कुपोषण

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[inside]फूड एंड न्यूट्रिशन सिक्योरिटी एनालिसिस, इंडिया 2019[/inside]नामक रिपोर्ट में तीन आयामों से डेटा का विश्लेषण करने का प्रयास किया है, जोकि विभिन्न अवधियों में भोजन की उपलब्धता, पहुंच और उपयोगिता के आधार पर भारत में भोजन और पोषण की स्थिति की सही तस्वीर खींचने में मदद करता है. एसडीजी 2 के तहत लक्ष्यों को प्राप्त करने की दिशा में प्रगति के पद चिन्हों को पहचानने के लिए, सांख्यिकी और कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय (MoSPI) और विश्व खाद्य कार्यक्रम (WFP) ने एक साथ मिलकर उपलब्ध भोजन और पोषण सुरक्षा जानकारी का विश्लेषण किया.

 

सतत विकास लक्ष्य (एसडीजी) 2030 तक दुनिया भर के सभी लोगों के जीवन को बेहतर बनाने के लिए 17 वैश्विक लक्ष्यों का एक सेट है. एसडीजी 2 का मकसद- जीरो हंगर - भूख को समाप्त करने, भोजन सुरक्षा, पोषण में सुधार और सतत कृषि को बढ़ावा देना है. इस लक्ष्य का एक महत्वपूर्ण घटक सभी के लिए भोजन की पहुंच में सुधार करना, कुपोषण के सभी प्रकारों को समाप्त करना, जिसमें बचपन के स्टंटिंग और वेस्टिंग पर सहमत लक्ष्य और कृषि आय में सुधार शामिल है. ये लक्ष्य सहस्राब्दी विकास लक्ष्यों (एमडीजी) से एक महत्वपूर्ण प्रगति का प्रतिनिधित्व करते हैं, जो 2015 में समाप्त हो गया, जिसमें खाद्य सुरक्षा को केवल भोजन की खपत के न्यूनतम स्तर से कम आबादी के आधार पर और 5 साल से कम उम्र के अंडरवेट बच्चों की व्यापकता के आधार पर मापा गया था. इस प्रकार, एसडीजी 2 को प्राप्त करने के लिए इन दो परिणामों से इतर इसमें पौष्टिक आहार सेवन, कुपोषण के सभी रूपों, छोटे किसानों को सहायता, खाद्य प्रणालियों को मजबूत बनाने और जैव विविधता में सुधार पर ध्यान केंद्रित किया गया है.

 

सांख्यिकी और कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय (MoSPI) और विश्व खाद्य कार्यक्रम (WFP) द्वारा प्रस्तुत, खाद्य और पोषण सुरक्षा विश्लेषण, भारत, 2019 (जून 2019 में जारी) नामक रिपोर्ट के प्रमुख निष्कर्ष इस प्रकार हैं। (एक्सेस करने के लिए कृपया यहां क्लिक करें):

 

भारत में खाद्यान्न की उपलब्धता

• उत्पादन: पिछले 20 वर्षों में, भारत में कुल खाद्यान्न उत्पादन 19.8 करोड़ टन से बढ़कर 26.9 करोड़ टन हो गया है. गेहूं और चावल भारतीयों के प्रमुख खाद्य पदार्थ हैं और खाद्यान्न उत्पादन का एक प्रमुख हिस्सा है, जो कुल खाद्यान्न उत्पादन का लगभग 75 प्रतिशत हिस्सा है और इस प्रकार लाखों लोगों की आय और रोजगार के प्रमुख स्रोत हैं. उत्तर प्रदेश राज्य गेहूँ, अनाज और खाद्यान्न के उत्पादन में सबसे अग्रसर है, इसके बाद पंजाब और मध्य प्रदेश आते हैं. पश्चिम बंगाल भारत का 'चावल का कटोरा' है, इसके बाद उत्तर प्रदेश, पंजाब और बिहार हैं.

