मानव  विकास सूचकांक

मानव विकास सूचकांक

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संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम (UNDP) द्वारा जारी, मानव विकास रिपोर्ट – 2010, (देखने के लिए यहां क्लिक करें.) के अनुसार, 

• 2010 का मानव विकास सूचकांक (HDI), जिसमें 169 देश शामिल हैं. मानव विकास सूचकांक स्तरों और रैंकिंग की गणना स्वास्थ्व‍य, शिक्षा और आमदनी के लिए नवीनतम अंतर्राष्ट्रीरय तुलनात्ममक आंकड़ों से की गई है, जिसमें नॉर्वे, ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड रैंकिंग के मामले में दुनिया में सबसे ऊपर हैं और नाइजर, कांगो लोकतांत्रिक गणराज्य और जिम्बाब्वे इस वार्षिक रैंकिंग में सबसे नीचे.

• 2010 के मानव विकास सूचकांक में शीर्ष 10 देशों में अगले सात हैं: संयुक्त राज्य अमेरिका, आयरलैंड, लिचेंस्टीन, नीदरलैंड, कनाडा, स्वीडन और जर्मनी. निचले 10 देशों में अन्य सात हैं: माली, बुर्किना फासो, लाइबेरिया, चाड, गिनी-बिसाऊ, मोजाम्बिक और बुरुंडी.

• शिक्षा में, स्कूली उम्र के बच्चों के लिए ‘अपेक्षित वर्षों की स्कूली शिक्षा’ को ‘कुल दाखिलों की गणना’ की जगह बदलकर लाया है, और ‘वयस्क आबादी में स्कूली शिक्षा के औसत वर्ष ‘शिक्षा स्तर की पूरी तस्वीर प्रदान करने के लिए ‘वयस्क साक्षरता दर’ की जगह लाया है. जीवन प्रत्याशा स्वास्थ्य के लिए मुख्य संकेतक बनी हुई है.

• 2010 के एचडीआई की तुलना विभिन्न संकेतकों और गणनाओं के उपयोग के कारण मानव विकास रिपोर्ट के पिछले संस्करणों में दिखाई देने वाले मानव विकास सूचकांकों से नहीं की जानी चाहिए.

• 2010 के एचडीआई के अलावा, रिपोर्ट में तीन नए सूचकांक शामिल हैं: असमानता-समायोजित मानव विकास सूचकांक, लिंग असमानता सूचकांक और बहुआयामी गरीबी सूचकांक.

• मानव विकास में महत्वपूर्ण प्रगति रुझानों के विश्लेषण में नौ दक्षिण एशियाई देशों-अफगानिस्तान, बांग्लादेश, भारत, ईरान, नेपाल और पाकिस्तान के लिए भी पाई गई. पिछले 40 वर्षों में बांग्लादेश में जीवन प्रत्याशा 23 साल, ईरान में 18 साल, भारत में 16 साल और अफगानिस्तान में 10 साल बढ़ गई.

• सबसे तेज़ी से बढ़नेवाले 10 देशों में चीन एकमात्र देश है जो वहां अपनी आय की बदौलत पहुंचा है न कि स्वास्थ्य या शिक्षा के क्षेत्र की उपलब्धियों की वजह से. चीन में पिछले चार दशकों में प्रति व्यक्ति आय में 21 गुना वृद्धि हुई है जिससे करोड़ों लोग ग़रीबी रेखा से बाहर आए हैं. लेकिन फिर भी चीन स्कूलों में दाखिले या मृत्यु की औसत उम्र को बढ़ाने के क्षेत्र की ऊपरी सूची में नहीं है.

• आठ भारतीय राज्य, गरीबी के साथ-साथ 26 सबसे गरीब अफ्रीकी देशों में 42.1 करोड़ बहुआयामी रूप से गरीब लोग रह रहे हैं, जो कि उन अफ्रीकी देशों में रहने वाले 41 करोड़ लोगों से अधिक बहुआयामी गरीब हैं.

