रंजन गोगोई इंटरव्यू: फैसले के बदले मुझे कुछ लेना ही होता तो महज....

रंजन गोगोई इंटरव्यू: फैसले के बदले मुझे कुछ लेना ही होता तो महज....

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published Published on May 9, 2020   modified Modified on May 9, 2020

-इंडिया टूडे,

देश के प्रधान न्यायाधीश के पद से रिटायर होने के महज चार महीने बाद ही राष्ट्रपति की ओर से मनोनीत राज्यसभा सदस्यता की 19 मार्च को शपथ लेकर रंजन गोगोई ने अच्छा-खासा विवाद खड़ा कर दिया. विपक्षी नेताओं और कई न्यायविदों ने नैतिकता का सवाल उठाकर आरोप लगाया कि यह पद पर रहते हुए मोदी सरकार के पक्ष में दिए गए कई फैसलों के बदले गोगोई को सीधे-सीधे पुरस्कृत किए जाने का मामला है. अपने करियर के पहले इंटरव्यू में गोगोई ने इंडिया टुडे के ग्रुप एडिटोरियल डायरेक्टर राज चेंगप्पा और सीनियर एडिटर कौशिक डेका से विशेष बातचीत की. चुनिंदा अंश:

प्र. देश के प्रधान न्यायाधीश पद से सेवानिवृत्त होने के बाद इतनी जल्द राज्यसभा के लिए मनोनयन को आपने क्यों स्वीकार कर लिया? आपको नहीं लगता कि थोड़ा और रुकना चाहिए था?

मुझे इसे स्वीकार क्यों नहीं करना चाहिए था? राष्ट्रपति अगर अनुच्छेद 80 के तहत इस तरह का कोई प्रस्ताव देते हैं तो आप अस्वीकार नहीं करते. राष्ट्र अगर आपकी सेवाएं चाहता है तो क्या आपको उसे मना कर देना चाहिए? जहां तक पर्याप्त अंतराल (कूलिंग ऑफ) का मामला है, तो उसे आप किस नियम-कानून के तहत तय करेंगे? यह जरूरी ही है तो इसके लिए बाकायदा कानून बना दीजिए. दूसरे, कूलिंग ऑफ पीरियड को लागू भी किया तब आप उन पंचाटों में नियुक्तियां कैसे करेंगे जिनके मुखिया सुप्रीम कोर्ट के सेवानिवृत्त न्यायाधीश होते हैं? कूलिंग ऑफ पीरियड के नियम तय करने का काम कार्यपालिका या नीति-नियंताओं का है.

• मार्च 2019 में आपने कहा था कि सेवानिवृत्ति के बाद की नियुक्तियां न्यायपालिका की स्वतंत्रता पर धब्बा हैं. साल भर में ही आपकी राय इतनी कैसे बदल गई?

राज्यसभा की सदस्यता कोई नौकरी है? मेरा बयान पंचाटीकरण से जुड़े एक फैसले के संदर्भ में था. यह कोई नौकरी नहीं है. यह एक पहचान है और उम्मीद भी कि आप अपनी विशेषज्ञता के क्षेत्र में योगदान करेंगे.

• आपके शपथ ग्रहण के दौरान विपक्षी दलों के सदस्य 'शर्म करो-शर्म करो' का नारा लगाते हुए सदन से बाहर चले गए. इस पर आप क्या कहेंगे?

कोई प्रतिक्रिया नहीं. इसका अंदेशा था. विपक्षी दल अंदर बाहर आते-जाते रहते हैं. मुझे समझ नहीं आता कि कोई भी संजीदा आदमी इससे परेशान क्यों होगा भला!

• मामला केवल विपक्षी दलों का ही नहीं है. कई पूर्व न्यायाधीशों ने इशारा किया कि आपका मनोनयन आपके कार्यकाल के दौरान राम जन्मभूमि और राफेल सौदे सरीखे मामलों में मोदी सरकार के पक्ष में दिए गए फैसलों के बदले में मिलने वाला पुरस्कार है.

