सवाल सेहत का

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What's Inside

स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय के केंद्रीय स्वास्थ्य ब्यूरो द्वारा प्रकाशित नेशनल हेल्थ प्रोफाइल 2018, 13वें अंक के अनुसार, (एक्सेस करने के लिए कृपया यहां क्लिक करें):

जनसांख्यिकी संकेतक

• शिशु मृत्यु दर (आईएमआर) में साल 1994 (74 शिशु मृत्यु) की तुलना में, साल 2016 (2016 में प्रति 1,000 जीवित जन्मों में 33 मृत्यु) में काफी गिरावट आई है, हालांकि ग्रामीण (37) और शहरी (23) शिशु मृत्यु दर के बीच अंतर अभी भी अधिक हैं.

• अगर राज्यानुसार देखें तो 2016 में प्रति 1,000 जीवित जन्मों में सबसे कम शिशु मृत्यु दर गोवा (8) में पाई गई, इसके बाद केरल (10) और मणिपुर (11) राज्य हैं. साल 2015 में प्रति 1,000 जीवित जन्मों में उच्चतम शिशु मृत्यु दर मध्य प्रदेश (47) में थी, इसके बाद असम और ओडिशा दोनों (44 प्रत्येक) में हैं.

 • साल 1970-75 में, भारत की जीवन प्रत्याशा 49.7 वर्ष थी जोकि बढ़कर वर्ष 2011-15 में 68.3 वर्ष हो गई है. वर्ष 2011-15 में महिलाओं की जीवन प्रत्याशा 70 वर्ष और पुरुषों की 66.9 वर्ष थी.

• वर्ष 2011-2015 में, शहरी क्षेत्रों में जीवन प्रत्याशा 71.9 वर्ष और ग्रामीण क्षेत्रों में 67.1 वर्ष थी.

• साल 2010-12 के दौरान मातृ मृत्यु अनुपात (MMRatio) प्रति 1,00,000 जीवित जन्मों पर 178 था, जोकि साल 2011-13 के दौरान घटकर 167 हो गया है. 2011-2013 में, 1,00,000 प्रति जीवित जन्मों पर मातृ मृत्यु दर अनुपात असम में सबसे अधिक (300) था और केरल में सबसे कम (61) था.

• 1991 में, देश की प्रति 1,000 अनुमानित मध्य-वर्ष जनसंख्या दर 29.5 थी जोकि 2016 में घटकर 20.4 रह गई है. ग्रामीण क्षेत्रों में प्रति 1,000 अनुमानित मध्य-वर्ष जनसंख्या दर 22.1 थी और शहरी क्षेत्रों में यह 2016 में 17.0 थी.

• वर्ष 1991 में, भारत की प्रति 1,000 मध्य-वर्ष जनसंख्या में प्राकृतिक विकास दर 19.7 थी जोकि घटकर 2016 में 14.0 हो गई.

• भारत की कुल जनसंख्या में शहरी जनसंख्या का अनुपात 1991 में 25.7 प्रतिशत से बढ़कर 2001 में 27.81 प्रतिशत हो गया, और 2011 में बढ़कर 31.14 हो गया है.

• 1991 में, देश का जनसंख्या घनत्व 267 व्यक्तियों प्रति वर्ग किलोमीटर था जोकि बढ़कर 2001 में प्रति वर्ग किलोमीटर 325 व्यक्ति और 2011 में बढ़कर 382 व्यक्ति प्रति वर्ग किलोमीटर हो गया है.

• 1981-1991 में, भारत की जनसंख्या गिरावट दर 23.87 प्रतिशत थी जोकि घटकर 1991-2001 में 21.54 प्रतिशत हो गई और 2001-2011 में घटकर 17.7 प्रतिशत रह गई है.

 

स्वास्थ्य संकेत

• 2017 में उड़ीसा (3,52,140 cases) में मलेरिया के सबसे अधिक पीड़ित थे और मलेरिया के कारण अधिकतम मौतें पश्चिम बंगाल (29 deaths) में दर्ज की गई हैं. 

• साल 2013 में मलेरिया के कुल 8,81,730 पीड़ित थे जोकि 2017 में घटकर 8,42,095 हो गए हैं. मलेरिया के कारण होने वाली मौतों की कुल संख्या 2013 में 440 से घटकर 2017 में 104 रह गई है.

