Resource centre on India's rural distress
 
 

लॉकडाउन ने हाशिए पर रह रहे लोगों को बिल्कुल साधनहीन बना दिया है

हाल ही में किया गया सर्वेक्षण COVID-19 लॉकडाउन की घोषणा के लगभग 45 दिनों के बाद श्रमिकों की अनिश्चित स्थितियों का खुलासा करता है. इस सर्वे में दिल्ली-एनसीआर, उत्तर प्रदेश, बिहार, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, असम, राजस्थान और झारखंड राज्यों के 1,405 प्रवासियों से टेलीफोनिक साक्षात्कार के माध्यम से बातचीत कर अनिश्चित स्थितियों का आकलन किया गया था. 

लेबरिंग लाइव्स: हंगर, प्रीकरिटी एंड डेसपेयर एमिड लॉकडाउन’ नामक इस रिपोर्ट में लॉकडाउन के 45 दिन पूरे होने के बाद नौकरी छूटने और पैदा हुई भुखमरी की समस्या (गहराई से) को समझने की कोशिश की गई है.

भूख और खाद्य असुरक्षा

25 मई से 10 जून, 2020 के बीच सेंटर फॉर इक्विटी स्टडीज ने दिल्ली रिसर्च ग्रुप और कारवां-ए-मोहब्बत के साथ मिलकर सर्वे किया, जिसमें पाया कि उत्तरदाताओं में लगभग हर पांचवा उत्तरदाता यानी 20.5 प्रतिशत (1,405 में से 288) उत्तरदाताओं को इस लॉकडाउन अवधि के दौरान 4-7 दिनों के लिए भोजन नहीं था, जबकि उत्तरदाताओं में लगभग हर दसवां यानी 10.40 प्रतिशत (1,405 में से 150) उत्तरदाताओं के पास 7 दिनों से अधिक समय तक भोजन नहीं था, जिसकी वजह से उन्हें भयानक भुखमरी की स्थिति का सामना करना पड़ा. कृपया तालिका -1 देखें.

तालिका 1: लॉकडाउन के दौरान भुखमरी की घटनाएं

स्रोत: ‘लेबरिंग लाइव्स: हंगर, प्रीकरिटी और डेसपेयर एमिड लॉकडाउन’, एक्सेस करने के लिए कृपया यहां क्लिक करें.

---

उत्तरदाताओं में लगभग एक तिहाई यानी 29.9 प्रतिशत (1,405 में से 420) उत्तरदाताओं को कभी-कभार भोजन नहीं मिल सका. अगर कम शब्दों में कहें, तो उनके पास बीच-बीच में 1-2 दिनों के लिए भोजन नहीं बचा था. इसके अलावा, उत्तरदाताओं में लगभग 38.9 प्रतिशत (1,405 में से 547) उत्तरदाताओं को इस लॉकडाउन अवधि के दौरान पूरी तरह से खाद्य सामग्री की तंगी का सामना नहीं करना पड़ा.

एक सच यह भी है कि जिन लोगों को भोजन के पूरी खत्म हो जाने जैसी समस्या का सामना नहीं करना पड़ा, दरअसल, उन्होंने भोजन का सेवन कम कर दिया था और वे अक्सर एक दिन में सिर्फ एक बार ही भोजन खा कर रहे थे. उत्तरदाताओं में से लगभग एक-पांचवा यानी 21.8 प्रतिशत (547 में से 119) उत्तरदाता इस तरह दिन में सिर्फ एक बार भोजन खाकर भुखमरी से लड़ रहे थे, जबकि 49.5 प्रतिशत (547 में से लगभग 271) ने अपने दैनिक भोजन सेवन को कम कर लिया था. इन 547 उत्तरदाताओं (यानी 5.1 प्रतिशत) में से कम से कम 28 ने बताया कि वे यानी माता-पिता अपने बच्चों को खाना खिलाने के लिए खुद कुछ भी नहीं खा रहे थे.

स्रोत: ‘लेबरिंग लाइव्स: हंगर, प्रीकरिटी और डेसपेयर एमिड लॉकडाउन’, एक्सेस करने के लिए कृपया यहां क्लिक करें.