मुझे लगता है, इस तरह के बयान अदालत की अवमानना के आसपास टिकते हैं. उन फैसलों को क्या मैंने अकेले लिखा? सुनवाई में दूसरे न्यायाधीश शामिल नहीं थे? क्या यह सिर्फ वन-मैन शो था? अगर यह उन फैसलों के बदले मिलने वाली खैरात है तो इन फैसलों में तो वे न्यायाधीश भी शामिल थे. आप उनकी कर्तव्यनिष्ठा पर भी सवाल खड़ा कर रहे हैं. अगर आप कोई ऐसा फैसला सुनाते हैं जो सरकार के पक्ष में जाता है तो इसका मतलब आप वे फैसले राज्यसभा की सीट के लिए लिख रहे हैं? और सरकार के खिलाफ फैसले देने से आप राज्यसभा की सदस्यता के पात्र हो जाते हैं? अगर यह उन फैसलों के बदले मिला पुरस्कार होता तो मैं कोई खासा फायदे वाला पद मांगता. राज्यसभा की सीट में क्या धरा है?


• अगला कदम मंत्री बनना होगा?

मैं कोई नजूमी तो हूं नहीं. परिवार में बचपन से ही मैंने मंत्री देखे हैं. मंत्री पद निश्चित ही मेरा लक्ष्य नहीं है. मैं किसी पेशकश की उम्मीद नहीं रखता. राजनीति में जाने या किसी पार्टी में शामिल होने का मेरा कतई कोई इरादा नहीं.

• कई न्यायविदों ने कहा है कि आपने यह मनोनयन स्वीकार करके न्यायपालिका की निष्पक्षता और स्वतंत्रता के साथ समझौता किया है.

राज्यसभा की बहस में हिस्सा लेना न्यायपालिका की स्वतंत्रता के साथ समझौता कैसे हो सकता है. ऐसा कुछ किया है मैंने?

• असल मुद्दा प्रधान न्यायाधीश के पद से हटने के फौरन बाद राज्यसभा सीट स्वीकार करना था. इस पर नैतिक दृष्टि से सवाल उठाया गया.

यानी आप चार महीने बाद मनोनयन स्वीकार लें तो ठीक नहीं, और 12 महीने बाद स्वीकारें तो ठीक? तब इसे इनाम नहीं कहा जाएगा?

• कई लोग इसमें विधायिका और न्यायपालिका के बीच एक तरह का गठजोड़ देखते हैं, जो लोकतंत्र के लिए खतरनाक है.

आज न्यायपालिका की स्वतंत्रता का मतलब यह हो गया है कि वह सरकार को कितना प्रभावी ढंग से नियंत्रित कर रही है, सरकार के कामकाज के बारे में राय जाहिर करने के मामले में जज कितने बोल्ड हैं? एक जज चंद लोगों पर नकेल कसने के पैमाने पर आंका जाता है. इस पर कभी कोई चर्चा हुई कि न्यायपालिका को कौन-सी बीमारी खाए जा रही है? ऐसा क्यों है कि किसी दीवानी मामले में अदालती आदेश के लिए इंतजार अगली पीढ़ी तक खिंच जाता है? ऐसा क्यों है कि भारत में 48 फीसद आपराधिक मामले समन जारी करने के चरण में लटके हुए हैं?


• हमने देशभर की विधायी इकाइयों में ह्रास देखा है. मसलन कर्नाटक, महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश. लोग उम्मीद करते हैं कि न्यायपालिका इस पर लगाम लगाए, न कि उसके साथ सांठगांठ करे. इस संदर्भ में आपके विधायिका में शामिल होने पर सवाल खड़ा किया गया है.

कोई नहीं कह रहा कि न्यायपालिका और विधायिका या न्यायपालिका और कार्यपालिका को आपस में सांठगांठ करके काम करना चाहिए. पर उन्हें एक-दूसरे से भिडऩा (भी) नहीं चाहिए, क्योंकि उससे हमें कुछ हासिल नहीं होगा. ब्रिटेन में सुप्रीम कोर्ट को न्यायिक समीक्षा का अधिकार नहीं है. संसद सर्वोपरि है. तो क्या इसका मतलब यह है कि ब्रिटेन में न्यायपालिका स्वतंत्र नहीं है? अगर देश की न्यायपालिका मुट्ठी भर लोगों को समझने में प्रभावी ढंग से अधिकारों का इस्तेमाल नहीं कर रही है तब वह विधायिका के साथ सांठगांठ कर रही है. अपने न्यायाधीशों पर भरोसा कीजिए.

