भुखमरी-एक आकलन

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What's Inside

एफएओ द्वारा प्रस्तुत [inside]फूड वेस्टेज फुटप्रिन्टस्: इम्पैक्ट ऑन नेचुरल रिसोर्सेज (2013)[/inside] नामक दस्तावेज के अनुसार-

http://www.im4change.orghttps://www.im4change.org/siteadmi
n/tinymce//uploaded/FAO%20report%20on%20food%20wastage.pdf

 

•    भारत और चीन अपने अपने इलाके में अनाज के मामले में वाटर- फुटप्रिन्टस् के सबसे बड़े योगदानकर्ता हैं।

•    एशिया में अनाज की बर्बादी एक बड़ी समस्या है। इसका सीधा असर कार्बन-उत्सर्जन, पानी और जमीन के इस्तेमाल पर पड़ रहा है।चावल का उत्पादन इस लिहाज से विशेष रुप से उल्लेखनीय है क्योंकि इससे मीथेन का बड़ी मात्रा में उत्सर्जन हो रहा है और बर्बादी भी बहुत ज्यादा है।

•   एफएओ का आकलन है कि हर साल मनुष्यों के उपभोग के लिए हुए वैश्विक खाद्योत्पादन का तकरीबन एक तिहाई हिस्सा बर्बाद हो जाता है।

•   हर साल जितने खाद्यान्न बर्बाद होता है उसके उत्पादन में उतने ही पानी का खर्च होता है जितना कि रुस की नदी वोल्गा का सालाना जल-प्रवाह है। इसके अतिरिक्त बर्बाद हो जाने वाले खाद्यान्न के उत्पादन से सालाना 3.3 अरब टन ग्रीनहाऊस गैस धरती के वातावरण में पहुंचता है। इसी तरह बर्बाद अन्न के उत्पादन में 1.4 अरब हैक्टेयर जमीन का सालाना उपयोग होता है जो कि विश्व की कुल कृषिभूमि का 28 फीसदी है।

•    पर्यावरण की हानि के अतिरिक्त बर्बाद होने वाले खाद्यान्न से खाद्योत्पादकों सालाना 750 अरब डॉलर का नुकसान होता है।

•    विश्व में जितना खाद्यान्न सालाना बर्बाद होता है उसका 54 फीसदी हिस्सा उत्पादन, कटाई और भंडारण की प्रक्रिया में नष्ट होता है जबकि 46 फीसदी हिस्सा प्रसंस्करण, वितरण और उपभोग के समय।

•   सामान्य तौर पर विकासशील देशों में खाद्यान्न की ज्यादा बर्बादी उत्पादन के चरण में होती है जबकि विकसित देशों में उपभोग के स्तर पर। मध्य और उच्च आय वाले देशों में उपभोग के स्तर पर खाद्यान्न की बर्बादी 31-39 फीसद तक होती है जबकि कम आय वाले देशों में 4-16 फीसदी तक।

•    विकासशील देशों में फसल की कटाई के तुरंत बाद होने वाला नुकसान प्रमुख समस्या है। फसल की कटाई और उससे अन्न निकालने की तकनीक के मामले में कमजोरी और वित्तीय बाधाओं के साथ-साथ भंडारण और ढुलाई से जुड़ी समस्याएं इसके लिए खास तौर पर जिम्मेदार हैं।

 

 

एफएओ की - द स्टेट ऑव फूड एंड एग्रीकल्चर 2013- फूड सिस्टम फॉर बेटर न्यूट्रीशन-  नामक रिपोर्ट के अनुसार

http://www.fao.org/docrep/018/i3300e/i3300e.pdf

 http://www.fao.org/docrep/018/i3301e/i3301e.pdf

•    इस रिपोर्ट का तर्क है कि पोषण की दशा सुधारनी हो और कुपोषण के कारण आर्थिक और सामाजिक मोर्चे पर जो कीमत चुकानी पड़ती है, उसे कम करना हो तो बहुविध प्रयास करने होंगे। इसके लिए आहार-शृंखला, सार्वजनिक स्वास्थ्य सुविधा, शिक्षा आदि में एक साथ अनिवार्य और सकारात्मक हस्तक्षेप किया जाना चाहिए। आहार-शृंखला में हस्तक्षेप की शुरुआत कृषि-क्षेत्र से की जानी चाहिए।

•    भारत से ऐसे साक्ष्य मिले हैं कि यहां अगर कोई व्यस्क व्यक्ति शहर में है तो उसके कुपोषित होने की संभावना गांव में रहने वाले व्यक्ति की तुलना में कम है। गुहा-कसनोबिस और जेम्स कृत एक अध्ययन(2010) में पाया गया कि आठ शहरों की झुग्गी बस्तियों में रहने वाले व्यस्कों के बीच कुपोषण जहां 23 फीसदी था वहीं गांवों में वयस्क व्यक्तियों के बीच 40 फीसदी मामले कुपोषण के थे।