 

• शुद्ध उपलब्धता: 1996 के बाद से, 2018 में खाद्यान्नों की प्रति व्यक्ति शुद्ध उपलब्धता 475 से बढ़कर 484 ग्राम / व्यक्ति / दिन हो गई है, जबकि दालों की प्रति व्यक्ति उपलब्धता 33 से बढ़कर 55 ग्राम / व्यक्ति / दिन हो गई है. हांलाकि चावल, गेहूं और अन्य अनाजों के उत्पादन में भारी वृद्धि हुई है, लेकिन जनसंख्या वृद्धि, अनाज के गलने-सड़ने और नुकसान होने और निर्यात के कारण उनकी प्रति व्यक्ति शुद्ध उपलब्धता समान स्तर पर नहीं बढ़ी है.

 

• उत्पादन रुझान: 1996-99 और 2015-18 के बीच, खाद्यान्न की वार्षिक वृद्धि दर 1.6 प्रतिशत थी. अन्य प्रमुख फसलों के उत्पादन को देखें तो दालों में 2.4 प्रतिशत, गेहूं में 1.8 प्रतिशत, अन्य अनाजों में 1.6 प्रतिशत, चावल में 1.4 प्रतिशत और बाजरे में 0.9 प्रतिशत तक वृद्धि हुई है. मक्का में सबसे ज्यादा 5.9 प्रतिशत वृद्धि दर्ज की गई है. इसके विपरीत, अन्य फसलों की वार्षिक वृद्धि दर में गिरावट देखी गई जैसे: ज्वार (-2.26 प्रतिशत), छोटे बाजरा (-1.71 प्रतिशत) और रागी (-1.21 प्रतिशत).

 

• कृषि उत्पादकता: हालांकि पिछले दो दशकों में खाद्यान्न की पैदावार में 33 प्रतिशत की वृद्धि हुई है, लेकिन यह वांछित से काफी कम रही है. उदाहरण के लिए, भारत ने 2030 तक चावल, गेहूं और मोटे अनाजों के लिए 5,018 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर की पैदावार हासिल करने का लक्ष्य रखा है, जबकि वर्तमान में प्रति हेक्टेयर 2,509 किलोग्राम की संयुक्त उपज है. हालांकि भारत में किसी भी राज्य या केंद्र शासित प्रदेश (केंद्रशासित प्रदेश) ने अभी तक इस लक्ष्य को हासिल नहीं किया है, चंडीगढ़ का यूटी वर्तमान स्तर के साथ लक्षित उत्पादकता 4,600 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर है, इसके बाद पंजाब में 4,297 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर की पैदावार होती है.

 

पौष्टिक भोजन तक पहुंच

• खाद्य खर्च: एंगेल के नियम के अनुसार, आय से भोजन पर खर्च का हिस्सा घटा है, बेशक कुल भोजन खर्च में भी बढ़ोतरी हुई हो. भोजन के लिए कुल मासिक खर्च का एक बड़ा हिस्सा कम क्रय शक्ति को दर्शाता है और भोजन की पहुंच से संबंधित है, इसलिए यह खाद्य असुरक्षा का एक सापेक्ष उपाय है. औसतन, भारत के लोग अपने मासिक खर्च का लगभग 49 प्रतिशत ग्रामीण क्षेत्रों में और 39 प्रतिशत शहरी क्षेत्रों में भोजन पर खर्च करते हैं. सबसे गरीब (सबसे कम 30 प्रतिशत) तबके का अपनी आय में खाद्य खर्च सबसे अधिक है. ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में, सबसे गरीब 30 प्रतिशत तबका भोजन पर क्रमशः 60 प्रतिशत और 55 प्रतिशत खर्च करते हैं.

 

• खाद्य खर्च के रुझान: 1972-73 और 2011-12 के बीच, भोजन पर खर्च की हिस्सेदारी ग्रामीण क्षेत्रों में लगभग 33 प्रतिशत और शहरी क्षेत्रों में 40 प्रतिशत घट गई है, जबकि इसी अवधि के दौरान गैर-खाद्य खर्चों में वृद्धि हुई है. 2004-05 से 2011-12 के बीच, सबसे गरीब लोगों में, भोजन पर होने वाले खर्च की हिस्सेदारी में ग्रामीण और भारत के शहरी क्षेत्रों में 8 प्रतिशत की गिरावट आई है. घटती प्रवृत्तियों से पता चलता है कि ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों में आय में वृद्धि हुई है और यह कि भोजन अब लोगों के लिए एकमात्र प्रमुख खर्च नहीं रह गया है.

