मानव  विकास सूचकांक

मानव विकास सूचकांक

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योजना आयोग द्वारा प्रस्तुत ग्यारहवीं पंचवर्षीय योजना के दस्तावेज के अनुसार-
http://www.planningcommission.nic.in/plans/planrel/fiveyr/
11th/11_v3/11v3_ch4.pdf

  • भारत में साल १९७३ में गरीबी रेखा से नीचे रहने वाले लोगों की तादाद कुल आबादी में ५४.९ फीसदी थी जो साल २००४ में घटकर २७.५ फीसदी रह गई।साल १९७३ में गरीबों का हेड काऊंट रेशियो(कुल आबादी में गरीब लोगों की तादाद) ५४.९ था जो १९८३ में घटकर ४४.५ फीसदी हुआ। साल १९९३-९४ में हेड काऊंट रेशियो घटकर ३६ फीसदी पर पहुंचा और साल २००४ में २७.५ फीसदी हो गया।
  • कुछ राज्य अपनी आबादी में गरीबों की तादाद घटाने में खास तौर पर सफल हुए हैं। साल २००४-०५ जिन राज्यों में हेड काऊंट रेशियो तुलनात्मक रुप से कम था उनके नाम हैं- जम्मू-कश्मीर (५.४ फीसदी), पंजाब (८.४ फीसदी). हिमाचल प्रदेश (१० फीसदी), हरियाणा (१४ फीसदी), केरल (१५ फीसदी), आंध्रप्रदेश (१५.८ फीसदी) और गुजरात (१६.८ फीसदी)। इसके उलट जिन राज्यों में हेड काऊंट रेशियो ज्यादा है उनके नाम हैं-उड़ीसा (४६.६ फीसदी), बिहार (४१.४ फीसदी), मध्यप्रदेश(३८.३ फीसदी) और उत्तरप्रदेश (३२.८ फीसदी) और ये राज्य सर्वाधिक आबादी वाले राज्यों में गिने जाते हैं।
  • नये बने राज्यों में छत्तीसगढ़ (४०.९ फीसदी), झारखंड (४०.३ फीसदी) और उत्तराखंड (३९.६ फीसदी) में भी गरीबों की तादाद अपेक्षाकृत ज्यादा है।
  • साल २००४-०५ के आकलन के मुताबिक देश के सिर्फ चार राज्यों में गरीबों की तादाद का ५८ फीसदी हिस्सा कायम है। इनके नाम हैं- उत्तरप्रदेश(१९.६ फीसदी), बिहार (१२.२ फीसदी),मध्यप्रदेश(८.३ फीसदी) और महाराष्ट्र (१०.५ फीसदी)। साल १९८३ में इन राज्यों में (इसमें अविभाजित झारखंड और मध्यप्रदेश शामिल है) देश की कुल आबादी में ४९ फीसदी का योगदान था।
  • अगर सकल संख्या के आधार पर देखें तो गरीबों की तादाद पिछले तीन सालों में खास कम नहीं हुई। साल १९७३ में गरीबों की संख्या ३२१३ लाख थी तो १९८३ में ३२२९ लाख। साल १९९३-९४ में गरीबों की संख्या में थोड़ी कमी (३२०४ लाख) आयी और २००४-०५ में यह आंकड़ा ३०१७ लाख पर पहुंचा।
  • कुछ ऱाज्यों में तो पिछले तीन दशकों में गरीबों की कुल संख्या घटने के बजाय बढ़ गई। साल १९७३ में उत्तरप्रदेश में (इसमें उत्तराखंड शामिल है) गरीबों की संख्या ५३५.७ लाख थी जो २००४-०५ में बढ़कर ६२६ लाख हो गई। इसी अवधि में राजस्थान में गरीबों की कुल संख्या १२८.५ लाख से बढ़कर १३४.९ लाख, महाराष्ट्र में २८७ लाक से बढ़कर ३१७ लाख और नगालैंड में २.९ लाख से बढ़कर ४.० लाख हो गई। मध्यप्रदेश(छत्तीसगढ़ सहित) में गरीबों की संख्या १९७३ में २७६ लाख और बिहार(झारखंड सहित)  में ३७० लाख थी जो साल २००४-०५ में बढ़कर क्रमशः ३४१ लाख और ४८५.५ लाख हो गई।
  • कुछ राज्यों में पिछले दशकों में गरीबों की संख्या समान बनी हुई है। इन राज्यों के नाम हैं-हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, उड़ीसा और मिजोरम।
  • कुछ राज्य ऐसे भी हैं जहां ग्रामीण इलाकों में गरीबों की कुल संख्या साल १९७३ से लेकर २००४-०५ के बीच कम हुई है। साल १९७३ में आंध्रप्रदेश में गरीबों की संख्या १७८.२ लाख थी जो २००४-०५ में घटकर ६४.७ लाख हो गई। इसी अवधि में कर्नाटक में गरीबों की संख्या १२८.४ लाख से घटकर ७५ लाख, केरल में १११.४ लाख से घटकर ३२.४ लाख, तमिलनाडु में १७२.६ लाख से घटकर ७६.५ लाख और पश्चिम बंगाल में २५७.९ लाख से घटकर १७३.२ लाख हो गई।
  • साल १९७३ में देश के ग्रामीण इलाकों में गरीब लोगों की कुल संख्या २६१३ लाख थी जो २००४-०५ में घटकर २२०९ लाख हो गई।
  • देश के शहरी इलाके में गरीबों की संख्या १९७३ में ६००.५ लाख थी जो साल २००४-०५ में बढ़कर ८०८.० लाख हो गई।
  • ग्रामीण गरीबों की कुल संख्या का ४१ फीसदी हिस्सा खेतिहर-मजदूर वर्ग में आता है। खेतिहर मजदूर वर्ग में गरीबों की इस फीसद तादाद में पिछले तीन दशकों में कोई बदलाव नहीं हुआ है।
  • साल २००४-०५ के ाकलन के मुताबिक ग्रामीण गरीबों की कुल तादाद में ८० फीसदी लोग अनसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और पिछड़े वर्ग से हैं।
  • बाकी सामाजिक वर्ग के लोगों की तुलना में अनुसूचित जाति अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग के लोगों का बॉड़ी मॉस इंडेक्स ५ से १० फीसदी कम है और इस तरह यह बॉडी मॉस इंडेक्स वहां जा पहुंचता है जहां के तुरंत बाद कुपोषण की स्थिति (>18.5). शुरू होती है।   (बॉडी मॉस इंड्क्स से किसी व्यक्ति की सेहत का अंदाजा लगाया जाता है-इसके आकलन में शरीर की लंबाई की तुलना में वजन की गणना की जाती है यानी प्रति वर्ग मीटर शरीर का वजन (किलोग्राम में) कितना है।)
  • साल १९९३-९४ में देश के ग्रामीण इलाके के गरीब परिवारों में महिलाओं की तादाद २८ फीसदी और शहरी इलाके में २६ फीसदी थी तो साल २००४-०५ में क्रमशः २७ और २३ फीसदी। महिलाओं में गरीबी ज्यादा है परंतु गरीब परिवारों में महिलाओं की फीसद तादाद कम है। इसका कारण प्रति हजार पुरुषों पर महिलाओं की संख्या का कम ( लिंग-अनुपात) होना है।
  • साल १९९३-९४ में ग्रामीण इलाके में बीपीएल परिवारों में रहने वाले १५ साल से कम उम्र के बच्चे की तादाद ३९ फीसदी और शहरी इलाके में ४१ फीसदी जबकि साल २००४-०५ में क्रमशः ४४ फीसदी और ३२ फीसदी।

 

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