--
इस रिपोर्ट में पाया गया कि जिन उत्तरदाताओं को 7 दिन या उससे अधिक समय के लिए भयावह भुखमरी का सामना करना पड़ा, उनमें ओबीसी (अन्य पिछड़ा वर्ग) / एससी (अनुसूचित जाति) / एसटी (अनुसूचित जनजाति) या मुस्लिम पृष्ठभूमि के उत्तरदाता ज्यादा बड़ी संख्या में थे और उनकी तुलना में तथाकथित 'फॉरवर्ड-कास्ट' हिंदू अपेक्षाकृत बेहतर स्थिति में थे. 4-7 दिनों तक लगातार भूखे रहने वाले उत्तरदाताओं में भी तथाकथित ‘फॉरवर्ड-कास्ट हिंदुओं’ का अनुपात काफी कम था. कृपया चार्ट -1 देखें.

गैर-प्रवासियों के मुकाबले देसी-प्रदेशी प्रवासियों में भुखमरी की स्थिति ज्यादा बदतर थी. इस लॉकडाउन अवधि में भुखमरी के मामले में कोई ग्रामीण-शहरी अंतर नहीं था या बहुत कम अंतर था. नौकरी से निकाले जाने के मामले में भी एक समान पैटर्न देखा गया. इसका तात्पर्य यह है कि घरों / मूल स्थानों पर वापस लौटने वाले प्रवासियों को भी भूख और भुखमरी के मामले में उसी तरह की स्थितियों का सामना करना पड़ रहा है जोकि शहरों/शहरी क्षेत्रों में लोग कर रहे हैं.

रोजा लक्जमबर्ग स्टिफ्टंग द्वारा समर्थित यह रिपोर्ट बताती है कि खाद्य असुरक्षा और भुखमरी की स्थिति लॉकडाउन के शुरुआती दिनों की तुलना में बदतर हो गई है.

यह गौरतलब है कि सर्वेक्षण के लिए चुने गए नमूने में 1,405 उत्तरदाता थे, जिनसे अमन बिरादरी ट्रस्ट के कारवां-ए-मोहब्बत अभियान की राज्य राहत टीमें लॉकडाउन की शुरुआत के पहले महीने में उनके द्वारा शुरू किए गए राहत कार्यों के दौरान संपर्क में आई थीं. 

सामाजिक समर्थन और सामाजिक सुरक्षा

‘लेबरिंग लाइव्स: हंगर, प्रीकरिटी और डेसपेयर एमिड लॉकडाउन’ नामक इस रिपोर्ट में पाया गया है कि कई शहरों में पका हुआ भोजन वितरित किया गया था, लेकिन गरीब और मज़दूरों (अनौपचारिक श्रमिकों और प्रवासी श्रमिकों सहित) की लंबी कतारों, भीड़ और पुलिस और प्रशासन द्वारा उनके अनावश्यक उत्पीड़न के चलते उनको इसका लाभ मिल पाना मुश्किल हो गया. इस महामारी में अमीर और मध्यम वर्ग के लोगों ने पर्याप्त मात्रा से भी अधिक मात्रा में भोजन अपने घरों में भर लिया और वहीं दूसरी तरफ गरीब और मजदूरों को भयावह भुखमरी को सामना करना पड़ा, जबकि खाद्यान्न एफसीआई (भारतीय खाद्य निगम) के गोदामों में सड़ रहे थे.

भुखमरी से बचने के लिए, उत्तरदाता (यानी गरीब श्रमिकों) गैर-सरकारी संगठन (एनजीओ), सरकार द्वारा की गई पहल और धार्मिक व सामुदायिक संगठनों द्वारा वितरित किए गए पके हुए भोजन पर निर्भर थे. अधिकांश समय उत्तरदाताओं को लगा कि खाद्य आपूर्ति का काम सरकार कर रही है, जबकि असलियत में खाद्यान गैर-सरकारी संगठनों द्वारा वितरित किए जा रहे थे. इसलिए, रिपोर्ट के अनुसार, सरकार द्वारा खाद्य आपूर्ति का अनुपात और भी कम हो सकता है.