 

• खाद्य खपत पैटर्न: खाद्य आदतों से यह पता चला है कि शहरी और ग्रामीण दोनों क्षेत्रों में, अनाज और अनाज के विकल्प पर खर्च की हिस्सेदारी 1972-73 और 2011-12 के बीच ग्रामीण क्षेत्रों में 57 प्रतिशत से 25 प्रतिशत तक और शहरी क्षेत्रों में 36 प्रतिशत से 19 प्रतिशत तक घट गई है. इसी दौरान, कुछ विशेष पेय पदार्थ, दूध और दूध उत्पादों और फलों और बादाम आदि की उपयोगिता में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है, जो देश में खपत में वृद्धि की विविधता को दर्शाता है. ग्रामीण और शहरी भारत दोनों में अनाज से ऊर्जा और प्रोटीन की मात्रा कम हो गई है, इसका मुख्य कारण दूध और डेयरी उत्पादों, तेल और वसा और अपेक्षाकृत अस्वास्थ्यकर भोजन जैसे फास्ट फूड, प्रसंस्कृत अन्य खाद्य पदार्थों, मीठे पेयपदार्थों की बढ़ती खपत है. विशेष रूप से, अस्वास्थ्यकर ऊर्जा और प्रोटीन स्रोतों की खपत शहरी क्षेत्रों में बहुत अधिक है. जिससे भारत में मोटापे की समस्या उभर रही है.

 

• पोषक तत्वों का सेवन: 1993-94 से 2011-12 के बीच, ग्रामीण इलाकों में ऊर्जा और प्रोटीन दोनों की औसत दैनिक खपत में कमी आई, जबकि शहरी क्षेत्रों में कोई ऐसी प्रवृत्ति दर्ज नहीं हुई. घरेलू आय में वृद्धि के बावजूद गिरावट दर्ज की गई है. अकेले ऊर्जा खपत के लिए, ट्रैंड बताता है कि 1983 के बाद से वृद्धि के बावजूद, समग्र ऊर्जा का सेवन न्यूनतम आवश्यकता से थोड़ा कम है. प्रोटीन की मात्रा में गिरावट के बावजूद, ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों में प्रति व्यक्ति खपत न्यूनतम दैनिक आवश्यकता से अधिक है. हालांकि 1983 से वसा का सेवन लगातार बढ़ा है और यह न्यूनतम दैनिक आवश्यकता से बहुत अधिक है.

 

• गरीब और पोषक तत्व: निम्न आय वर्ग के सबसे कम 30 प्रतिशत लोगों के बीच, ऊर्जा की औसत प्रति व्यक्ति खपत प्रति दिन 1811 किलो कैलोरी है, जो भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद (ICMR) के 2,155 किलो कैलोरी प्रति दिन के मानक से काफी कम है. प्रोटीन लेने के मामले में 48 ग्राम प्रति दिन के मानदंड की तुलना में 47.5 ग्राम प्रति दिन है जबकि वसा के लिए यह 28 ग्राम प्रति दिन है जो ग्रामीण भारत के लिए ICMR मानदंड के समान है. शहरी क्षेत्रों के लिए, आईसीएमआर से 2,090 प्रति दिन के मानक की तुलना में प्रति व्यक्ति ऊर्जा की खपत 1,745 किलो कैलोरी प्रतिदिन है. प्रोटीन लेने के मामले में 50 ग्राम प्रति दिन के मानक की तुलना में 47 ग्राम प्रति दिन है और वसा के लिए यह 26 ग्राम प्रति दिन के मानक की तुलना में 35 ग्राम प्रति दिन है. ऊर्जा और प्रोटीन जैसे पोषक तत्वों का वर्तमान सेवन स्तर अखिल भारतीय औसत और दैनिक न्यूनतम उपभोग की आवश्यकता से कम था. केवल ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में वसा का सेवन दैनिक न्यूनतम उपभोग की आवश्यकता के बराबर या उससे अधिक है.