• 2017 में काला-अज़ार के कुल मामलों में से 72 प्रतिशत मामले बिहार से सामने आए. काला-अज़ार के कुल मामलों की संख्या 2013 में 13,869 थी जोकि घटकर 2017 में 5,758 रह गई है. इसी तरह, काला-अज़ार से मौतों की कुल संख्या 2013 में 20 थी जोकि 2017 में शून्य हो गई है.

• वर्ष 2012 (5,044) और 2013 (5,253) की तुलना में वर्ष 2014 (937) में स्वाइन फ्लू के मामलों / मौतों की संख्या में काफी गिरावट आई है. हालाँकि, वर्ष 2015 में पीड़ितों की संख्या (42,592) और मृत्यु (2,990) में भारी वृद्धि हुई. 2016 में, पीड़ित घटकर 1786 हो गए और 2017 में फिर से बढ़कर 38,811 हो गए.

• 2017 में चिकनगुनिया के कुल 63,679 मामले सामने आए, जबकि 2016 में 64,057 मामले सामने आए. 2017 में सबसे अधिक चिकनगुनिया के मामले कर्नाटक (32,170), गुजरात (7,807) और महाराष्ट्र (7,639) में दर्ज किए गए.

• चिकन पॉक्स पीड़ितों और उसके कारण होने वाली मौतों की कुल संख्या क्रमशः 74,035 और 92 थी, केरल में अधिकतम पीड़ित (30,941) और पश्चिम बंगाल में 2017 में चिकन पॉक्स के कारण अधिकतम मौतें (53) हुईं.

• 2013 में, एक्यूट इंसेफेलाइटिस सिंड्रोम के पीड़ितों की कुल संख्या 7,825 थी जोकि 2017 में बढ़कर 13,036 हो गई है. एक्यूट इंसेफेलाइटिस सिंड्रोम के कारण होने वाली मौतों की कुल संख्या 2013 में 1,273 से घटकर 2017 में 1,010 हो गई है. उत्तर प्रदेश में अधिकतम पीड़ित (2017 में 4,749) थे और इसके कारण अधिकतम मौतें (593) हुईं.

• 2013 में, जापानी एन्सेफलाइटिस के कुल पीड़ितों की संख्या 1,086 थी जोकि 2017 में बढ़कर 2,180 हो गई है. जापानी इंसेफेलाइटिस के कारण होने वाली मौतों की कुल संख्या 2013 में 202 थी जोकि 2017 में बढ़कर 252 हो गई. उत्तर प्रदेश में अधिकतम पीड़ित (693) पाए गए और 2017 में अधिकतम मौतें (93) हुईं.

• एन्सेफलाइटिस से पीड़ित और उसके कारण होने वाली मौतों की कुल संख्या क्रमशः 12,485 और 626 थी, 2017 में असम में सबसे अधिक पीड़ित (5,525) थे और उत्तर प्रदेश में चिकन पॉक्स के कारण सबसे अधिक मौतें (246) हुई.

• वायरल मैनिंजाइटिस के पीड़ितों और उसके कारण हुई मौतों की कुल संख्या क्रमशः 7,559 और 121 थी. 2017 में, आंध्र प्रदेश में वायरल मैनिंजाइटिस के सबसे अधिक पीड़ित (1,493) थे और उसके कारण सबसे अधिक मौतें (33) हुई.

• 2013 में डेंगू के मामलों की कुल संख्या लगभग 75,808 थी जोकि 2017 में बढ़कर 1,57,996 हो गई है. डेंगू से होने वाली मौतों की कुल संख्या 2013 में 193 थी जोकि 2017 में बढ़कर 253 हो गई है. 2017 में, तमिलनाडु में सबसे अधिक पीड़ित (23,294) थे और सबसे अधिक मौतें (65) हुईं.

• कैंसर, मधुमेह, हृदय रोगों और स्ट्रोक (एनपीसीडीसीएस) की रोकथाम और नियंत्रण के राष्ट्रीय कार्यक्रम के अनुसार, 2017 में गैर-संचारी रोग (एनसीडी) क्लीनिकों में इलाज कराने आए 3,57,23,660 रोगियों में से 8.41 प्रतिशत लोग मधुमेह, 10.22 प्रतिशत उच्च रक्तचाप (उच्च रक्तचाप), 0.37% हृदय रोगों (सीवीडी), 0.13 प्रतिशत स्ट्रोक और 0.11 प्रतिशत सामान्य कैंसर (मौखिक, ग्रीवा और स्तन कैंसर सहित) से पीड़ित थे.

