Resource centre on India's rural distress
 
 

सार्वजनिक वितरण प्रणाली

वित्त मंत्रालय द्वारा प्रस्तुतइकॉनॉमिक सर्वे 2015-16 के खंड 1 और खंड 2 के तथ्यों के अनुसार :

http://indiabudget.nic.in/es2015-16/echapter-vol1.pdf

http://indiabudget.nic.in/es2015-16/echapter-vol2.pdf 

 

• साल 2014-15 में खाद्यान्न(गेहूं और चावल) का उपार्जन 56.9 मिलियन टन से बढ़कर 60.2 मिलियन टन हो गया है जबकि पीडीएस के माध्यम से खाद्यान्न का ऑफटेक 59.8 मिलियन टन से घटकर 55.9 मिलियन टन हो गया है. खाद्यान्न का उपार्जन बढ़ने के बावजूद ऑफटेक का घटना खाद्यान्न की समय पर उपलब्धता के अभाव तथा खाद्यान्न की गुणवत्ता में कमी की तरफ इशारा करता है. 

 

•  देश में 2005-06 में खाद्य सब्सिडी 23071 करोड़ रुपये थी जो 2015-16 में बढ़कर 1,05,509.41 करोड़ रुपये हो गई. भ्रष्टाचार, कुप्रबंधन, उच्च प्रशासनिक लागत तथा कालाबाजारी के कारण पीडीएस पर होने वाले खर्चे में इजाफा हुआ है..

 

•  कमीशन ऑफ एग्रीकल्चरल कॉस्ट फॉर प्राइसेज की रिपोर्ट के अनुसार उपार्जन, वितरण तथा भंडारण, हाल के सालों में उपार्जन की बढ़ी हुई मात्रा तथा खाद्यान्न की आर्थिक लागत और केंद्रीय इश्यू प्राइस(निर्गमित मूल्य) के बीच बढ़ते अंतराल के कारण खाद्य सब्सिडी में ज्यादा इजाफा हुआ है. 

 

• इकॉनॉमिक सर्वे 2015-16 के तथ्यों से पता चलता है कि 2011-12 से लगातार न्यूनतम समर्थन मूल्य में वृद्धि हुई है.

 

• साल 2014-15 से 2015-16 के बीच सामान्य श्रेणी के धान तथा ग्रेड ए श्रेणी के धान के न्यूनतम समर्थन मूल्य में 3.7 प्रतिशत और 3.6 प्रतिशत की बढ़त हुई है. इस अवधि में गेहूं के न्यूनतम समर्थन मूल्य में 5.2 प्रतिशत की बढ़त हुई है. 

 

•  आर्थिक सर्वे में कहा गया है कि एमएसपी / उपार्जन आधारित मौजूदा पीडीएस प्रणाली की जगह डीबीटी प्रणाली लाना ठीक रहेगा, साथ ही बाजार को घरेलू तौर पर और आयात के लिए पूरी तरह खोलना उचित कहलाएगा.

 

•  आर्थिक सर्वे के अनुसार ज्यादातर राज्यों में पीडीएस अब डिजिटलीकृत हो चुका है. पीडीएस प्रणाली में आपूर्ति की कड़ी से जुड़े एजेंट अपने हितों के बाधित होने की सूरत में जनधन, आधार तथा मोबाइल फोन के समन्वय से चलने वाली वितरण प्रणाली को आघात पहुंचा सकते हैं. सार्वजनिक वितरण प्रणाली की दुकानों में बायोमीट्रिक सत्यापन के जरिए काम करने वाली प्वाइंट ऑफ सेल मशीन लगाने की दिशा में मिली कम सफलता इस बात का संकेत करती है. 

 

• प्वाइंट ऑफ सेल मशीन के जरिए लाभार्थी अपनी अंगुली की बायोमीट्रिक पहचान कराते हैं और सत्यापित होने पर उन्हें अनुदानित मूल्य का अनाज दिया जाता है. यह प्रयोग आंध्रप्रदेश के कृष्णा जिले में सफल साबित हुआ है, कालाबाजारी में कमी आई है. 