• हम तो उन पर विश्वास करते ही हैं. लेकिन न्यायिक फैसलों में कार्यपालिका के दखल के बारे में क्या कहेंगे? दिल्ली दंगों की सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति एस. मुरलीधर का तबादला दिल्ली हाइकोर्ट से पंजाब कर दिया गया.

कार्यपालिका या विधायिका अगर न्यायपालिका के कामकाज में दखल की कोशिश करे तो उसे पूरी तरह हतोत्साहित करना चाहिए. मसलन, कांग्रेस के राज्यसभा सदस्य कपिल सिब्बल जब दीपक मिश्र के खिलाफ महाभियोग में सुप्रीम कोर्ट का समर्थन मांगने के लिए मेरे घर आए तो सुरक्षा गार्डों ने...(उन्हें वापस भेज दिया). पर क्या आपको न्यायमूर्ति मुरलीधर के तबादले की वजह मालूम है? मैं इसे जाहिर करने से बचूंगा क्योंकि यह जनहित में न होगा. पारदर्शिता जरूरी है पर कुछ अड़चनें हैं. न्यायमूर्ति मुरलीधर के तबादले का सरकारी आदेश दो दिन बाद आ सकता था. उस वक्त आए आदेश ने व्यवस्था का भला नहीं किया. वे एक संवेदनशील मामले की सुनवाई कर रहे थे.

• प्रधान न्यायाधीश रहते हुए कॉलेजियम नियुक्तियों को लेकर सरकार के साथ आपकी खींचतान होती थी. क्या है इससे उबरने का रास्ता?

अगर मेरे पास इसका जवाब होता तो प्रधान न्यायाधीश की हैसियत से उन सुधारों को लागू कर देता. अगर आपको लगता है कि कॉलेजियम सिस्टम ठीक नहीं है तो इसकी जगह बेहतर व्यवस्था ले आइए. सार्थक बातचीत से ही बेहतर व्यवस्था तैयार की जा सकती है, न कि न्यायाधीशों और फैसलों को कोसने वाले लेखों से.

• राफेल, राम जन्मभूमि स्थल के मालिकाना हक जैसे मामलों में आपके फैसले और धारा 370 रद्द करने की समीक्षा जल्दी कराने के मामले में आपकी अनिच्छा को केंद्र सरकार के पक्ष में देखा गया. आप उन फैसलों का बचाव कैसे करते हैं?

न्यायाधीशों को इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि फैसला किसके पक्ष में है. मैं धारा 370 से जुड़े मामले की सुनवाई नहीं कर सकता था क्योंकि मैं राम जन्मस्थल के मालिकाना हक के मामले की सुनवाई कर रहा था. लेकिन मैंने 370 मामले की अगले दिन सुनवाई के लिए एक बेंच तय कर दी थी.

• जम्मू-कश्मीर में सात महीने से लॉकडाउन है. न्यायपालिका को तेजी से काम नहीं करना चाहिए था?

मैंने इस मामले को पिछले कुछ महीनों से फॉलो नहीं किया. मैं सेवानिवृत्त हो गया था.

• आप पर राफेल सौदे में सरकार के समर्थन का आरोप है.

हमारी राय यह थी कि हथियार खरीद का करार किसी निर्माण के ठेके से अलग है. इसका मतलब यह नहीं कि अगर हम भ्रष्टाचार का कोई सबूत देखते तो अपनी आंखें मूंद लेते. मूल आदेश में तीनों न्यायाधीशों को लगा कि इस करार में भ्रष्टाचार के सबूत दूर की कौड़ी हैं. फिर समीक्षा की बारी आई, जिसमें सीबीआइ की ओर से एफआइआर दर्ज करने की मांग की गई. जब मूल आदेश में भ्रष्टाचार के आरोप दूर की कौड़ी लगे तो न्यायमूर्ति एस.के. कौल और मुझे एफआइआर दर्ज करने की जरूरत नहीं लगी.

न्यायमूर्ति के.एम. जोसफ की राय थोड़ी अलग थी. समीक्षा का फैसला न्यायमूर्ति कौल ने लिखा. न्यायमूर्ति जोसफ ने अलग आदेश लिखा. फिर भी मुझ पर सरकार की मदद करने का आरोप लगाया जाता है, मानो बाकी दो न्यायाधीश निरर्थक थे. क्या यह अदालत की अवमानना नहीं है? क्या यह बाकी दो न्यायाधीशों की कर्तव्यनिष्ठा पर सवाल नहीं है? उपकरणों की आपूर्ति के लिए न्यायिक समीक्षा के मानक सीमित होने चाहिए. देश को उस विमान की जरूरत थी. उनकी गुणवत्ता और असर को कभी चुनौती नहीं दी गई. इन बातों को एक ओर रख दीजिए तो पलड़ा उस करार को बरकरार रखने की तरफ झुक जाएगा.