• वर्ष 2015 के दौरान, आकस्मिक हादसों और आत्महत्याओं के परिणामस्वरूप क्रमशः 4,13,457 और 1,33,623 लोगों की जान चली गई.

• व्यापक आबादी में पुरुष, महिला और ट्रांसजेंडर सहित युवा वयस्कों में आत्महत्या की दर काफी बढ़ रही है. सबसे अधिक आत्महत्याएं (44,593) 30-45 वर्ष की आयु वर्ग के लोगों ने की.

• जनगणना 2011 के अनुसार भारत में दिव्यांगों की कुल संख्या 26,814,994 है.

• 2017 में, सांप के काटने के मामलों और मौतों की कुल संख्या क्रमशः 1,42,366 और 948 थी.

 

स्वास्थ्य वित्तपोषण

• वर्ष 2015-16 में देश के सार्वजनिक स्वास्थ्य पर कुल खर्च 1.4 लाख करोड़ रुपये (वास्तविक) था.

•  स्वास्थ्य पर प्रति व्यक्ति सार्वजनिक खर्च(वास्तविक) 2009-10 के 621 रुपये की तुलना में 2015-16 में बढ़कर 1,112 हो गया है.

• 2015-16 में जीडीपी के प्रतिशत के हिसाब से स्वास्थ्य पर सार्वजनिक खर्च (केंद्र और राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों द्वारा स्वास्थ्य क्षेत्र का खर्च शामिल है) 1.02 प्रतिशत था. साल 2009-10 के बाद से ही जीडीपी के प्रतिशत के हिसाब से स्वास्थ्य पर सार्वजनिक खर्च में कोई महत्वपूर्ण बदलाव देखने को नहीं मिले हैं.

• 2015-16 में स्वास्थ्य पर कुल सार्वजनिक खर्च में केंद्र-राज्य की हिस्सेदारी 31:69 थी, जो 2009-10 में 36:64 हुआ करती थी.

• 2015-16 में स्वास्थ्य पर कुल सार्वजनिक खर्च (अन्य केंद्रीय मंत्रालयों को छोड़कर) 1,40,054 करोड़ रुपये था, जिसमें मुख्यत मेडिकल और पब्लिक हेल्थ का 78.7 प्रतिशत और परिवार कल्याण का 12.6 प्रतिशत हिस्सा था. 

• 2015-16 में उत्तर-पूर्वी राज्यों में उच्चतम (2,878 रुपये प्रति व्यक्ति) और सशक्तीकृत कार्रवाई समूह (EAG) राज्यों (असम सहित) में सबसे कम (871 रुपये प्रति व्यक्ति) स्वास्थ्य पर प्रति व्यक्ति सार्वजनिक खर्च (केन्द्रशासित छोड़कर) था. उदाहरण के लिए, 2015-16 में मिजोरम में प्रति व्यक्ति स्वास्थ्य खर्च 5862 रुपये (वास्तविक) था. हालाँकि, उसी साल बिहार में, प्रति व्यक्ति स्वास्थ्य खर्च 491 रुपये (वास्तविक) था.

• पूर्वोत्तर राज्यों में, वर्ष 2015-16 (2.76%) में सकल राज्य घरेलू उत्पाद (जीएसडीपी) के प्रतिशत के हिसाब से सार्वजनिक स्वास्थ्य खर्च सबसे अधिक था. जीएसडीपी के प्रतिशत के हिसाब से सार्वजनिक स्वास्थ्य खर्च ईएजी राज्यों (असम सहित) में 1.36 प्रतिशत और प्रमुख गैर-ईएजी राज्यों में 0.76 प्रतिशत था.

• राष्ट्रीय सैंपल सर्वे कार्यालय (NSSO) द्वारा किए गए स्वास्थ्य सर्वेक्षण (71 वें दौर) के आधार पर, जनवरी, 2013 और जून, 2014 के बीच अस्पताल में रहने के दौरान किए गए औसत चिकित्सा खर्च के हिसाब से ग्रामीण इलाकों में 14,935 रुपये और शहरी भारत में 24,436 रुपये खर्च किए गए.