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•  गरीब जन के उपभोग-बस्ते में किरोसिन के उपभोग का हिस्सा मात्र एक प्रतिशत होता है, पीडीएस के जरिए दिए जा रहे किरोसिन के 50 प्रतिशत हिस्सा का उपभोग अपेक्षाकृत संपन्न जन कर रहे हैं यानी किरोसिन पर दी जाने वाली सब्सिडी का 50 प्रतिशत सपन्न तबके के हिस्से में जा रहा है.

 

• पंजाब और हरियाणा में धान और गेहूं की खेती करने वाले सभी किसान न्यूनतम समर्थन मूल्य से संबंधित नीति के प्रति आगाह हैं लेकिन दलहन की खेती करने वाले बहुत कम ही किसान जानते हैं कि न्यूनतम समर्थन मूल्य की नीति दलहनी फसलों के लिए भी है. गुजरात, महाराष्ट्र, राजस्थान, आंध्रप्रदेश तथा झारखंड में 50 प्रतिशत या इससे कम ही किसानों ने कहा कि उन्हें धान या गेहूं के लिए जारी न्यूनतम समर्थन मूल्य की नीति की जानकारी है.

 

•  न्यूनतम समर्थन मूल्य पर खाद्यान्न की सरकारी खरीद में धान, गेहूं तथा गन्ना पर विशेष बल है, यहां तक कि दलहन और तेलहन की न्यूनतम समर्थन मूल्य पर सरकारी खरीद को भी तवज्जो नहीं दी जाती. इस वजह से धान और गेहूं का अतिरिक्त भंडारण तो तय सीमा से ज्यादा हो जाता है लेकिन भरपूर आयात के बावजूद दलहन और तेलहन के दामों पर नियंत्रण रख पाना मुश्किल हो जाता है.  

 

• ज्यादातर राज्यों में अधिकतर फसलों की खरीद न्यूनतम समर्थन मूल्य पर नहीं होती. इससे संकेत मिलता है कि किसान अतिरिक्त फसलों की उपज को स्थानीय खरीदारों को या तो एमएसपी से ज्यादा मूल्य पर या फिर कम मूल्य पर बेच रहे हैं. अगर विकल्प ना होने की स्थिति में किसान कम मूल्य पर उपज बेच रहे हैं तो फिर इससे संकेत मिलता है क्षेत्रीय स्तर पर खेती से होने वाली आमदनी में अन्तर पैदा हो रहा है. 

 

 

नेशनल सैंपल सर्वे के 68 वें दौर की गणना पर आधारित रिपोर्ट:  पीडीएस एंड अदर सोर्सेज ऑफ हाऊसहोल्ड कंजप्शन, 2011-12 ( जून 2015 में प्रकाशित), के तथ्यों के अनुसार:

http://mospi.nic.in/Mospi_New/upload/report_565_26june2015.pdf 

• साल 2011-12 में चावल के उपभोग में पीडीएस की हिस्सेदारी ग्रामीण इलाके में लगभग 27.9% तथा शहरी अंचल में 19.6% थी। गेहू या आटे की खपत में पीडीएस की हिस्सेदारी ग्रामीण अंचल में 17.3% तथा शहरी अंचल में 10.1% थी।

---  ग्रामीण क्षेत्रों में चीनी की खपत में पीडीएस के जरिए हुई खरीदारी का हिस्सा 15.8% तथा शहरी क्षेत्र में 10.3% है। दूसरी तरफ मिट्टी के तेल की खपत के मामले में पीडीएस से हुई खरीदारी का हिस्सा ग्रामीण अंचलों में 80.8% तथा शहरी क्षेत्र में 58.1% है।

चावल:  राज्यवार पीडीएस का उपयोग

•  राष्ट्रीय स्तर पर देखें तो ग्रामीण अंचल के तकरीबन 46 प्रतिशत तथा शहरी अंचल के तकरीबन 23 प्रतिशत परिवारों ने कहा कि उन्होंने बीते 30 दिनों के भीतर सरकारी राशन दुकान से चावल की खरीद की है।

•  जिन राज्यों के ग्रामीण अंचलों में सरकारी राशन दुकान से चावल की खरीद बहुत ज्यादा हुई उनके नाम हैं तमिलनाडु (89% परिवार),  आंध्रप्रदेश (87% परिवार), केरल (78% परिवार) तथा कर्नाटक (75% परिवार).

