न्याय:कितना दूर-कितना पास

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कॉमनवेल्थ ह्यूमन राइटस् इनिशिएटिव(2005)- पुलिस एकाउंटेबेलिटी- टू इम्पोर्टेंट टू नेगलेट, टू अर्जेन्ट टू डिले नामक दस्तावेज के अनुसार- http://www.humanrightsinitiative.org/publications/chogm/chogm_2005/chogm_2005_full_report.pdf

 
• हिन्दुस्तान में उपरले स्तर की न्यायपालिका में समाज के अभिजन तबके का बाहुल्य है। उपरले स्तर के न्यायाधीशों की नियुक्ति में उनके द्वारा सरकार के पक्षपोषण में दिए गए फैसलों का बड़ा हाथ होता है। न्यायाधीशों की नियुक्ति की प्रक्रिया पारदर्शी नहीं है।

 • हिन्दुस्तान की पुलिस तादाद के लिहाज से दुनिया के चंद बड़े पुलिसबलों में एक है लेकिन इसमें महिलाओं की तादाद 2.2 फीसदी है।

 • पूरे भारतवर्ष में महिलाओं पर बड़े पैमाने पर हिंसाचार होता है लेकिन इससे संबंधित मुकदमों या फिर ऐसे अपराध रोकने की कार्रवाई पर सामाजिक रुढछवियां और पुरुष वर्चस्व की छाया होती है।

 • मामला घरेलू हिंसा की शिकार महिला का हो तो उसे खास तवज्जो नहीं दी जाती। इससे संबंधित कानून होने के बावजूद महिला को पुलिस जरुरी मदद नहीं पहुंचाती।

 • भारत भी उन देशों में से एक है जहां डीजीपी स्तर के अधिकारी की नियुक्ति में भाई-भतीजावाद की चलती है। सूबे के मुख्यमंत्री अपने पसंदीदा व्यक्ति को चयन प्रक्रिया की पारदर्शिता के अभाव में मनमाने ढंग से चुन लेते हैं।सेवाकालीन वरिष्ठता या फिर गुणवत्ता की उपेक्षा होती है।

• भारत में एक राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग है और फिर राज्यों के भी अपने मानवाधिकार आयोग हैं लेकिन कुल 35 किस्म के पुलिसबल की ज्यादती पर निगाह रखने के लिए यहां एक भी सविलियन संस्थायी व्यवस्था मौजूद नहीं है।

 


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