• आरोप यह था कि मोदी सरकार ने शुरुआती करार में तय की गई रकम से ज्यादा पैसा चुकाया.

एक बेस एयरक्राफ्ट था. दूसरा पूरी तरह से सुसज्जित विमान. भारत ने पूरी तरह सुसज्जित विमान हासिल किया. आप लोगों को यह कैसे बताएंगे कि पूरी तरह से लैस विमान का मतलब क्या होता है? इससे हथियारों और उपकरणों के बारे में सारी जानकारी जाहिर हो जाएगी और पाकिस्तान को मजा आ जाएगा. वे अपने विमान को इससे भी बेहतर ढंग से लैस कर लेंगे.

• आपने यह कैसे तय कर लिया कि आरोप दूर की कौड़ी हैं?

अपने फैसलों का बचाव करना मेरी जिम्मेदारी नहीं है. इसकी पर्याप्त सुनवाई नहीं हुई. वे सिर्फ यही कह रहे थे—इस देश ने इतने पैसे में यह विमान हासिल किया, उस देश ने इतने पैसे में हासिल किया. यह कि एक ऑफसेट लागत थी जिसका अनिल अंबानी की मदद करने के लिए दुरुपयोग किया गया. बेंच को लगा कि उससे ज्यादा ठोस बात की जरूरत है. राष्ट्रहित सर्वोपरि है. राष्ट्रहित को न्यायिक व्याख्या से अलग नहीं किया जा सकता.

• आपकी छवि ऐसे न्यायाधीश की है जो समयबद्ध ढंग से न्याय देने में यकीन करता है. आपने यह विशेषकर राम जन्मभूमि के मालिकाना हक जैसे मामलों में कैसे पक्का किया? आपको किन बाधाओं का सामना करना पड़ा? आपने उस मामले में भी सर्वसम्मति वाला फैसला सुनाया.

मुझे किसी बाधा का सामना नहीं करना पड़ा. अगर कोई न्यायाधीश चाह ले तो वह निश्चित समय सीमा के भीतर न्याय दे सकता है. राम जन्मभूमि का मामला पेचीदा था लेकिन देश के प्रधान न्यायाधीश को कुछ ऐसी चीजें करनी होती हैं जिनके बारे में आम लोग नहीं जानते. वे प्रशासकीय काम होते हैं. जरूरी नहीं कि वे हमेशा दैवीय काम हों. कभी-कभी आपको अच्छा बनना होता है, कभी रूखा, कभी सख्त और कभी-कभी उजड्ड. आपको काम जारी रखने के लिए डराने या धमकाने की जरूरत पड़ सकती है. सर्वसम्मति कोई समस्या नहीं थी. सभी चार न्यायाधीश हर दिन की सुनवाई के बाद एक घंटा मेरे चैंबर में बिताते थे. हम लोगों के बीच कभी असहमति नहीं हुई.

• क्या आप कह रहे हैं कि बड़े उद्देश्य के लिए हमेशा नियमों का पालन जरूरी नहीं है?

नियम क्या हैं? आप अपने नियम खुद बनाते हैं बशर्ते वे देश के कानून के खिलाफ न हों या अनैतिक न हों.

• जन्मभूमि मामले में अहम मुकाम क्या था? किस समय आपने तय किया कि तयशुदा वक्त में इसे हल करना है?

जब मध्यस्थता नाकाम हो गई.

• राम जन्मभूमि मामले में कई लोगों का कहना है कि आपने 40 दिनों तक हर रोज सुनवाई इसलिए की क्योंकि आप इस मामले का हल अपने कार्यकाल में निकालना चाहते थे. तो क्या हल करने के अपने उद्देश्य में आपने किसी प्रक्रियागत आवश्यकता के साथ समझौता किया?

मैंने कभी कोई समझौता नहीं किया और न ही कभी करूंगा.

