 195 देशों ने 1986 से 2007 के बीच विश्व की ओजोन परत को नुकसान पहुंचाने वाले पदार्थों के उपभोग में 97 फीसदी की कमी की है।

वनभूमि का नाश बडी तेजी से हो रहा है।सालाना एक बांग्लादेश के बराबर यानी 1 करोड़ 30 लाख हेक्टेयर वनभूमि नष्ट हो रही है।संतोष की बात इतनी ही है कि वनों के प्राकृतिक विस्तार या फिर वनभूमि संवर्धन के प्रयासों से वनभूमि के नाश की थोड़ी भरपाई हो जाती है।

संकल्प-8-विकास के लिए वैश्विक स्तर पर साझेदारी करना।

लक्ष्य-सर्वाधिक पिछड़े देशों,चारो तरफ भूमि से घिरे देशों और छोटे द्वीपों में बसे विकासशील देशों की विशेष जरुरतों को ध्यान में रखते हुए व्यवस्था करना।

बराबरी पर आधारित और कानून सम्मत उदार वित्तीय और कारोबारी व्यवस्था करना।

विकासशील देशों की कर्जदारी का व्यापक स्तर पर समाधान सुझाना।

औषधि निर्माता कंपनियों के सहयोग से विकासशील मुल्कों में जरुरी किस्म की दवाइयां उपलब्ध कराना।

निजी क्षेत्र के सहयोग से नई तकनीक खासकर सूचना प्रौद्योगिकी का लाभ आम जनता तक पहुंचाना।

साल 2009 के अप्रैल में जी-20 देश के नेता कम आमदनी वाले देशों को सामाजिक सुरक्षा,व्यापार वृद्धि और विकास के मद में 50 अरब डॉलर की राशि देने के लिए सहमत हुए।इस बात की भी सहमति बनी कि आगामी दो-तीन सालों में गरीब देशों को इसके अतिरिक्त 6 अरब की राशि अनुदानित कर्ज और लचीले शर्तों के साथ दी जाएगी।इसी महीने विश्वबैंक और अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष की वैकासिक समिति ने दानदाता देशों से कहा कि वे अपनी प्रतिबद्धताओं को त्वरित गति से पूरा करें साथ ही उससे और अधिक करने की सोचें।अगर दानदाता देश अपने वायदे से मुकरते हैं या फिर देरी करते हैं तो सहस्राब्दि विकास लक्ष्यों को समय से पूरा कर पाना संभव नहीं होगा या फिर ये लक्ष्य सिर्फ कागजी बनकर रह जायेंगे।

मौजूदा हालात -

  • साल 1990-2005 के बीच सवा डॉलर रोजाना से कम की आमदनी वाले लोगों की संख्या 1 अरब 80 करोड़ से घटकर 1 अरब 40 करोड़ हो गई। साल 2009 में वित्तीय संकट के कारण अनुमानतया 9 करोड़ लोग अत्यधिक दरिद्रता में रहने के लिए बाध्य होंगे।
  • भुखमरी की स्थिति साल 1990 के दशक में सुधरी थी लेकिन खाद्य पदार्थों की कीमतों में बढ़ोतरी के कारण साल 2008 में स्थिति संगीन हुई है।साल 2006 में विकासशील देशों में भुखमरी 16 फीसदी थी जो 2008 में बढ़कर 17 फीसदी हो गई।
  • साल 2008 की दूसरी छमाही में कीमतों में कमी आने के बावजूद लोगों के बीच खाद्य-वस्तुओं की उपलब्धता नहीं बढ़ी।
  • विकासशील देशों में एक चौथाई से ज्यादा बच्चे अपनी उम्र के हिसाब से कम वज़न के हैं और इसका मानवीय संसाधन के विकास पर दूरगामी असर पड़ने वाला है।साल 1990 से 2007 के बीच बाल-पोषण की स्थिति में सुधार हुआ है लेकिन इससे 2015 तक का निर्धारित लक्ष्य पूरा होने की संभावना है, खासकर वित्तीय संकट की स्थिति को देखते हुए।



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