 

• सार्वजनिक वितरण प्रणाली (पीडीएस) और पोषण: लक्षित सार्वजनिक वितरण प्रणाली (टीपीडीएस) ने भारत के सभी राज्यों में लोगों को एक महत्वपूर्ण पोषण पूरक प्रदान किया है. 2011-12 के दौरान, टीपीडीएस से प्रति व्यक्ति औसतन ग्रामीण क्षेत्रों में प्रतिदिन 453 किलो कैलोरी और शहरी भारत में 159 किलो कैलोरी प्रतिदिन पूरकता है. प्रोटीन के संदर्भ में, पीडीएस के माध्यम से पूरकता ग्रामीण क्षेत्रों में प्रति दिन 7.2 ग्राम और शहरी क्षेत्रों में 3.8 ग्राम प्रति दिन औसत है. सबसे गरीब 30 प्रतिशत आबादी के लिए पीडीएस पूरकता 339 किलो कैलोरी प्रति दिन रही है. यह देखा गया है कि सबसे गरीब 30 प्रतिशत परिवारों के पास भोजन तक पहुंचने की क्षमता कम थी, और परिणामस्वरूप, पीडीएस समर्थन के बावजूद, वे ऊर्जा और प्रोटीन इंटेक के अनुशंसित आहार ऊर्जा (आरडीए) स्तर तक पहुंचने में सक्षम नहीं थे.

 

उपयोग

• राष्ट्रीय कुपोषण के दशकीय रुझान: भारत में 6-59 महीने के बच्चों में कुपोषण का प्रचलन 2005-06 से 2015-16 के बीच घट गया है, जिसमें क्रोनिक कुपोषण, या स्टंटिंग, 2005-06 में 48.0 प्रतिशत से घटकर 2015-16 में 38.4 प्रतिशत हो गया है. और 2005-06 में 42.5 प्रतिशत से घटकर 2015-16 में 35.7 प्रतिशत रह गया है. तीव्र कुपोषण, या वेस्टिंग की व्यापकता, इसी अवधि के दौरान 19.8 प्रतिशत से 21.0 प्रतिशत तक बढ़ गई है. छोटे बच्चों में एनीमिया का प्रसार भी 2005-06 में 69.5 प्रतिशत से घटकर 2015-16 में 58.5 प्रतिशत हो गया है.

 

• स्टंटिंग: पिछले दशक के दौरान स्टंटिंग में एक प्रतिशत की वार्षिक गिरावट दर्ज की गई है. केरल को छोड़ दें तो स्टंटिंग का प्रचलन भारत के सभी राज्यों में 30 प्रतिशत है. भारत में स्टंटिंग को कम करने के प्रक्षेपवक्र पर प्रकाश डाला गया है कि, स्टंटिंग में कमी की वर्तमान दर (प्रति वर्ष 1 प्रतिशत) के साथ, 2022 तक, 31.4 प्रतिशत बच्चे स्टंटिंग का शिकार होंगे. भारत सरकार ने राष्ट्रीय पोषण मिशन (एनएनएम) के माध्यम से अपने लिए एक चुनौतीपूर्ण लक्ष्य की परिकल्पना की है, जिसमें 2022 तक 25 प्रतिशत तक पहुँचने के लिए स्टंटिंग को कम से कम 2 प्रतिशत प्रति वर्ष कम करने का लक्ष्य रखा गया है. गोवा और केरल पहले ही NFHS-4 में इस स्तर को प्राप्त कर चुके हैं. चार अन्य राज्य (दमन और दीव, अंडमान और निकोबार, पुडुचेरी और त्रिपुरा) पहले ही मिशन 25 को पूरा कर चुके हैं और पंजाब (25.7 प्रतिशत) इसे (NFHS-4)  प्राप्त करने के करीब है.

