न्याय:कितना दूर-कितना पास

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विनायक सेन का मामला

(बिजनेस स्टैन्डर्ड, द हिन्दू आदि समाचार पत्र)

• नागरिक अधिकारों के लिए सक्रिय बिनायक सेन ने 14 मई 2009 को विचाराधीन कैदी के रुप में जेल में दो साल पूरे किए। उन पर नक्सलवादियों (छत्तीसगढ़) के मददगार होने का आरोप लगाया गया था।

 

• बिनायक सेन और उनकी पत्नी इलीना सेन ने अपना सारा जीवन समाज के वंचित तबके, गरीब और आदिवासियों के बीच स्वास्थ्य सेवा प्रदान करने में लगाया है। सेन की गिरफ्तारी के बाद यह कार्य रुका और उनकी क्लीनिक तहस नहस हो गई।

 

.• सुप्रीम कोर्ट से बिनायक सेन को 25 मई 2009 के दिन जमानत मिली। पीयूसीएल के उपाध्यक्ष श्री सेन को मई 2007 से अनलॉफुल एक्टिविटी(प्रीवेंशन) एक्ट के तहत नक्सलवादियों का मददगार होने का आरोप लगाकर नजरबंद रखा गया था। उन पर छत्तीसगढ़ पब्लिक सिक्युरिटी एक्ट, 2005 की धारायें भी मढ़ी गईं। दोनों कानून नागरिक स्वतंत्रता का हनन करते हैं।

 

• बिनायक सेन को समाज सेवा के लिए कई अवार्ड मिल चुके हैं। इसमें जोनाथन मॉन अवार्ड ऑव ग्लोबल हेल्थ एंड ह्यूमन राइटस् भी शामिल है.

 

ईरोम शर्मिला का मामला

(विविध समाचार पत्र)

• साल 2009 के नवंबर में इरोम चानू शर्मिला के आमरण अनशन के ठीक नौ साल पूरे हो गए।शर्मिला लगातार नौ सालों से आर्म्ड फोर्सेज स्पेशल पावर एक्ट के विरोध में भूख हड़ताल पर है।  वह फिलहाल इंफाल के जे एन इंस्टीट्युट ऑव मेडिकल साईंसेज के सिक्टुरिटी वार्ड में बंदी है।

 

• उसपर आत्महत्या की कोशिश करने का आरोप है।

 

• पिछले सितंबर में शर्मिला को इंफाल के किमनेईंगनाग स्थित एडीशनल चीफ मैजिस्ट्रेट के सामने पेश किया गया तो उसकी न्यायिक हिरासत की अवधि अदालत ने दोबारा 15 दिनों के लिए बढ़ा दी ।

 

• अदालत में पेश किए जाने और रिमांड पर लिए जाने का यह सिलसिला शर्मिला के साथ पिछले नौ सालों से बदस्तूर जारी है।

 

• आर्म्ड फोर्सेज स्पेशल पावर एक्ट की बेरहमी से शर्मिला के सामना आज से नौ साल पहले 2002 के 2 नवंबर को हुआ था। एक दिन पहले यानी 1 नवंबर 2000 के दिन मणिपुर में सक्रिय एक उग्रवादी धड़े ने सेना के एक दस्ते पर बम पर फेंका था।बदले की कार्रवाई पर उतारु 8 वीं असम राईफल्स के जवानों ने मलोम स्थित एक बस स्टैंड पर अंधाधुंध फायरिंग की। अगले दिन मणिपुर के अखबारों में हताहतों की हृदयविदारक तस्वीरें छपीं ।

 

• इस घटना का शर्मिला पर गहरा असर पडा और 4 नंवबर 2000 के दिन से वह सेना को विशेषाधिकार देने वाले इस खास कानून के विरोध में आमरण अनशन पर बैठ गई।

 

• मानवाधिकार संगठनों की मानें तो  आर्म्ड फोर्सेज (स्पेशल पावर) एक्ट(1958) पिछले 45 सालों में भारतीय संसद द्वारा पास किया गया सबसे क्रूर कानून है।

 

• आर्म्ड फोर्सेज (स्पेशल पावरस्) एक्ट (1958) का पहला प्रयोग असम और मणिपुर में हुआ।

 

• साल 1972 के संशोधन के बाद इसे पूर्वोत्तर के अधिकतर राज्यों पर लागू किया गया। इस कानून के द्वारा फौजों को उपद्रवग्रस्त घोषित इलाकों में अपना ऑपरेशन मनमाने तरीके से चलाने की अकूत ताकत दी गई है ।

 

• यह कानून एक गैर-कमीशंड अधिकारी तक को शक के आधार पर या कानून व्यवस्था बनाये रखने के नाम पर जबरिया तलाशी ही नहीं किसी पर भी गोली चलाने का अधिकार देता है।यह कानून कई कोणों से न्यायभावना के विरूद्ध है।

 

• मिसाल के लिए इस कानून में यह नहीं बताया गया कि किन परिस्थितयों की मौजूदगी हो तो किसी इलाके को उपद्रवग्रस्त माना जाय। बस इतना कहा गया गया है कि अधिकारी वर्ग को लगना चाहिए कि किसी इलाके में हालात इतने बिगड़ उठें हैं कि सैन्य बल की तैनाती के बिना कानून-व्यवस्था नहीं बहाल की जा सकती।

 

• इस परिभाषा की अस्पष्टता को आधार बनाकर सुप्रीम कोर्ट में इंद्रजीत बरुआ बनाम असम सरकार नाम का एक मुकदमा चला था। अदालत ने तब गोलमटोल फैसला सुनाया कि परिभाषा की अस्पष्टता कोई मुद्दा नहीं है क्योंकि सरकार और भारतीय जनता इसका आशय बखूबी समझती है।

 

• इस कानून को लेकर एक दफे अंतर्राष्ट्रीय मंच पर भी भारत की किरकिरी हुई है।  1991 में भारत ने संयुक्त राष्ट्रसंघ की मानवाधिकार समिति के सामने अपनी दूसरी रिपोर्ट पेश की तो समिति के सदस्यों ने स्पेशल एक्ट की वैधता पर सवाल उठाये और पूछा कि इस कानून को भारतीय कानूनों की न्यायभावना के विपरीत क्यों ना माना जाय।

 

ललित मेहता की हत्या

(स्रोत- राइट टू फूड इंडिया)

• विकास सहयोग केंद्र( पलामू जिला ) के सदस्य ललित मेहता की 14 मई 2008 के दिन बर्बरता पूर्वक हत्या कर दी गई। श्री मेहता इस दिन मोटरसाइकिल से डाल्टेनगंज से छत्तरपुर लौट रहे थे।

 

• ललित मेहता(उम्र 36 साल), भोजन का अधिकार अभियान और ग्राम स्वराज अभियान के सक्रिय सहयोगी थे। वे भोजन और काम के अधिकार को लेकर पिछले पंद्रह वर्षों से इलाके में कार्य कर रहे थे।स्वभाव से अति विनम्र श्री मेहता के कार्यों की इलाके में खूब सराहना हो रही थी। भ्रष्टाचार की पोल खोलने, शोषण के खिलाफ आवाज उठाने और निहित स्वार्थों से टकराने में श्री मेहता ने अद्भुत साहस का परिचय दिया था।

 
• जिन दिनों श्री मेहता की हत्या हुई उन दिनों वे नरेगा के कामों के सामाजिक अंकेक्षण के लिए पलामू जिले के छत्तरपुर और चैनपुर प्रखंड में दिल्ली से आये स्वयंसेवकों की टोली की रहबरी कर थे।

 
 




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