• बहुआयामी गरीबी सूचकांक द्वारा कवर किए गए 104 देशों में लगभग 1.75 अरब लोग-उनकी आबादी का एक तिहाई- बहुआयामी गरीबी में जीवन यापन करते हैं- यानी, कम से कम 30 प्रतिशत संकेतक स्वास्थ्य, शिक्षा और जीवन स्तर में तीव्र गिरावट को दर्शाते हैं. यह उन देशों में अनुमानित 1.44 अरब से अधिक है जो प्रति दिन 1.25 डॉलर या उससे कम पर जीवन यापन करते हैं (हालांकि यह उस हिस्से से नीचे है जो $ 2 या उससे कम पर जीवन यापन हैं)। वंचितता के पैटर्न भी महत्वपूर्ण तरीकों से आर्थिक गरीबी से भिन्न होते हैं: कई देशों में - इथियोपिया और ग्वाटेमाला सहित - बहुआयामी गरीब लोगों की संख्या अधिक है. हालाँकि, लगभग एक चौथाई देश, जिनके लिए दोनों अनुमान उपलब्ध हैं- जिनमें चीन, तंजानिया और उज्बेकिस्तान शामिल हैं- आर्थिक गरीबी की दर अधिक है.

• उप-सहारा अफ्रीका में बहुआयामी गरीबी की सबसे अधिक केस हैं. दक्षिण अफ्रीका में 3 प्रतिशत के निम्न स्तर से लेकर नाइजर में 93 प्रतिशत तक का स्तर; अभावों की औसत हिस्सेदारी लगभग 45 प्रतिशत (गैबॉन, लेसोथो और स्वाज़ीलैंड में) से 69 प्रतिशत (नाइजर में) है. अभी भी दुनिया की आधी बहुआयामी गरीब आबादी दक्षिण एशिया (51 प्रतिशत, या 84.4 करोड़ लोग) में रहती है, और एक चौथाई से अधिक अफ्रीका में रहते हैं (28 प्रतिशत, या 45.8 करोड़).

• लैंगिक असमानता देशों में बहुत भिन्न होती है- लैंगिक असमानता के कारण उपलब्धि में होने वाली हानियाँ (कुल असमानता के नुकसान की तुलना में सीधे नहीं, क्योंकि विभिन्न चरणों का प्रयोग किया जाता है) 17 प्रतिशत से 85 प्रतिशत तक होती हैं. डेनमार्क, स्वीडन और स्विटजरलैंड के बाद सबसे अधिक लिंग-समान देशों की सूची में नीदरलैंड सबसे ऊपर है.

• मानव विकास के असमान वितरण वाले देशों में भी महिलाओं और पुरुषों के बीच उच्च असमानता व्यापत हैं, और उच्च लिंग असमानता वाले देशों में भी मानव विकास का असमान वितरण व्यापत हैं. दोनों मोर्चों पर सबसे खराब हालत मध्य अफ्रीकी गणराज्य, हैती और मोजाम्बिक की है.

संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम (UNDP) द्वारा जारी [inside]मानव विकास रिपोर्ट 2007-08[/inside] के अनुसार,:

 • भारत का मानव विकास सूचकांक 0.619 है. रैंकिंग के हिसाब से भारत 177 देशों में से 128 वें स्थान पर है. एचडीआई मानव विकास के तीन आयामों की समग्र जानकारी प्रदान करता है: लंबा और स्वस्थ जीवन यापन (जीवन प्रत्याशा से मापा जाता है), शिक्षा का स्तर (प्राथमिक, माध्यमिक और तृतीयक स्तर पर वयस्क साक्षरता और दाखिलों की संख्या से मापा जाता है) और सभ्य जीवन यापन का मानक (शक्ति समता, पीपीपी, आय से मापा जाता है).

 • भारत की HPI-1 (मानव गरीबी सूचकांक) वेल्यू 31.3 है, जिसमें रैंकिंग के हिसाब से भारत 108 देशों में से 62 वां नंबर पर है. विकासशील देशों के लिए मानव गरीबी सूचकांक (HPI-1), मानव विकास सूचकांक के समान तीन आयामों की समग्र जानकारी प्रदान करता है: लंबा और स्वस्थ जीवन यापन, बेहतर शिक्षा का स्तर और सभ्य जीवन यापन.

 [inside]राष्ट्रीय मानव विकास रिपोर्ट (2001)[/inside] के अनुसार, जिसे योजना आयोग (जीओआई) द्वारा तैयार किया गया है:

साल 2001 के दौरान, केरल (0.638) मानव विकास सूचकांक (एचडीआई) के मामले में रैंकिंग में सबसे ऊपर है, इसके बाद पंजाब (0.537), तमिलनाडु (0.531), महाराष्ट्र (0.523) और हरियाणा (0.509) है. मानव विकास सूचकांक के संदर्भ में सबसे खराब स्थिति बिहार (0.367), उसके बाद असम (0.386), उत्तर प्रदेश (0.388) और मध्य प्रदेश (0.394) की है.



 

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