अधिकांश उत्तरदाताओं यानी 46 प्रतिशत (1,405 में से 646) को केवल एक स्रोत से खाद्यान प्राप्त हो सके, जबकि 26.3 प्रतिशत (1,405 में से 369) को दो स्रोतों से खाद्यान प्राप्त हुए.

सर्वेक्षण से पता चलता है कि सरकार द्वारा समर्थित खाद्यान वितरण व्यवस्था उत्तर प्रदेश, दिल्ली, हिमाचल प्रदेश, असम और हरियाणा में ठीक से काम नहीं कर रही थी. अगर एनजीओ और धार्मिक संगठन भोजन बांटने के लिए आगे नहीं आते, तो लॉकडाउन के इस दौर में अधिकतर श्रमिकों और गरीबों के लिए जीना दूभर हो जाता. गुणात्मक साक्षात्कार के आधार पर, रिपोर्ट में पाया गया कि मुसलमान जब भोजन और ऐसी अन्य राहत सेवाओं तक पहुंचने की कोशिश कर रहे थे तो पुलिस उन्हें लगातार धमका रही थी और उनका उत्पीड़न कर रही थी. रोहिंग्या शरणार्थी (उनमें से कुछ सर्वेक्षण में उत्तरदाता थे) जो अपने शिविरों से बाहर चले गए थे, उन्हें किसी भी स्रोत से मदद नहीं मिली थी, लेकिन जो लोग दिल्ली और हरियाणा में विभिन्न शिविरों में रह रहे थे, उन्हें एनजीओ से मदद मिल रही थी.

आपदा प्रबंधन अधिनियम 2005 का उपयोग ऐसे लोगों के लिए किया जाता है जो कर्फ्यू नियमों को तोड़ने वाले या सुरक्षित शारीरिक सुरक्षा नियमों का पालन नहीं करने वाले लोगों को दंडित करता है. किसी भी आपदा में कानून को बचाव, राहत, पुनर्वास और पुनर्निर्माण योजना के लिए उपयोग किया जाता है ताकि आपदा के जोखिम, प्रभाव या प्रभावों को कम किया गया जा सके, लेकिन रिपोर्ट में पाया गया कि महामारी के इस संकटकाल में कानून के प्रावधानों की उपेक्षा की गई थी.

जिन लोगों ने लॉकडाउन के दौरान पैसे उधार लिए थे, वे ज्यादातर दोस्तों और रिश्तेदारों (39.9 प्रतिशत) पर निर्भर थे, इसके बाद मनी लेंडर्स यानी महाजनों (7.1 प्रतिशत), स्थानीय दुकानों (6.3 प्रतिशत), ठेकेदार / नियोक्ता (2.1 प्रतिशत), और मकान मालिक (0.6 प्रतिशत) से पैसे उधार लिए थे.

सर्वेक्षण से पता चलता है कि उत्तरदाताओं में 78.8 प्रतिशत के पास (1,107) बैंक खाते थे, 87.3 प्रतिशत (1,226) के पास आधार कार्ड थे, 31.2 प्रतिशत (438) के पास राशन कार्ड थे, 11.9 प्रतिशत (167) के पास मनरेगा कार्ड और केवल 7.3 प्रतिशत (103) के पास श्रमिक कार्ड थे. अधिकांश उत्तरदाताओं के पास जिनके बैंक खाते थे, वे उनके कार्यस्थल तक नहीं जा सकते थे, लेकिन उनके मूल स्थान पर जा सकते थे. अधिकांश बैंक खाता धारकों के खाते निष्क्रिय थे. रिपोर्ट के अनुसार, लेबर कार्ड वाले निर्माण श्रमिकों का कम अनुपात बिल्डिंग एंड अदर कंस्ट्रक्शंस वर्कर्स एक्ट 1996 की विफलता को दर्शाता है.

