भुखमरी-एक आकलन

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फूड एंड एग्रीकल्चर ऑर्गनाइजेशन और वर्ल्ड फूड प्रोग्राम द्वारा प्रस्तुत द स्टेट ऑव फूड इन्सिक्यूरिटी इन द वर्ल्ड: एड्रेसिंग फूड इन्सिक्युरिटी इन प्रोट्रैक्टेड क्राइजेज नामक दस्तावेज के अनुसार-

http://www.fao.org/docrep/013/i1683e/i1683e.pdf:


•    हालांकि साल 2010 में विश्वस्तर पर भोजन की कमी से जूझ रहे लोगों की संख्या में कमी आई है(इससे पहले ऐसा 1995 में हुआ था) तो भी इनकी संख्या तकरीबन एक अरब है और यह किसी भी लिहाज से बहुत ज्यादा है। भोजन की कमी से जूझ रहे लोगों की संख्या में कमी का एक बड़ा कारण विकासशील देशों में हो रही तेज आर्थिक प्रगति और साल 2008 में अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर खाद्य पदार्थों की कीमतों में हुई गिरावट को बताया जा रहा है।

•    कुल 92 करोड़ 50 लाख लोग(यानी विकासशील देशों की कुल जनसंख्या का 16 फीसदी हिस्सा) अब भी पूरी दुनिया में किसी ना किसी रुप में भोजन की कमी से जूझ रहे हैं। इससे पता चलता है कि संरचनागत स्तर गंभीर कमियां मौजूद हैं। सहस्राब्दि विकास लक्ष्य और 1996 के विश्व खाद्य सम्मेलन में जिन वैश्विक लक्ष्यों को हासिल करने की बात कही गई है उस दिशा में यह संख्या एक बड़ी बाधा है।

•    रिपोर्ट में वैसे 22 देशों को चिह्नित किया गया है जहां लोग गंभीर रुप से भोजन की कमी से जूझ रहे हैं। इन देशों में भोजन की कमी से जूझ रहे लोगों की संख्या 16 करोड़ 60 लाख है जो कि इन देशों की आबादी का 40 फीसदी है और भुखमरी की शिकार कुल वैश्विक आबादी का 20 फीसदी।

•    सामान्यतया, भोजन की गंभीर कमी से जूझ रहे इलाकों में अल्पपोषित लोगों की संख्या कुल आबादी का एक तिहाई है।ज्यादातर विकासशील देशों की भी ऐसी ही स्थिति है(अगर इसमे चीन और भारत की गणना ना करें तो)

•   आमदनी में कमी बेशी, सरकारी नीतियों की प्रभावकारिता, भ्रष्टाचार पर नियंत्रण और भोजन की कमी के हालात की साल दर साल निरंतरता जैसे कारक बहुत हद तक अल्पपोषण की स्थिति के लिए निर्णायक कारक हैं।

•   नवीनतम आंकड़ों के अनुसार विश्व में साल 2009 में अल्पपोषित लोगों की संख्या 1 अरब 20 करोड़ 30 लाख थी। एक साल के अंदर(यानी 2010 में) इसमें 9.6 फीसदी की गिरावट आई है। इस तरह साल 2010 में अल्पपोषित लोगों की संख्या 92 करोड़ 50 लाख तक पहुंची है। विकासशील देशों में अल्पपोषित लोगों की वैश्विक तादाद का 98 फीसदी हिस्सा रहता है।

•    अनाजों के भाव अंतर्राष्ट्रीय मंडियों में हाल के दिनों में अपनी सर्वाधिक ऊँचाई से गिरे हैं। साल 2009-10 में खाद्यान्न की आवक भरपूर हुई है। फिर भी कम आमदनी और खाद्य-संकट वाले देशों में खाद्य-पदार्थों के दाम वहीं के वहीं जमें हैं जहां वे 2008 से पहले(यानी खाद्य-पदार्थों के दामों में तेज बढोतरी से पहले) थे। इससे ऐसे देशों में ज्यादातर आबादी भरपेट भोजन हासिल नहीं कर पा रही।

•    भोजन की कमी से जूझ रहे ज्यादातर लोग विकासशील देशों में रहते हैं। इस आबादी का दो तिहाई हिस्सा सिर्फ सात देशों- बांग्लादेश,चीन, कोंगो, इथोपिया, भारत, इंडोनेशिया और पाकिस्तान में रहता है।

•    एशिया-पैसेफिक क्षेत्र में सर्वाधिक लोग भोजन की कमी के शिकार हैं। यहां साल 2009 में ऐसे लोगों की संख्या 65 करोड़ 80 लाख थी और साल 2010 में 12 फीसदी घटकर 57 करोड़ 80 लाख तक पहुंची।

•   विकासशील देशों को एक समूह के रुप में देखा जाय तो ऐसा नहीं लगता कि ये देश वर्ल्ड फूड समिट के लक्ष्यों(साल 1990-92 में अल्पपोषित लोगों की संख्या 82 करोड़ 70 लाख जबकि साल 2010 में अल्पपोषित लोगों की संख्या 90 करोड़60 लाख) को समय रहते पूरा कर पायेंगे

 

 

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