सवाल सेहत का

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What's Inside

स्वास्थ्य एवम् परिवार कल्याण मंत्रालय के दस्तावेज के अनुसार-
(
http://mohfw.nic.in/NRHM/Documents/Mission_Document.pdf

  • साल १९९० में सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवा पर जीडीपी का १.३ फीसद खर्च किया गया था जो साल १९९९ में घटकर ०.९ फीसदी पर पहुंच गया। स्वास्थ्य के मद में केंद्रीय बजट में १.३ फीसदी का आबंटन है ।
  • केंद्र सरकार सार्वजनिक स्वास्थ्य के मद में होने वाले खर्चे का १५ फीसदी वहन करती है जबकि राज्यों की हिस्सेदारी इस खर्चे में ८५ फीसदी की है। 
  • पोषाहार संबंधी स्वास्थ्य कार्यक्रम और परिवार कल्याण संबंधी कार्यक्रमों में जमीनी स्तर पर तालमेल बहुत कम है।
  • स्वास्थ्य कार्यक्रमों में जवाबदारी की कमी है। वे ज्यादा प्रभावकारी सिद्ध नहीं हो रहे . 
  • पेयजल, साफ-सफाई और पोषाहार के कार्यक्रमों में आपसी तालमेल का अभाव है।
  • सार्वजनिक स्वास्थ्य के मामले में क्षेत्रीय स्तर पर विषमताएं मिलती हैं। 
  • बढ़ती हुई आबादी में स्थिरता लाना अब सभी एक बड़ी चुनौती है।
  • सार्वजनिक स्वास्थ्य की निदानकारी सेवाएं गरीबों की पक्षधर नहीं हैं। देश की सर्वाधिक गरीब आबादी पर अगर सरकार स्वास्थ्य के मद में १ ऱुपये खर्च करती है तो ३ रुपये अमीर आबादी वाले हिस्से पर। 
  • केवल १० फीसदी भारतीयों के पास एक ना एक तरह का स्वास्थ्य बीमा है और ये बीमा भी उनकी जरुरतों के अनुकूल नहीं है। 
  • अस्पताल में भरती भारतीय अपनी कुल सालाना आमदनी का लगभग ५८ फीसदी स्वास्थ्य सेवा हासिल करने के लिए खर्च कर डालते हैं।
  • अस्पताल में भरती होने पर लगभग ४० फीसदी भारतीय लोगों को या तो कर्ज या उदार लेना पड़ता है या अपनी संपत्ति बेचनी या रेहन रखनी पड़ती है। 
  • अस्पताल में भरती होने पर खर्च इतना ज्यादा आता है कि लगभग २५ फीसदी भारतीय मात्र इसी कारण गरीबी रेखा से नीचे चले जाते हैं।


 

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