• सार्वजनिक अस्पताल में पिछले 365 दिनों (जनवरी से जून 2014 तक सर्वेक्षण) में नवजात के जन्म पर औसत कुल चिकित्सा खर्च ग्रामीण क्षेत्रों में 1,587 रुपये और शहरी क्षेत्रों में 2117 रुपये था.

• वर्ष 2016-17 में लगभग 43 करोड़ व्यक्तियों को किसी भी स्वास्थ्य बीमा के तहत दर्ज पाया गया था. यह भारत की कुल आबादी का 34 प्रतिशत है. उनमें से लगभग 79 प्रतिशत सार्वजनिक बीमा कंपनियों द्वारा रजिस्टर किए गए थे.

• कुल मिलाकर, बीमा सेवा से लांभावित सभी व्यक्तियों में से 77 प्रतिशत सरकार द्वारा प्रायोजित योजनाओं के अंतर्गत आते हैं.

• सार्वजनिक बीमा कंपनियों में व्यक्तिगत नीतियों सहित पारिवारिक फ्लोटर नीतियों को छोड़कर सभी प्रकार की स्वास्थ्य बीमा पॉलिसियों के लिए कवरेज और प्रीमियम की अधिक हिस्सेदारी थी.

• उन देशों की तुलना में जिनके पास सार्वभौमिक स्वास्थ्य सुविधाएं हैं या इसकी ओर बढ़ रहे हैं, भारत का स्वास्थ्य पर प्रति व्यक्ति सार्वजनिक खर्च कम है.

 

स्वास्थ्य क्षेत्र में मानव संसाधन

• वर्ष 2016 और 2017 में मान्यता प्राप्त चिकित्सा योग्यताओं (भारतीय चिकित्सा परिषद अधिनियम के तहत) वाले और राज्य चिकित्सा परिषद से पंजीकृत एलोपैथिक डॉक्टरों की संख्या क्रमशः 25,282 और 17,982 थी. साल 2017 तक, राज्य मेडिकल काउंसिल / मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया से पंजीकृत व मान्यता प्राप्त चिकित्सा योग्यताओं (आईएमसी अधिनियम के तहत) वाले डॉक्टरों की कुल संख्या 10,41,395 है.

• 2017 में, 11,082 लोगों पर औसतन एक सरकारी एलोपैथिक चिकित्सक था. बिहार राज्य में स्थिति सबसे खराब है, यहाँ 28,391 लोगों की आबादी पर महज एक डॉक्टर है. इसके बाद उत्तर प्रदेश (19,962 लोगों पर एक डॉक्टर), झारखंड (18,518), मध्य प्रदेश (16,996), छत्तीसगढ़ (15,916) और कर्नाटक (13,556) का स्थान आता है.

• 2017 में, 1,76,004 लोगों पर औसतन एक सरकारी डेंटल सर्जन था. 2017 में सबसे ज्यादा हालत छत्तीसगढ़ राज्य की थी, वहां 25,87,900 लोगों पर एक डेंटल सर्जन था, इसके बाद महाराष्ट्र (14,83,150) और उत्तर प्रदेश (11,41,869) का स्थान था.

• 2008 में, भारत के सेंट्रल / स्टेट डेंटल काउंसिल से पंजीकृत डेंटल सर्जनों की संख्या 93,332 थी, जो बढ़कर 31 दिसंबर, 2017 तक 2,51,207 हो गई है.

• भारत में पंजीकृत आयुष डॉक्टरों की कुल संख्या 7,71,468 से बढ़कर 2017 में 7,73,668 हो गई है.

• 31 दिसंबर, 2016 तक देश में कुल 8,41,279 औक्सिलरी नर्स मिडवाइव्स (एएनएम) सेवारत थीं.

• 31 दिसंबर, 2016 तक, आंध्र प्रदेश (1,38,435), राजस्थान (1,08,688) और ओडिशा (62,159) राज्यों में सबसे अधिक पंजीकृत एएनएम नर्स थे.

• 31 दिसंबर, 2016 तक, देश में 19,80,536 पंजीकृत नर्स और पंजीकृत मिडवाइव्स (आरएन और आरएम) और 56,367 लेडी हेल्थ विजिटर्स (एलएचवी) सेवारत हैं.

• 31 दिसंबर, 2016 तक, पंजीकृत आरएन और आरएम की सबसे अधिक संख्या तमिलनाडु (2,62,718) में थी, इसके बाद केरल (2,46,161) और आंध्र प्रदेश (2,32,621) में थीं.