 

• कुपोषण में विविधताएं: पांच से कम उम्र के बच्चों में स्टंटिंग बिहार (48 प्रतिशत), उत्तर प्रदेश (46 प्रतिशत), झारखंड (45 प्रतिशत), और मेघालय (44 प्रतिशत) में सबसे ज्यादा है और केरल व गोवा (प्रत्येक 20 प्रतिशत) में सबसे कम. झारखंड में भी अंडरवेट (48 प्रतिशत) और वेस्टिंग (29 प्रतिशत) का प्रचलन सबसे अधिक है. कुपोषण की जिला स्तर की मैपिंग में काफी अंतर है. हालांकि, उत्तरी और उत्तर-पूर्वी राज्यों में बहुत कम जिलों ने कम मात्रा में वेस्टिंग (2.5-4.9 प्रतिशत) और अंडरवेट (10 प्रतिशत से कम) दर्शाया है.

 

• भारत के चिंताजनक क्षेत्र: जैसा कि उल्लेख किया गया है, स्टंटिंग और अंडरवेट के ज्यादातर पीड़ित झारखंड, बिहार, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, गुजरात और महाराष्ट्र में पाए जाते हैं. कुछ राज्यों में कुपोषण चिंताजनक स्थिति में है. देश की सबसे गरीब आबादी स्टंटिंग की सबसे ज्यादा शिकार है. पहले उल्लेख किए गए राज्यों के अलावा, हरियाणा, मेघालय, कर्नाटक, राजस्थान और पंजाब में दो सबसे गरीब समूह में स्टंटिंग बहुत ज्यादा है. राष्ट्रीय स्तर पर, सामाजिक समूहों के बीच, अनुसूचित जनजातियों (43.6 प्रतिशत), अनुसूचित जातियों (42.5 प्रतिशत) और अन्य पिछड़ी जातियों (38.6 प्रतिशत) के बच्चे स्टंटिंग के सबसे अधिक शिकार हैं. राजस्थान, ओडिशा और मेघालय में अनुसूचित जनजाति के बच्चों में स्टंटिंग सबसे अधिक है, जबकि अनुसूचित जनजाति और अनुसूचित जाति दोनों राज्यों के बच्चों में स्टंटिंग महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़ और कर्नाटक में अधिक है.

 

• बच्चों में कुपोषण के कई प्रकारों की व्यापकता: कुपोषण को तीन तरीकों से देखा जाता है: स्टंटिंग, वेस्टिंग और अंडरवेट. NFHS-4 के विश्लेषण से पता चलता है कि पांच वर्ष से कम आयु के 6.4 प्रतिशत बच्चे स्टंटिंग, वेस्टिंग और अंडरवेट का शिकार हैं, जबकि 18.1 प्रतिशत बच्चे स्टंटिंग और अंडरवेट का शिकार हैं, और 7.9 प्रतिशत बच्चे दोनों ही वेस्टिंग और अंडरवेट का शिकार हैं. यह विश्लेषण सबसे कमजोर वर्ग की पहचान करने में मदद करता है जहां बच्चे मैक्रोन्यूट्रिएंट कुपोषण के कई रूपों से पीड़ित हैं.

 

• सूक्ष्म पोषक कुपोषण: विटामिन ए, आयरन और आयोडीन की कमी के विकार दुनिया में सूक्ष्म पोषक कुपोषण के सबसे आम रूप हैं. बड़े पैमाने पर इन कमियों से निपटने के लिए सपलिमैंटेशन और फॉर्टिफिकेशन मुख्य तरीके हैं. भारत में, 9-59 महीने की आयु के केवल 60 प्रतिशत बच्चों को 2015-16 में विटामिन-ए की खुराक मिली, और 36 राज्यों में से 13 कुछ बड़े राज्यों और उत्तर-पूर्वी राज्यों सहित राष्ट्रीय औसत से पीछे हैं. फॉर्टिफिकेशन के संदर्भ में, लगभग 93 प्रतिशत घरों में 2015-16 में आयोडीन युक्त नमक का उपयोग किया गया था जो बहुत सकारात्मक है.