•   स्टेईन और कैम ने अपने एक अध्ययन(2007) में कहा है कि आयरन की कमी से होने वाले रोग एनीमिया, जिंक की कमी , विटामिन ए और आयोडिन की कमी से होने वाले रोगों के कारण भारत को जो आर्थिक कीमत चुकानी पड़ती है वह इस देश के सकल घरेलू उत्पाद का तकरीबन 2.5 फीसदी है।

•   भारत में स्कूलों में पोषाहार के रुप में दिए जाने वाले विशेष चावल के कारण एनीमिया के मामले, इस रोग से पीडित छात्रों के बीच 30 से घटकर 15 फीसदी पर आ पहुंचे हैं। (Moretti et al., 2006).

•    अधिकतर देशों में देखा गया है कि कृषि के क्षेत्र में उत्पादकता बढ़े तो कुपोषित बच्चों की संख्या में कमी आती है। ऐसे देशों में भारत भी शामिल है। भारत में ऐसा हरित क्रांति के दौर में हुआ जब खेती में उच्च उत्पादकता के लिए प्रौद्योगिकी पर विशेष बल दिया गया। सन् 1990 तक यही चलन देखने में आया लेकिन साल 1992 के बाद देखने में आया है कि भारत के ज्यादातर राज्यों में खेती की उच्च-उत्पादकता से वहां के कुपोषित बच्चों की संख्या में कमी से रिश्ता नहीं है। (Headey, 2011).

•   भारत में कुपोषण की व्यापकता के कई कारण गिनाये जाते हैं। ऐसे कारणों में आर्थिक असमानता, लैंगिक असमानता. साफ-सफाई की कमी, स्वच्छ पेयजल तक पहुंच का अभाव आदि प्रमुख हैं। बहरहाल, कुपोषण की व्यापकता की व्याख्या के लिए अभी और ज्यादा शोध की जरुरत है। (Deaton and Drèze, 2009; Headey, 2011).

 •    विकासशील देशों में प्रसंस्करित और डिब्बाबंद भोजन की बिक्री बहुत तेजी से बढ़ रही है। साल 2010 में भारत के शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों में बड़ी संख्या में पाये जाने वाले किरान दुकानों में डिब्बाबंद भोजन की 53 फीसदी बिक्री हुई।

•   एफएओ को अधुनातन आकलन के हिसाब से विश्व की आबादी का 12.5 फीसद हिस्सा(868 मिलियन व्य़क्ति) भोजन के अभाव से ग्रस्त हैं। इस आंकड़े से विश्व में व्याप्त कुपोषण की सम्पूर्णता का नहीं बल्कि उसके एक बिस्से भर की ही झलक मिलती है। अनुमानों के हिसाब से विश्व में 26 फीसदी बच्चे कुपोषण के कारण सामान्य से कम लंबाई के हैं, 2 अरब से ज्यादा लोग एक ना एक माइक्रोन्यूट्रीएन्ट के अभाव से पीडित हैं जबकि 1 अरब 40 करोड़ लोग ऐसे हैं जिनका वज़न सेहत के मानकों के हिसाब से ज्यादा है और इस तादाद में 50 करोड़ लोग मोटापे का शिकार हैं।

•   साल 199092 से विकासशील देशों में भोजन की कमी के शिकार लोगों की संख्या 98 करोड़ से घटकर 85 करोड़ 20 लाख पर पहुंच गई है और भोजन की अभावग्रस्तता का विस्तार 23 फीसदी से कम होकर 15 फीसदी पर पहुंचा है। (FAO, IFAD and WFP, 2012).

•    साल 1990 से 2011 के बीच कुपोषण जनित स्टटिंग के मामलों में विकासशील देशों में 16.6 फीसदी की कमी आई है। कुपोषण जनित स्टटिंग की व्यापकता विकासशील देशों में 44.6 फीसदी से घटकर 28 फीसदी पर आ गई है। फिलहाल विकासशील देशों में सामान्य से कम ऊँचाई(कुपोषण जनिक स्टटिंग) के बच्चों की तादाद विकासशील देशों में 16 करोड़ है जबकि साल 1990 में 24 करोड़ 20 लाख थी। (UNICEF, WHO and The World Bank, 2012).

एक अनुमान में कहा गया है कि अगर हरित-क्रांति ना हुई रहती तो विश्व में भोजन की कीमतें 3565 फीसदी ज्यादा होतीं, विकासशील देशों में कुपोषण के शिकार बच्चों की संख्या वर्तमान संख्या से 6-8 फीसदी ज्यादा होती और औसत कैलोरी उपभोग की मात्रा अभी की तुलना में 11-13 फीसदी कम होती। (Evenson and Rosegrant, 2003)

 

 

 

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