• 13 नवंबर, 2017 तक, देश में पंजीकृत फार्मासिस्टों की कुल संख्या 9,07,132 है.

• 13 नवंबर, 2017 तक, पंजीकृत फार्मासिस्टों की सबसे अधिक संख्या महाराष्ट्र (2,03,089) में थी, इसके बाद गुजरात (1,19,445) और आंध्र प्रदेश (1,15,754) में थे.

• 31 मार्च, 2017 तक, ग्रामीण क्षेत्रों में प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों (पीएचसी) में एलोपैथिक डॉक्टरों की कुल संख्या 27,124 थी.

• 31 मार्च, 2017 तक, प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों (पीएचसी) में सबसे अधिक एलोपैथिक डॉक्टर महाराष्ट्र (2,929) में थे, इसके बाद तमिलनाडु (2,759) और राजस्थान (2,382) में थे.

• 31 मार्च, 2017 तक, ग्रामीण क्षेत्रों में, सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों (सीएचसी) में विशेषज्ञों की कुल संख्या 4,156 थी.

• 31 मार्च, 2017 को, सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों (सीएचसी) में सबसे अधिक विशेषज्ञ महाराष्ट्र (508) में थे, इसके बाद कर्नाटक (498) और राजस्थान (497) में थे.

 

हेल्थ इंफ्रास्ट्रकचर

• देश में चिकित्सा शिक्षा ने पिछले 26 वर्षों के दौरान बुनियादी रुप से तेजी से विकास किया है. देश में 476 मेडिकल कॉलेज, बैचलर ऑफ डेंटल सर्जरी (बीडीएस) के लिए 313 डेंटल कॉलेज और मास्टर ऑफ डेंटल सर्जरी (एमडीएस) के लिए 249 डेंटल कॉलेज हैं. 2017-18 के दौरान 476 मेडिकल कॉलेजों में 52,646 और बीडीएस में 27,060 और एमडीएस में 6,233 दाखिले हुए हैं.

• BDS के लिए डेंटल कॉलेजों की कुल संख्या 1994-95 के 77 डेंटल कॉलेजों के मुकाबले चार गुणा बढ़कर 2017-18 में 313 हो गई है. 1994-95 में एमडीएस के लिए डेंटल कॉलेजों की कुल संख्या 32 थी जोकि लगभग 8 गुणा बढ़कर 2017-18 में 249 हो गई है.

• 1994-95 में बीडीएस के लिए डेंटल कॉलेजों में प्रवेश की कुल संख्या 1,987 थी जोकि साल 2017-18 में बढ़कर 27,060 हो गई है. 1994-95 में एमडीएस के लिए डेंटल कॉलेजों में प्रवेश की कुल संख्या 225 थी जोकि साल 2017-18 में 27.7 गुणा बढ़कर 6,233 हो गई है. 

• 1991-92 में भारत में मेडिकल कॉलेजों की कुल संख्या 146 थी, जोकि साल 2017-18 में बढ़कर 476 हो गई है.

• साल 1991-92 में मेडिकल कॉलेजों में प्रवेश लेने वाले पुरुष छात्रों की कुल संख्या 7,468 थी जोकि 3.5 गुणा बढ़कर 2017-18 में 26,082 हो गई है. साल 1991-92 में मेडिकल कॉलेजों में प्रवेश लेने वाली महिला छात्राओं की कुल संख्या 4,731 थी जोकि 5.6 गुणा बढ़कर 2017-18 में 26,564 हो गई है.

• 31 अक्टूबर, 2017 तक, भारत में प्रति वर्ष 1,29,926 जनरल नर्स मिडवाइव्स और फार्मेसी (डिप्लोमा) के लिए 46,795 छात्रों की क्षमता वाले क्रमश 3215 संस्थान और 777 कॉलेज हैं.
• देश में 7,510,761 बेड वाले 23,582 सरकारी अस्पताल हैं. इसका मतलब है कि 2018 में 129,80,41,000 की अनुमानित आबादी के हिसाब से सरकारी अस्पतालों में 1,826 भारतीयों के लिए सिर्फ एक बिस्तर है.