• कई लोगों को लगा कि मुस्लिम पक्ष को जमीन देकर सुप्रीम कोर्ट ने विवादित स्थल पर मस्जिद के उनके दावे को सही ठहराया. अगर यह सही है तो उन्हें दूसरी जगह जमीन क्यों दी गई, मूल स्थान पर क्यों नहीं दी गई?

सेवानिवृत्त न्यायाधीश अपने फैसलों का बचाव नहीं करते. वे केवल दूसरों के फैसलों की आलोचना करते हैं.

• सबरीमला मामले को बड़ी पीठ को देने की जरूरत क्यों पड़ी जब आप इस पर खुद फैसला ले सकते थे?

हम ऐसा नहीं कर सकते थे. हमारे सामने सबरीमला मामले के औचित्य का मुद्दा था. अगर सबरीमला मामले को कानून के तौर पर रखा जाता तो मुस्लिम और पारसी जैसे दूसरे धार्मिक समूह प्रभावित होते. यह तय करना था कि सबरीमला मामले का फैसला सही या गलत था. अन्यथा सबरीमला इन सारे मामलों को बंद कर देता. इसमें इन मामलों की सुनवाई किए बगैर इन्हें बंद करने की क्षमता थी. लिहाजा, यह समीक्षा अधिकार क्षेत्र से बढ़कर था. हम समीक्षा को खारिज करने वाले थे. लिहाजा, (हमने) समीक्षा को लंबित रखा और इसे दोबारा तैयार करने के लिए इस सवाल को बड़ी पीठ को भेज दिया. सवाल बड़ा सीधा-सा था—जरूरी धार्मिक परंपराओं को तय करने का न्याययिक अधिकार. क्या आस्था की चलेगी या कानून की? आस्था की तार्किक व्याख्या नहीं की जा सकती, लिहाजा इसे कानूनी तौर पर व्याख्या नहीं हो सकती.

• आपने असम में अगस्त 2019 में राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर की निगरानी की. क्या 19 लाख लोगों के बाहर रह जाने से इसने राज्य में अव्यवस्था पैदा नहीं की? लोग यह भी शिकायत करते हैं कि योग्य लोग बाहर रह गए और अयोग्य अंदर हो गए.

एनआरसी ने अव्यवस्था पैदा कर दी है तो सुप्रीम कोर्ट और इस प्रक्रिया में शामिल दूसरी एजेंसियों को इसे सुलझाने दीजिए. इतनी व्यापक प्रक्रिया में स्वाभाविक है कि कुछ लोग खुश नहीं होंगे. असंतोष अब घटकर सोचे-समझे निजी हमलों तक पहुंच गया है.

• आपके खिलाफ यौन उत्पीडऩ का मामला था. एक ओर जहां आरोपों की जांच कर रही सुप्रीम कोर्ट की एक समिति ने आपको क्लीन चिट दे दिया, वहीं कई न्यायविदों ने कहा कि आपके खिलाफ सुनवाई कर रही पीठ की अध्यक्षता करना नैतिक रूप से गलत था. फरियादी को पर्याप्त मौका नहीं दिया गया, किसी वकील या गवाह को इजाजत नहीं दी गई और इसकी सुनवाई छुट्टी के रोज हुई.

असाधारण परिस्थिति थी, और असाधारण परिस्थितियों में असाधारण उपाय किए जाते हैं. प्रधान न्यायाधीश को बदनाम करने की कोशिश की गई. मैं अदालत में था लेकिन उस बेहद सीधे-सादे आदेश का हस्ताक्षरकर्ता नहीं था. मैंने शनिवार को अयोध्या फैसला सुनाने के लिए संविधान पीठ बुलाई थी, हालांकि सोमवार कामकाज का दिन था. क्यों? हाल में इलाहाबाद हाइकोर्ट ने रविवार को सुनवाई की. तब कोई सवाल नहीं पूछा गया. क्या यह प्रधान न्यायाधीश को कम महत्वपूर्ण बनाने की कोशिश है? मेरे अपने मामले में मेरा खुद न्यायाधीश होने का सवाल नहीं उठता. शायद ही कोई प्रभावी आदेश पारित किया गया.