•  चावल की खपत में पीडीएस के मार्फत हुई खरीददारी का हिस्सा सबसे ज्यादा तमिलनाडु ( ग्रामीण: 53%,  शहरी: 43%) का रहा। इसके बाद कर्नाटक ( ग्रामीण: 45%,  शहरी: 25%), छत्तीसगढ़ ( ग्रामीण: 38%,  शहरी: 30%),  केरल ( ग्रामीण: 36%,  शहरी: 30%)  तथा आंध्रप्रदेश ( ग्रामीण: 33%,  शहरी: 22%) का स्थान है।.

---  पश्चिम बंगाल जहां चावल मुख्य आहार है, पीडीएस के मार्फत हुई खरीदारी का हिस्सा बहुत कम (ग्रामीण: 10%,  शहरी: 6%) है.

गेहूं/ आटा:  विभिन्न राज्यों में पीडीएस के जरिए उपभोग

• राष्ट्रीय स्तर पर देखें तो ग्रामीण अंचल के तकरीबन 34 प्रतिशत तथा शहरी अंचल के तकरीबन 19 प्रतिशत परिवारों ने कहा कि उन्होंने बीते 30 दिनों के भीतर सरकारी राशन दुकान से चावल की खरीद की है।

• महाराष्ट्र(40 प्रतिशत), मध्यप्रदेश(36 प्रतिशत) तथा गुजरात (32 प्रतिशत) के ग्रामीण अंचलों में पीडीएस के जरिए गेहूं या आटे की खरीद करने वाले परिवारों की संख्या अन्य राज्यों की तुलना में बहुत ज्यादा है।

•  मध्य प्रदेश के शहरी अंचल के तकरीबन 23 प्रतिशत परिवारों ने पीडीएस के मार्फत अपना मुख्य खाद्याहार गेहूं हासिल किया।

चीनी:  राज्यवार पीडीएस के जरिए उपभोग

• चीनी की खपत में पीडीएस के मार्फत हुई खरीददारी का हिस्सा सबसे ज्यादा तमिलनाडु ( ग्रामीण: 90%,  शहरी: 77%) का रहा। इसके बाद आंध्रप्रदेश ( ग्रामीण: 82%,  शहरी: 42%), असम ( ग्रामीण: 71%,  शहरी: 41%),  छत्तीसगढ़ ( ग्रामीण: 66%,  शहरी: 36%)  तथा कर्नाटक ( ग्रामीण: 67%,  शहरी: 27%) का स्थान है।.

•  पंजाब, झारखंड, बिहार राजस्थान तथा महाराष्ट्र और गुजरात के शहरी इलाकों में चीनी के उपभोग में पीडीएस के मार्फत हुई खरीद का हिस्सा बहुत कम (0-5% परिवार) है,  यही बात हरियाणा, उत्तरप्रदेश तथा पश्चिम बंगाल के शहरी इलाकों (5-10% परिवार) के बारे में कही जा सकती है। .

मिट्टी का तेल: राज्यवार पीडीएस के जरिए उपभोग

•  राष्ट्रीय स्तर पर देखें तो 76 प्रतिशत ग्रामीण परिवारों तथा 30 प्रतिशत शहरी परिवारों ने मिट्टी तेल की खरीद के प्रमुख स्रोत के रुप में पीडीएस प्रणाली का उपभोग किया जबकि 22 प्रतिशत ग्रामीण तथा 16 प्रतिशत शहरी परिवारों ने कहा कि उन्होंने मिट्टी की तेल की खरीद पीडीएस से एतर माध्यम से की।