• 2,79,588 बिस्तरों वाले लगभग 19,810 सरकारी अस्पताल, ग्रामीण क्षेत्रों में और 4,31,173 बिस्तरों वाले 3,772 सरकारी अस्पताल शहरी क्षेत्रों में स्थित हैं.

• 31 मार्च, 2017 तक , देश में 1,56,231 उप-केंद्र, 25,650 प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र (PHCs) और 5,624 सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र (CHCs) थे.

• 31 मार्च, 2017 को, सबसे ज्यादा उप-केंद्र उत्तर प्रदेश (20,521) में थे, इसके बाद राजस्थान (14,406) और महाराष्ट्र (10,580) में पाए गए.

• 31 मार्च, 2017 को, सबसे अधिक PHCs उत्तर प्रदेश (3,621) में थे, इसके बाद कर्नाटक (2,359) और राजस्थान (2,079) में स्थित थे.

• 31 मार्च, 2017 तक, सबसे अधिक सीएचसी उत्तर प्रदेश (822) में थे, इसके बाद राजस्थान (579) और तमिलनाडु (385) में स्थित थे.

• 1 अप्रैल, 2017 तक, देश में आयुष के तहत चिकित्सा देखभाल की सुविधा प्रबंधन के हिसाब से डिस्पेंसरी और अस्पतालों की संख्या क्रमशः 27,698 और 3,943 थी.

• जून, 2017 तक देश में लाइसेंस प्राप्त ब्लड बैंकों की कुल संख्या 2,903 थी. सबसे अधिक ब्लड बैंक महाराष्ट्र (328) में थे, इसके बाद उत्तर प्रदेश (294) और तमिलनाडु (291) में पाए गए.

• कुल मिलाकर, 4 जनवरी, 2018 तक देश में 469 नेत्र बैंक (362 निजी रूप से चलने और 107 सरकारी) थे. अधिकांश नेत्र बैंक महाराष्ट्र (166) में थे, इसके बाद कर्नाटक (39) और मध्य प्रदेश (36) में थे.

स्वास्थ्य संबंधी सतत विकास (एसडीजी) लक्ष्यों की प्राप्ति

• स्वास्थ्य से संबंधित सतत विकास लक्ष्यों (एसडीजी) में, भारत पीछे है. उदाहरण के लिए, जरूरी स्वास्थ्य सेवाओं तक 100 प्रतिशत जनसंख्या की पहुंच के लक्ष्य (indicator no. 3.8.1) के मुकाबले हमारे देश में केवल 57 प्रतिशत जनसंख्या की ही स्वास्थ्य सेबाओं तक पहुंच हैं. इसी तरह, 2030 तक, मातृ मृत्यु अनुपात (प्रति 100,000 जीवित जन्मों) के लिए लक्ष्य 70 (indicator no. 3.1.1) रखा गया है, जबकि, वर्तमान में भारत का मातृ मृत्यु अनुपात (MMRatio) 174 है.

• 2030 तक, 5 वर्ष से कम आयु के लिए शिशु मृत्यु दर (प्रति 1000 जीवित जन्म) का सतत विकास लक्ष्य 25 (indicator no. 3.2.1) है. हालांकि, देश की शिशु मृत्यु दर (U5MR) 47.7 है.

• सतत विकास लक्ष्यों से संबंधित कई संकेतकों जैसे कि आत्महत्या मृत्यु दर (प्रति 100,000 जनसंख्या) (indicator no. 3.4.2) या किशोरी जन्म दर (प्रति 15-19 वर्ष की आयु की प्रति 1000 महिलाएं) (indicator no. 3.7.2) के लिए लक्ष्य निर्धारित किए जाने बाकी हैं.

• सतत विकास लक्ष्यों से संबंधित कई संकेतकों के लिए जैसे हेपेटाइटिस बी (indicator no. 3.3.4) या सस्ती दवाओं और वैक्सीन के साथ आबादी के अनुपात (indicator no. 3.b.1) से संबंधित डेटा भारत में या तो उपलब्ध करवाया नहीं है या अनुपलब्ध है.

तालिका: स्वास्थ्य से संबंधित सतत विकास लक्ष्यों की वर्तमान स्थिति (एसडीजी) लक्ष्य - भारतीय परिदृश्य

SDGs

Source: Monitoring Health in the Sustainable Development Goals: 2017, World Health Organization, Regional Office for South East Asia, as quoted in the National Health Profile 2018, please click here to access, page no. 288


 

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