 

• एनीमिया की व्यापकता: भारत में आयरन की कमी से होने वाला एनीमिया एक प्रमुख सार्वजनिक स्वास्थ्य चिंता का विषय बना हुआ है, जहाँ 15-49 वर्ष की आधी महिलाएँ एनीमिक हैं, चाहे वे किसी भी उम्र, निवास या गर्भावस्था की स्थिति की हो. पिछले दशक में, प्रजनन आयु की महिलाओं में एनीमिया केवल 2.3 प्रतिशत अंक कम हुई; 0.4 प्रतिशत की वार्षिक गिरावट. 2015-16 में, एनीमिया का प्रसार पुरुषों (23.3 प्रतिशत) की तुलना में महिलाओं (53.1 प्रतिशत) में अधिक है. 2015-16 में 6-59 महीने की उम्र के 58.5 प्रतिशत बच्चे 2005-6 के 69.5 प्रतिशत की तुलना में एनीमिक थे. हरियाणा में बच्चों में एनीमिया का प्रसार सबसे अधिक (71.7 प्रतिशत) है, इसके बाद झारखंड (69.9 प्रतिशत) और मध्य प्रदेश (68.9 प्रतिशत) है. कई केंद्र शासित प्रदेशों में एनीमिया का अधिक प्रचलन है: दादरा और नगर हवेली (84.6 प्रतिशत), दमन और दीव (73.8), और चंडीगढ़ (73.1 प्रतिशत). 2015-16 में मिजोरम एकमात्र राज्य था, जिसमें WHO थ्रेसहोल्ड के अनुसार एनीमिया का स्तर कम था, जिसके बाद मणिपुर था. एक जिला स्तर के विश्लेषण से पता चलता है कि लगभग सभी जिले 'गंभीर' (40 प्रतिशत से अधिक) श्रेणी में आते हैं, 'मामूली' (20-39.9) श्रेणी में बहुत कम और 'हल्के' (5-19.9) में लगभग 10 जिले वर्ग.

 

• कुपोषण का दोहरा बोझ: कई दशकों से भारत केवल कुपोषण के एक प्रकार से निपट रहा था – अल्पपोषण. हालाँकि, पिछले एक दशक में, दोहरे बोझ जिसमें अधिक और अल्पपोषण दोनों शामिल हैं, प्रमुख होता जा रहा है और भारत के लिए एक नई चुनौती बन गया है. 2005 से 2016 तक भारतीय महिलाओं में निम्न (<18/.5 किलोग्राम / एम2) बॉडी मास इंडेक्स (बीएमआई) का प्रचलन 36 प्रतिशत से घटकर 23 प्रतिशत और भारतीय पुरुषों में 34 प्रतिशत से 20 प्रतिशत हो गया है. हालांकि, इसी अवधि के दौरान महिलाओं में अधिक वजन (मोटापा / बीएमआई> 30 किग्रा / एम 2) का प्रचलन 13 प्रतिशत से बढ़कर 21 प्रतिशत और 9 प्रतिशत से 19 प्रतिशत हो गया. सामान्य बीएमआई या उच्च बीएमआई वाली महिलाओं की तुलना में कम बीएमआई वाली महिलाओं से पैदा होने वाले बच्चों में स्टंटिंग, वेस्टिंग और अंडरवेट होने की संभावना अधिक होती है.

 

• बच्चों के बीच कुपोषण के सामाजिक-आर्थिक निर्धारक: स्टंटिंग के शिकार हुए आधे से अधिक बच्चे उन माताओं की कोख से पैदा होते हैं जो स्कूल नहीं जा सकीं. जबकि 12 साल या इससे अधिक स्कूली शिक्षा वाली माताओं की कोख से पैदा होने वाले 24 प्रतिशत बच्चे स्टंटिंग का शिकार होते हैं. अशिक्षित माताओं की कोख से पैदा होने वाले बच्चों में 47 प्रतिशत अंडरवेट होते हैं, जबकी शिक्षित माताओं की कोख से 22 प्रतिशत बच्चे अंडरवेट होते हैं. धन मे होती बढ़ोतरी के साथ कुपोषण की व्यापकता लगातार कम हो जाती है. कुपोषण राष्ट्रीय स्तर पर अनुसूचित जातियों की तुलना में अनुसूचित जनजातियों में अपेक्षाकृत अधिक प्रचलित है, जबकि राज्यों के बीच काफी भिन्नता मौजूद है. स्टंटिंग और बेहतर स्वच्छता के बीच एक मजबूत नकारात्मक सहसंबंध है.

 

 


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