•  पंजाब और हरियाणा को छोड़कर अन्य सभी बड़े राज्यों में  पीडीएस के जरिए मिट्टी का तेल खरीदने वाले ग्रामीण परिवारों की तादाद 62 प्रतिशत से 91 प्रतिशत के बीच तथा शहरी परिवारों की तादाद 10 प्रतिशत से लेकर 59 प्रतिशत के बीच है।

•  पश्चिम बंगाल के शहरी और ग्रामीण दोनों ही अंचलों में पीडीएस के जरिए मिट्टी का तेल खरीदने वाले परिवारों की तादाद बहुत ज्यादा(91% ग्रामीण, 59% शहरी) है,  इसके बाद बिहार (88% ग्रामीण, 53% शहरी), तथा छत्तीसगढ़ (86% ग्रामीण, 48% शहरी) का स्थान है.

 परिवारों के बीच विभिन्न प्रकार के राशनकार्डों का वितरण

 •राष्ट्रीय स्तर पर देखें तो 5% ग्रामीण परिवारों के पास अंत्योदय राशनकार्ड हैं,  38% ग्रामीण परिवारों के पास बीपीएल श्रेणी के कार्ड हैं, 42% ग्रामीण परिवारों के पास अंत्योदय तथा बीपीएल श्रेणी से इतर श्रेणी के कार्ड हैं जबकि 14 प्रतिशत ग्रामीण परिवारों के पास किसी भी प्रकार का राशनकार्ड नहीं है।

•  शहरी परिवारों में 2 प्रतिशत के पास अंत्योदय कार्ड है, 16 प्रतिशत के पास बीपीएल श्रेणी का कार्ड है, 50 प्रतिशत शहरी परिवारों के पास अन्य श्रेणी के कार्ड हैं जबकि 33 प्रतिशत शहरी परिवारों के पास कोई कार्ड नहीं है।

•  देश के ग्रामीण अंचलों में दिहाड़ी मजदूरी करने वाले खेतिहर तथा गैर-खेतिहर परिवारों में अंत्योदय कार्डधारियों की संख्या सबसे ज्यादा यानी 7 प्रतिशत है। नियमित आमदनी वाले परिवारों में अंत्योदय कार्डधारियों की संख्या 3 प्रतिशत है.  दिहाड़ी मजदूरी करने वाले खेतिहर परिवारों में 56 प्रतिशत के पास बीपीएल श्रेणी के कार्ड हैं।

•  देश के ग्रामीण अंचल में 8 प्रतिशत एससी श्रेणी के परिवारों के अंत्योदय कार्ड है जबकि एसटी श्रेणी के 7 प्रतिशत परिवारों के पास अंत्योदय श्रेणी का कार्ड है.  ग्रामीण अंचल में बीपीएल कार्डधारी एसटी परिवारों की तादाद 49 प्रतिशत है जबकि एससी परिवारों की तादाद 47 प्रतिशत.

• देश के शहरी अंचल में 3 प्रतिशत एससी और एसटी परिवारों के पास और 2 प्रतिशत ओबीसी श्रेणी के परिवारों के पास अंत्योदय कार्ड है. तकरीबन 20 फीसदी एसटी, एससी तथा ओबीसी परिवारों के पास शहरी अंचलों में बीपीएल श्रेणी का कार्ड है लेकिन अन्य जातीय समूहों में शामिल परिवारों में केवल 8 फीसदी के पास बीपीएल कार्ड है.

•एसटी श्रेणी के सर्वाधिक शहरी परिवारों (41%) किसी भी किस्म का राशनकार्ड नहीं है.

•  आंध्रप्रदेश के शहरी और ग्रामीण दोनों ही अंचलों में बीपीएल कार्डधारी परिवारों की संख्या अपेक्षाकृत ज्यादा (85%  ग्रामीण, 49%  शहरी) है,  इसके बाद  बीपीएल कार्डधारियों की उच्च तादाद के मामले में कर्नाटक (64% ग्रामीण, 29% शहरी)  तथा छत्तीसगढ़ (59%  ग्रामीण, 33%  शहरी) का स्थान है.