न्याय:कितना दूर-कितना पास

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कॉमनकॉज और सीएसडीएस के लोकनीति प्रोग्राम द्वारा प्रस्तुत देश के प्रथम स्टेटस् ऑफ पोलिसिंग इन इंडिया रिपोर्ट (SPIR 2018)के मुख्य तथ्य

मूल रिपोर्ट के लिए कृपया यहां क्लिक करें 

रिपोर्ट में देश के 22 राज्यों में विधि-व्यवस्था को सवालिया नजरों से परखा गया है और भारत में पुलिस-व्यवस्था की स्थिति का जायजा लेते हुए मूल्यांकन करने की कोशिश की गई है. रिपोर्ट पुलिस के कामकाज तथा इस कामकाज को लेकर लोगों में प्रचलित धारणा के बारे में है. इसके लिए रिपोर्ट में आधिकारिक आकड़ों का विश्लेषण किया गया है तथा लोगों में पुलिस के कामकाज को लेकर प्रचलित धारणा के बारे में एक व्यापक सर्वेक्षण का सहारा लिया गया है. रिपोर्ट में पुलिस की व्यवस्था से जुड़ी उन कमियों की भी चर्चा की गई है जिनके बारे में सीएजी(CAG)ने बार बार अपनी रिपोर्टों में आगाह किया है और जो देश में तकरीबन हर राज्य में नजर आती हैं.

 

--    सर्वक्षण में शामिल तकरीबन 82 फीसद उत्तरदाताओं का कहना था कि पिछले 4-5 साल की अवधि में उनका पुलिस से कोई संपर्क नहीं हुआ है.

 

--- सर्वेक्षण में शामिल जिन उत्तरदाताओं ने कहा कि उनका पुलिस से संपर्क हुआ है उनमें से 67 फीसद तादाद ऐसे लोगों की थी जिन्होंने खुद पुलिस से संपर्क किया था. ऐसे केवल 17 फीसद मामलों में संपर्क पुलिस के द्वारा किया गया. 

 

--- जिन मामलों में संपर्क पुलिस की तरफ से किया गया उनमें सर्वाधिक तादाद(27 फीसद) आदिवासी समुदाय से जुड़े व्यक्तियों की थी. इसके बाद मुस्लिम (21 प्रतिशत), ओबीसी (17 प्रतिशत, दलित (16 प्रतिशत तथा अगड़ी जाति(13 प्रतिशत) का नंबर है. 

 

--- पुलिस से खुद संपर्क करने के मामलों में सबसे आगे (74 प्रतिशत) धनी व्यक्ति हैं जबकि पुलिस ने जिन मामलों में अपनी तरफ से संपर्क किया उनमें गरीब सबसे ज्यादा(21 प्रतिशत) हैं. धनी व्यक्ति (12 प्रतिशत) की अपेक्षा गरीब व्यक्ति (21 प्रतिशत) से पुलिस के संपर्क साधने की संभावना तकरीबन दोगुनी ज्यादा है.  

 

-- सर्वेक्षण  में शामिल 44 प्रतिशत उत्तरदाताओं ने कहा कि उन्हें पुलिस और उसकी प्रताड़ना का बहुत ज्यादा डर है. 

 

--- जहां तक धार्मिक समुदायों का सवाल है सिख(मुख्य रुप से पजाब) समुदाय में पुलिस का खौफ ज्यादा है. सर्वेक्षण में इस समुदाय के 37 फीसद लोगों ने कहा कि उन्हें पुलिस से बहुत ज्यादा डर लगता है.(यह राष्ट्रीय औसत का दोगुना है)

 

--- सर्वेक्षण में शामिल ज्यादातर (51 प्रतिशत) लोगों ने कहा कि पुलिस वर्गीय आधार पर भेदभाव करती है, लिंग के आधार पर पुलिस द्वारा भेदभाव करने की बात सर्वेक्षण में शामिल तकरीबन 30 फीसद लोगों ने कही. पुलिस के जाति के आधार पर भेदभाव करने की बात कहने वालों की तादाद सर्वेक्षण में 26 प्रतिशत रही जबकि धार्मिक आधार पर पुलिस के भेदभाव भरे बरताव की बात 19 प्रतिशत लोगों ने कही.

 

 --- सर्वेक्षण में शामिल 38 फीसद उत्तरदाता इस बात से सहमत थे कि पुलिस दलित समुदाय के लोगों को झूठे मामलों में फंसाती है, 28 फीसद उत्तरदाताओं ने कहा कि आदिवासियों पर माओवादी होने के आरोप मढ़ते हुए उन्हें झूठे मामलों में फंसाया जाता है तथा 27 फीसद उत्तरदाताओं ने कहा कि मुसलमानों को आतंकवाद के आरोप मढ़कर झूठे मामलों में फंसाया जाता है. 

 

--- अगर पूरे पांच साल की अवधि के औसत को आधार माने तो चुनिन्दा 22 राज्यों में से केवल 3 राज्य(पंजाब, उत्तराखंड, दिल्ली) ऐसे हैं जिनमें अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित पुलिस के पदों पर बहाली हुई. अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित पुलिस के कुल पदों पर बहाली करने में सिर्फ छह राज्य( बिहार, हिमाचल प्रदेश, कर्नाटक, नगालैंड, तेलंगाना, उत्तराखंड) कामयाब हुए. केवल नौ राज्य (आंध्रप्रदेश, असम, झारखंड, कर्नाटक, महाराष्ट्र, ओड़ीशा, पंजाब, तेलंगाना, उत्तराखंड) ऐसे हैं जिनमें ओबीसी श्रेणी के अंतर्गत आरक्षित पुलिस के कुल पदों पर बहाली हुई. कोई भी राज्य ऐसा नहीं है जहां महिलाओं के लिए आरक्षित पुलिस के 33 प्रतिशत पदों पर पूर्ण बहाली हुई हो.

 

सीएजी की ऑडिट रिपोर्ट के मुख्य तथ्यों का विश्लेषण:

 

• स्टॉफ क्वार्टर की कमी का मामला गंभीर है. असम के कुछ चुनिन्दा जिलों में स्टॉफ क्वार्टर की कमी का अनुपात 99 प्रतिशत, बिहार में 80 प्रतिशत तथा हिमाचल में 88 प्रतिशत है.

 

• मध्यप्रदेश में 50 महिला पुलिस-कर्मियों में 48 ने कहा कि उन्हें असुविधा( समुचित टॉयलेट का ना होना, बैठने-सुस्ताने तथा काम करने की उचित जगह का ना होना) होती है. 

 

• पुलिस के आधुनिकीकरण के लिए उपलब्ध फंड के इस्तेमाल ना होने का मामला भी बहुत गंभीर है. बिहार में इस श्रेणी के उपलब्ध फंड का 71 फीसद हिस्सा इस्तेमाल ना हो सका, यूपी में इस श्रेणी के इस्तेमाल ना हुए फंड की मात्रा 41 प्रतिशत तथा असम में 32 प्रतिशत है. 

 

• उत्तरप्रदेश ने प्रशिक्षण सामग्री के मद में उपलब्ध कराये गए 80 फीसद फंड खर्च नहीं किए, लौटा दिए. 

 

 



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