राशन कार्डों की पोर्टेबिलिटी की कमी ने इस आपदा में फंसे प्रवासियों के लिए कठिनाइयों को बढ़ा दिया. कई उत्तरदाताओं के पास जिनके नाम राशन कार्ड में थे, वे भोजन सहायता का लाभ नहीं उठा सकते थे क्योंकि वे वर्तमान में अपने मूल निवास स्थान से दूर थे. नमूने में लगभग सभी उत्तरदाताओं (1,405 उत्तरदाताओं) की सामाजिक सुरक्षा तक कोई पहुंच नहीं थी, जो इंगित करता है कि श्रमिकों के लिए संस्थागत समर्थन केवल महामारी के समय ही नहीं बल्कि सामान्य परिस्थितियों में भी मौजूद नहीं है.

---

---

कम होती नौकरियां और बेरोजगारी

सर्वे में यह देखा गया कि नौकरियों की छटनी और रोजगारों में हुई कटौती से सभी प्रभावित हुए थे. उत्तरदाताओं में से लगभग 92.4 प्रतिशत (1,294 में से 1,294) को लॉकडाउन के दौरान काम नहीं मिल पा रहा था, उत्तरदाताओं में से 5 प्रतिशत (70401 में से 70 प्रतिशत) को कम वेतन पर काम करना पड़ रहा था और केवल 2.6 प्रतिशत (37 में से) 1,401) उत्तरदाताओं को नियमित वेतन पर काम मिला हुआ था.

नौकरी में कटौती ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों में प्रचलित दिखी. रिपोर्ट बताती है कि प्रवासी इस उम्मीद के साथ अपने गाँव / मूल स्थानों पर लौट आए कि उन्हें लॉकडाउन की अवधि के दौरान खुद को जिंदा रखने के लिए गांव में रोजगार के सीमित अवसर मिलेंगे, लेकिन सच्चाई यह है कि लॉकडाउन के दौरान, राज्य के प्रयाप्त समर्थन के बिना, गरीबों और मजदूर वर्गों के लिए किसी भी जगह जीवित रहना बेहद मुश्किल होगा.
29 मार्च, 2020 को, सभी नियोक्ताओं / ठेकेदारों के लिए सरकारी निर्देश जारी किए गए थे कि किसी भी कर्मचारी को उनके रोजगार से बर्खास्त नहीं किया जाए, लेकिन यह पूरी तरह से विफल रहा. तालाबंदी की घोषणा के बाद से ही बेरोजगारी में व्यापक बढ़ोतरी हुई. सर्वेक्षण में पाया गया कि एक ठेकेदार के तहत काम करने वालों में से लगभग 90 प्रतिशत को लॉकडाउन की अवधि के दौरान कोई भुगतान नहीं किया गया था. एक ठेकेदार के तहत काम नहीं करने वालों के मामले में यह आंकड़ा 94 प्रतिशत हो गया.

कृषि और गैर-कृषि दोनों कार्यों की उपलब्धता के कारण अर्ध-शहरी क्षेत्रों में रोजगार के बेहतर अवसर उपलब्ध थे, हालांकि लॉकडाउन से पहले की दरों की तुलना में कम मजदूरी पर लोगों का काम मिला.

अंतर-राज्य प्रवासियों के हालात राज्य के भीतर ही पलायन करने वाले प्रवासियों से बदतर थे. रिपोर्ट में पाया गया है कि भविष्य में काम मिलने को लेकर बनी अनिश्चितता की धारणा महिलाओं और अंतर-राज्य प्रवासियों में सबसे अधिक थी, और मुस्लिम श्रमिकों में नौकरी छूटने की निश्चितता सबसे अधिक थी. काम के दौरान अनिश्चितताओं ने श्रमिकों में मानसिक तनाव पैदा किया है. तब्लीगी जमात मुद्दे के संदर्भ में मुस्लिम श्रमिकों के खिलाफ हुए भेदभाव की आपबीती भी साक्षात्कारों के दौरान मुस्लिम उत्तरदाताओं ने सुनाई. भेदभाव के परिणामस्वरूप मुस्लिम श्रमिकों का एक बड़ा हिस्सा यह माने बैठा था कि लॉकडाउन के बाद उनकी नौकरी छूट जाएगी. नियमित, वेतनभोगी श्रमिकों के बीच नौकरी के भविष्य के बारे में अनिश्चितता कम थी.

