मानवाधिकार

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 एशियन ह्यूमन राइटस् कमीशन (एएचआरसी) नामक संस्था द्वारा प्रस्तुत टार्चर इन इंडिया(२०१०) नामक दस्तावेज के अनुसार-
 http://www.achrweb.org/reports/india/torture2010.pdf:  

• साल २००० के बाद के उन आंकड़ों पर गौर करें जो गृहमंत्रालय ने संसद में पेश किए हैं तो पायेंगे कि साल २००८ तक जेल में मौत की घटनाओं में ५४.०२ फीसदी की बढ़ोतरी हुई है जबकि पुलिस हिरासत में मौत की घटनाओं में इसी अवधि में १९.८८ फीसदी की बढ़त हुई। वस्तुत साल २००४-०५ से साल २००७-०८ के बीच के यूपीए के शासन काल में जेल में हुई मौत की घटनाओं में ७०.७२ फीसदी का इजाफा हुआ है औएशियन सेंटर फॉर ह्यूमन राइटस् र पुलिस हिरासत में मौत की घटनाओं में १२.६० फीसदी का। .

• आठ अप्रैल २०१० को मंत्रिमंडल ने प्रीवेंशन ऑव टार्चर बिल को संसद में पेश करने का फैसला किया ताकि यूएन कन्वेंशन ऑन टार्चर के मानकों के अनुसार कानून बनाया जा सके। इस बिल को बड़ा गोपनीय रखा गया है। इससे पहले साल २००८ में भी प्रीवेंशन ऑव टार्चर बिल का प्रारुप तैयार किया गया था। प्रारुप में मात्र तीन अनुच्छेदों में यातना की परिभाषा, यातना के लिए दिया जाने वाला दंड और अपराध के संज्ञान के संबंध में शर्तों आदि का ब्यौरा दिया गया था। यह प्रारुप अत्यंत दोषपूर्ण था और एएचआरसी ( एशियन सेंटर फॉर ह्यूमन राइटस् ) सरकार को इस मुद्दे पर राष्ट्रीय स्तर पर बहस चलाने के बारे में सुझावों के साथ पत्र लिखा।

•साल १९९९-२००९ के बीच कांग्रेस और राष्ट्रवादी कांग्रेस शासित महाराष्ट्र में पुलिस हिरासत मेंसबसे ज्यादा मौतें(२४६ मामले) हुईं। इसके बाद उत्तरप्रदेश(१६५),गुजरात(१३९), पश्चिम बंगाल(११२ मामले), आंध्रप्रदेश(९९ मामले), तमिलनाडु(९३ मामले), असम(९१ मामले), पंजाब( ७१ मामले), कर्नाटक(६९ मामले), हरियाणा(६६ मामले), बिहार(४३ मामले), दिल्ली(४२ मामले) केरल(४१ मामले) , राजस्थान(३८ मामले), झारखंड((३१ मामले), उड़ीसा(२७ मामले) , छत्तीसगढ़(२३ मामले), मेघालय(१७ मामले), उत्तराखंड(१६ मामले), अरुणाचलप्रदेश(१५ मामले) त्रिपुरा(९ मामले), गोवा(५ मामले) का स्थान रहा। हिमाचलप्रदेश, जम्मू-कश्मीर और चंड़ीगढ़ में हिरासत मेंमौत के ४ मामले प्रकाश में आए।

• साल २००८-०९ में राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने पुलिसिया हिरासत में मौत के कुल १२७ मामले दर्ज किए थे। इसमें सर्वाधिक मामले उत्तरप्रदेश(२४) से दर्ज हुए। इसके बाद महाराष्ट्र(२३), आंध्रप्रदेश और गुजरात( प्रत्येक १२) और असम (कुल ७) का स्थान था।तमिलनाडु और हरियाणा से पुलिसिया हिरासत में मौत की कुल  6-6 मामले प्रकाश में आये। बिहार और मध्यप्रदेश से ऐसे पाँच –पाँच, पंजाब, राजस्थान और पश्तिम बंगाल से चार-चार, झारखंड, कर्नाटक, अरुणाचलप्रदेश, उड़ीसा और केरल से 2-2 और मेघालय, त्रिपुरा, चंडीगढ़,छत्तीसगढ़ और दादर नगरहवेली से ऐसा एक मामला आयोग में दर्ज हुआ।

• पुलिसिया हिरासत में मौत के मामले में पुलिस की तरफ से रुटीनी तौर पर कहा गया कि मामला आत्महत्या का है।राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो के अनुसार साल 2007 में पुलिसिया हिरासत में 31 लोगों की मौत को आत्महत्या करार दिया गया। साल 2006 में ऐसे मामलों की तादाद ब्यूरो ने 24 और 2005 में 30 बतायी थी।

• राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो के अनुसार साल 2007 में हिरासत में बलात्कार का एक मामला प्रकाश में आया जबकि साल 2006 में ऐसे मामलों की संख्या दो और 2005 में सात थी।
 
• उपर्युक्त रिपोर्ट (टार्चर इन इंडिया-२०१०) के अनुसार नक्सलवादी या माओवादी राज्यविरोधी सशस्त्र संघर्ष करने वालों में संभवतया सबसे बड़े मानवाधिकार उल्लंघनकर्ता हैं। वे आम नागरिक को पुलिस का मुखबिर बताकर मारते हैं, वे अपने अपहृत की निर्मम तरीके से हत्या करते हैं और इस हत्या के लिए वे अपनी खास पंचायत(जमअदालत) भी करते हैं।

• देश के मानवाधिकार आयोग ने साल 2006-2007 में कैदियों की प्रताड़ना के 1,996 मामले, साल 2007-2008 में ऐसे 1,596 मामले और साल 2008-2009 में 11 दिसंबर 2008 तक ऐसे 1,596 मामले दर्ज किए।

• गृहमंत्रालय के अधीन कार्यरत राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो के आंकड़ों के अनुसार साल 2006 में 1424 कैदियों की, साल 2005 में 1387 कैदियों की,  साल 2004 में 1169 एवम् 2003 में 1060 कैदियों की जेल में मृत्यु हुई। साल 2006 में जो कैदी मृत्यु का शिकार हुए उनमें 80 की मृत्यु अप्राकृतिक कारणों से हुई।

• नेशनल क्राइम रिकार्ड ब्यूरो के 2007 की वार्षिक रिपोर्ट में अनुसूचित जाति पर हुए अत्याचार के कुल 30031 मामले दिखाए गए हैं। इसमें 206 मामले प्रोटेक्शन ऑव सिविल राइटस् एक्ट के तहत और 9819 मामले एससी-एसटी प्रीवेंशन ऑव एट्रोसिटीज एक्ट के तहत दिखाये गए हैं। हालांकि एससी जातियों के साथ हुए अपराध में चार्जशीट दायर करने की दर 90.6 फीसदी है लेकिन महज 30.9 फीसदी मामलों में ही अभियुक्त पर किसी किस्म का फैसला दिया जा सका। गिरप्तार कुल 65554 लोगों को (यानी 78 फीसदी)  अनुसूचित जाति के ऊपर किसी किस्म का अत्याचार करने के मामले में चार्जशीट किया गया लेकिन इसमें सिर्फ 29 फीसदी यानी कुल 13871 लोगों पर ही(47136 में से जिन पर आरोप लगे) फैसला सुनाया जा सका।


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