मैं न्यायिक आदेश का हिस्सा नहीं था. यह मामला विधिसम्मत गठित तीन न्यायाधीशों की समिति के पास गया था—यह इन-हाउस प्रक्रिया है. अगर आपको मुझ पर भरोसा नहीं है तो सुप्रीम कोर्ट की वेबसाइट देख लीजिए. वहां लागू होने वाली प्रक्रिया विस्तार में बताई गई है. उसमें उच्च न्यायपालिका के न्यायाधीशों की संवैधानिक सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए जांच की योजना पर विचार किया गया है. उसमें किसी गवाह या वकील के बिना जांच कराने को कहा गया है—एक प्राथमिक तथ्य अन्वेषी जांच. कृपया ध्यान रखें, सुप्रीम कोर्ट के इतिहास में इससे पहले सेवानिवृत्त न्यायाधीशों, गवाहों या वकीलों को लेकर कोई इन-हाउस जांच नहीं की गई. अगर जांच समिति का निष्कर्ष संबंधित न्यायाधीश के खिलाफ होता है, तो उस न्यायाधीश को इस्तीफा देना होता है.

अगर वह इस्तीफा नहीं देता है तो महाभियोग का रास्ता अपनाने के लिए मामले को देश के राष्ट्रपति के पास भेजा जाता है, जिसमें व्यापक जांच की जाती है. अगर इन-हाउस जांच में आरोप को निराधार पाया जाता है तो रिपोर्ट को सार्वजनिक नहीं किया जाता बल्कि उसकी एक प्रति संबंधित न्यायाधीश को दे दी जाती है. यह प्रक्रिया इंदिरा जयसिंह बनाम भारत सरकार (2003) 5 एससी 494 से निकली लगती है, जिसमें यह कहा गया था कि इन-हाउस प्रक्रिया को सार्वजनिक करने की जरूरत नहीं है. फरियादी को रिपोर्ट देने का मतलब उसे सार्वजनिक करना होगा, जिससे फायदे की बजाए नुक्सान ज्यादा होगा क्योंकि आरोप का मजमून, भले ही उसे अपुष्ट माना गया हो, न्यायाधीश को शर्मिंदा कर सकता है और उसे अपने फर्ज को निभाने की राह में आड़े आ सकता है.

अगर आपको प्रक्रिया से कोई समस्या है तो इसके लिए संविधान में संशोधन कीजिए. कार्यालय में महिलाओं का यौन शोषण (रोकने, निषेध और निवारण) कानून, 2013 और उसमें दिए गए नियम इस मामले में लागू नहीं होते. सुप्रीम कोर्ट की आंतरिक शिकायत समिति की अध्यक्षता अतिरिक्त रजिस्ट्रार करता है, जिसके पास मौजूदा न्यायाधीश के खिलाफ जांच करने का अधिकार नहीं है. कानून के तहत प्रस्तावित दंड, जैसे वेतन, पदोन्नति रोकना यहां तक कि बर्खास्त करना, सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीशों पर लागू नहीं होते. इस पृष्ठभूमि में, आप पसंद करें या नापसंद, अगर विधि सम्मत प्रक्रिया का पालन किया जाता है तो केवल इन-हाउस प्रक्रिया ही लागू होती है. किसी कानून के उपयुक्त या अनुपयुक्त होने के बारे में किसी व्यक्ति विशेष या समूह की राय से कानून खराब नहीं होता.

अगर कानून अनुपयुक्त है तो उसमें बदलाव सक्षम अधिकारी ही करेगा. जब तक कानून है उसका पालन किया जाएगा और उसे सब पर लागू किया जाएगा. संबंधित व्यक्ति के आधार पर तदर्थ प्रक्रियाएं नहीं हो सकतीं. यह खतरनाक मिसाल कायम कर देगा. मुझे मालूम था कि मुझे अपने पेशागत कर्तव्यनिष्ठा के लिए एक कीमत चुकानी है, जिससे कई हितों को नुक्सान होगा. लेकिन यह मेरे और मेरे परिवार के लिए बहुत परेशान करने वाला और सदमा पहुंचाने वाला अनुभव था. यह घटना अब भी मुझे तंग करती है. लेकिन मैं इस सुनियोजित हमले में बच गया क्योंकि सच और मेरी पत्नी का जबरदस्त समर्थन मेरे साथ था.

पूरा इंटरव्यू पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें.


राज चेंगप्पा, https://aajtak.intoday.in/story/ranjan-gogoi-rajya-sabha-rafael-sabarimala-law-sexual-harassment-1-1175520.html


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