भुखमरी-एक आकलन

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संयुक्त राष्ट्रसंघ के वर्ल्ड फूड प्रोग्राम और एम एस स्वामीनाथन फाउंडेशन द्वारा संयुक्त रुप से प्रस्तुत रिपोर्ट ऑन द स्टेट ऑव फूड इनसिक्युरिटी इन रुरल इंडिया नामक दस्तावेज के मुताबिक-
http://documents.wfp.org/stellent/groups/public/documents/
newsroom/wfp197348.pdf

  • फूड एंड एग्रीकल्चरल ऑर्गनाइजेशन द्वारा विश्व में आहार-असुरक्षा की स्थिति पर जारी हाल(साल २००८) की रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत में तकरीबन २३ करोड़ लोगों को रोजाना भरपेट भोजन नसीब नहीं होता यानी भारत में कुल आबादी का २१ फीसदी हिस्सा भुखमरी का शिकार है।
  • उड़ीसा, मध्यप्रदेश, कर्नाटक, पश्चिम बंगाल और राजस्थान ऐसे राज्य हैं जहां की जनसंख्या में ऐसे लोगों की तादाद बढ़ी है जिन्हें रोजाना १८९० किलो कैलोरी से कम ऊर्जा देने वाला भोजन नसीब होता है। पंजाब में भी एसे लोगों की तादाद बढ़ी है मगर कुल जनसंख्या के बीच उनका अनुपात बहुत कम है।
  • साल २००१ में झारखंड के लगभग दो तिहाई घरों को साफ पेयजल हासिल नहीं था।
  • छत्तीसगढ़, झारखंड, उड़ीसा, और मध्यप्रदेश में ९० फीसदी ग्रामीण परिवारों के पास घर के अहाते में शौचालय की सुविधा नहीं है।
  • कुल आठ राज्यों- आंध्रप्रदेश, बिहार, गुजरात, हरियाणा, कर्नाटक, केरल, मध्यप्रदेश और राजस्थान में मां बनने के आयु-वर्ग में आने वाली महिलाओं में एनीमिया ( यानी खून में लौहतत्व की कमी ) की घटना बढ़ी है। इस आयु वर्ग की महिलाओं के बीच एनीमिया की सर्वाधिक बढ़ोत्तरी आंध्रप्रदेश में (५१ से ६४ फीसदी ) हुई है। आंध्रप्रदेश के बाद हरियाणा (४८ से ५७ फीसदी) और केरल(२३ से ३२ फीसदी ) का नंबर है।
  • असम में क्रानिक एनर्जी डिफीशिएन्सी से पीडि़त महिलाओं की संख्या में तेज बढोत्तरी हुई है।यहां ऐसी महिलाओं की तादाद २८ फीसदी से बढ़कर ४० फीसदी हो गई। बिहार में ऐसी महिलाओं की तादाद ४० फीसदी से बढ़कर ४६ फीसदी, मध्यप्रदेश में ४२ फीसदी से बढ़कर ४५ फीसदी और हरियाणा में क्रानिक एनर्जी डिफीशिएन्सी से पीडि़त महिलाओं की संख्या ३१ फीसदी से बढ़कर ३३ फीसदी हो गई है।.
  • जिन बीस राज्यों में यह अध्ययन किया गया उनमें १२ में ग्रामीण इलाकों के ८० फीसदी से ज्यादा बच्चे एनीमिया से पीडित थे। बिहार के ग्रामीण इलाके में एनीमिया से पीडि़त बच्चों की तादाद पहले ८१ फीसदी थी जो बढ़कर ८९ फीसदी हो गई है।
  • कर्नाटक के ग्रामीण इलाके में औसत से कम वजन और कद के बच्चों की तादाद ३९ फीसदी से बढ़कर ४३ फीसदी हो गई है।
  • द इंटरनेशनल फूड पॉलिसी रिसर्च इंस्टीट्यूट (आईएफपीआरआई) द्वारा जारी द इंडिया स्टेट हंगर इंडेक्स में १६३२ किलो कैलोरी प्रतिव्यक्ति-प्रतिदिन को मानक मानकर भुखमरी की गणना की गई है जबकि संयुक्त राष्ट्रसंघ के वर्ल्ड फूड प्रोग्राम और एम एस स्वामीनाथन फाउंडेशन द्वारा संयुक्त रुप से प्रस्तुत रिपोर्ट में १८९० किलो कैलोरी प्रतिव्यक्ति-प्रतिदिन को मानक माना गया है क्योकि अंतर्राष्ट्रीय मानक २७०० किलो कैलोरी का है और अनुशंसा की गई थी कि भुखमरी के आकलन में अंतर्राष्ट्रीय मानक के एक तिहाई को भारत के लिए मानक बनाया जाये।
  • भारत के ग्रामीण इलाके में आहार-असुरक्षा की स्थिति का जायजा लेने के लिए इस अध्ययन में निम्नलिखित बातों की गणना की गई-:
  • १८९० किलो कैलोरी से कम ऊर्जा का भोजन प्राप्त करने वाले लोगों की तादाद कुल जनसंख्या में कितनी है।
  • साफ पेयजल की सुविधा से कितने फीसदी परिवार वंचित हैं। कितने फीसदी परिवारों के घर में शौचालय की सुविधा नहीं है।
  • १५ से ४९ साल की विवाहित महिलाओं में एनीमिया से पीडितों की संख्या(प्रतिशत में) कितनी है।
  • १५ से ४९ साल के आयुवर्ग की कितनी फीसदी महिलायें क्रानिक एनर्जी डफीशिएन्सी से पीड़ित हैं।
  • ६ से ३५ महीने की उम्र के कितने फीसदी बच्चों को एनीमिया है।
  • ६ से ३५ महीने की उम्र के कितने फीसदी बच्चे सामान्य से कम वजन और कद के हैं।
  • ऊपरोक्त मानकों के आधार पर ग्रामीण भारत में आहार-असुरक्षा का जायजा लेने वाले इस रिपोर्ट में कहा गया है कि झारखंड और और छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों में आहार-असुरक्षा की स्थिति अत्यंत गंभीर है और मध्यप्रदेश, बिहार तथा गुजरात जैसे राज्य इससे थोड़े ही बेहतर हैं।
  • आहार-असुरक्षा के पैमाने पर बेहतर स्थिति दर्ज कराने वाले राज्यों में हिमाचल प्रदेश,केरल ,जम्मू-कश्मीर और पंजाब का नाम लिया जा सकता है जबकि आंध्रप्रदेश, मध्यप्रदेश, बिहार, गुजरात, कर्नाटक, उड़ीसा और महाराष्ट्र में आहार असुरक्षा की स्थिति गंभीर है। रिपोर्ट के मुताबिक जारी खेतिहर संकट का एक रुप आहार-असुरक्षा और ग्रामीण भारत में सेहत की गिरती स्थिति के तौर पर नजर आ रहा है।


 

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