लगभग 43 प्रतिशत उत्तरदाता लॉकडाउन के बाद अपनी नौकरी की संभावनाओं के बारे में अनिश्चित थे. लगभग 10 प्रतिशत उत्तरदाता तो वास्तव में यह तक माने बैठे थे कि उन्हें अपनी पुरानी नौकरी वापस नहीं मिलेगी. भविष्य में नौकरियों के बारे में अनिश्चितता महिलाओं, ओबीसी और अंतर-राज्य प्रवासियों में अधिक थी.

ओबीसी / एससी / एसटी और मुसलमानों की तुलना में, तथाकथित 'फॉरवर्ड-कास्ट' हिंदुओं (और इस समूह के ज्यादातर पुरुष) का एक उच्च अनुपात लॉकडाउन के बाद अपने काम को वापस पाने के बारे में निश्चित था.
रिपोर्ट के अनुसार, पुरानी नौकरी पर वापस जाने की अनिश्चितता शहरी क्षेत्रों में सबसे अधिक थी. अर्ध-शहरी क्षेत्रों में समान नौकरी वापस पाने की निश्चितता सबसे अधिक थी. हालांकि, हर किसी की सहज सोच के विपरीत, काम खोने की निश्चितता ग्रामीण क्षेत्रों में सबसे अधिक थी. इसलिए, सरकार को ग्रामीण भारत पर तत्काल ध्यान देना चाहिए क्योंकि वापस लौटे प्रवासी अनिश्चिताओं के बोझ तले दबे हुए हैं.

क्या करना चाहिए?

भुखमरी का मुकाबला करने और आजीविका सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए, ‘लेबरिंग लाइव्स: हंगर, प्रीकरिटी और डेसपेयर एमिड लॉकडाउन’ नामक इस रिपोर्ट में पाठकों से उन सिफारिशों को पढ़ने के लिए कहा है, जो प्रोफेसर प्रभात पटनायक, प्रोफेसर जयति घोष और हर्ष मंदर द्वारा इस जर्जर अर्थव्यवस्था को पुनर्जीवित करने की योजना के लिए संयुक्त रूप से, दिनांक 14 मई, 2020 को द हिंदू अखबार में प्रकाशित हुए अपने लेख में प्रस्तावित की गई थीं. इसके अलावा, उस लेख में लेखकों ने सरकार से सार्वजनिक वितरण प्रणाली (पीडीएस) का सार्वभौमिकरण करने और उसका विस्तार करने और वैधानिक न्यूनतम मजदूरी के तौर पर तीन महीने की अवधि के लिए प्रत्येक भारतीय परिवार को प्रति माह 7,000 रुपये नकद हस्तांतरण करने का सुझाव दिया है. लेखकों ने सरकार से मनरेगा को फिर से शुरू करने की सिफारिश की, ताकि उन प्रवासी श्रमिकों को समायोजित किया जा सके, जो तालाबंदी के दौरान अपने गांवों में वापस लौटे हैं.

References

Labouring Lives: Hunger Precarity and Despair amid Lockdown, A Report by Centre for Equity Studies in collaboration with Delhi Research Group and Karwan-e-Mohabbat, Supported by Rosa Luxemburg Stiftung, released in June 2020, please click here to access

Labouring Lives: Hunger, Precarity And Despair Amid Lockdown --Karwan-e-Mohabbat, 19 June, 2020, please click here to access the Youtube video

Job loss certainty highest among villagers & Muslims -Pheroze L Vincent, The Telegraph, 22 June, 2020, please click here to access

Communities remain hungry amid lockdown, migrant workers worst hit: Study -Ritwika Mitra, The New Indian Express, 20 June, 2020, please click here to access

A plan to revive a broken economy -Harsh Mander, Jayati Ghosh and Prabhat Patnaik, The Hindu, 14 May, 2020, please click here to access

Covid-19 crisis calls for universal delivery of food and cash transfers by the state -Jayati Ghosh, Prabhat Patnaik and Harsh Mander, The Indian Express, 27 April, 2020, please click here to access

 

Image Courtesy: Labouring Lives: Hunger Precarity and Despair amid Lockdown