एक्शनएड सर्वे:  लॉकडाउन लागू होने के बाद तीन-चौथाई से अधिक श्रमिक अपनी आजीविका से हाथ धो बैठे

एक्शनएड सर्वे: लॉकडाउन लागू होने के बाद तीन-चौथाई से अधिक श्रमिक अपनी आजीविका से हाथ धो बैठे

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published Published on Sep 5, 2020   modified Modified on Sep 5, 2020

एक्शनएड एसोसिएशन (एएए) द्वारा मई 2020 के आखिर तक तीसरे चरण के लॉकडाउन में राष्ट्रीय स्तर पर अनौपचारिक अर्थव्यवस्था पर निर्भर श्रमिकों के बीच सर्वेक्षण (14 मई और 22 मई, 2020 के बीच) किया है, जिसमें महामारी के दौरान प्रवासी श्रमिकों सहित अनौपचारिक श्रमिकों के जीवन और आजीविका में आए बदलावों और प्रभावों, उनके द्वारा अनुभव की गई रोजी-रोटी की अनिश्चितता और उससे निपटने के लिए उनके संघर्षों को दर्ज किया गया है. इस महामारी के दौर में अनौपचारिक अर्थव्यवस्था पर निर्भर श्रमिकों पर किए सर्वेक्षण-आधारित अध्ययन के पहले राउंड से पता चलता है कि 11,537 उत्तरदाताओं में से तीन-चौथाई से अधिक श्रमिकों ने लॉकडाउन लागू होने के बाद अपनी आजीविका खो दी थी.

रिपोर्ट में, यह उल्लेख किया गया है कि एक्शनएड इंडिया इन अनौपचारिक श्रमिकों के एक ही नमूने को ट्रैक करते हुए उनकी आय, संपत्ति स्वामित्व, कर्ज और बचत, रहने और काम करने की स्थिति, श्रम संबंध, पलायन की प्रकृति, एंटाइटेलमेंट तक पहुँच और समय के साथ सामाजिक सुरक्षा जैसे पहलुओं को दर्ज करने के लिए कई राउंड में सर्वेक्षण करेगा.

इसके अलावा, एक्शनएड इंडिया की रिपोर्ट बताती है कि उत्तरदाताओं में लगभग आधे लोगों को लॉकडाउन लागू होने के बाद कोई कमाई नहीं हुई थी और लगभग 17 प्रतिशत को केवल आंशिक वेतन मिला था. यह भी गौरतलब है कि 29 मार्च, 2020 को, सरकार ने सभी नियोक्ताओं/ठेकेदारों को निर्देश जारी किए गए थे कि किसी भी कर्मचारी को उनके रोजगार से बर्खास्त नहीं किया जाए. लेकिन यह फरमान बुरी तरह असफल साबित हुआ. अपने लेख में, गौतम भाटिया ने भी जिक्र किया है कि कैसे भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने कोविड-19 लॉकडाउन लागू होने के बाद स्पष्ट रूप से ऐसा किए बिना आदेशों की एक ऐसी श्रृंखला पारित की थी, जो वास्तव में नियोक्ताओं/ठेकेदारों के पक्ष में और श्रमिक वर्गों के खिलाफ थी.

एक्शनएड इंडिया द्वारा सर्वेक्षण के पहले दौर में पाया गया है कि उत्तरदाताओं में आधे से अधिक (यानी 53 प्रतिशत) ने लॉकडाउन के दौरान अतिरिक्त कर्ज लिया था. आधे से अधिक उत्तरदाता, जो प्रवासी थे, एक महीने से अधिक समय से फंसे रहे. लॉकडाउन ने लोगों की आवश्यक सेवाओं तक पहुंच को प्रतिकूल रूप से प्रभावित किया. हालांकि 83 प्रतिशत उत्तरदाताओं ने माना कि लॉकडाउन लागू करने से पहले उनके पास 'पर्याप्त' भोजन था, लेकिन लॉकडाउन के बाद उनमें से केवल 15 फीसदी श्रमिकों को पर्याप्त भोजन मिला. एक्शनएड इंडिया सर्वेक्षण के पहले दौर में भोजन तक श्रमिकों की पहुंच में गिरावट देखी गई. लॉकडाउन लागू होने से पहले, 93 प्रतिशत उत्तरदाता एक दिन में दो बार भोजन खा रहे थे. लेकिन लॉकडाउन लगाए जाने के बाद, यह पाया गया कि केवल 63 प्रतिशत उत्तरदाता एक दिन में दो बार भोजन खा रहे थे. इतना ही नहीं, लॉकडाउन के कारण स्वास्थ्य सेवा तक पहुंच भी प्रभावित हुई है. सर्वेक्षण में उत्तरदाताओं में तीन-चौथाई ने बताया कि वे लॉकडाउन के दौरान जरूरत पड़ने पर स्वास्थ्य सेवा का लाभ नहीं उठा पाए.

एक्शनएड इंडिया ने अपने सर्वेक्षण में 20 राज्यों और एक केंद्र शासित प्रदेश (यूटी) में 270 से अधिक भागीदारों और स्वयंसेवकों के नेटवर्क के माध्यम से 11,530 से अधिक श्रमिकों का साक्षात्कार लिया. सर्वेक्षण के पहले दौर में 293 प्रवासित जिले और 393 गृह जिले शामिल थे. सर्वेक्षण में शामिल राज्यों/यूटी में राजस्थान, गुजरात, ओडिशा, दिल्ली, हरियाणा, पंजाब, हिमाचल प्रदेश, बिहार, झारखंड, महाराष्ट्र, गोवा, उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, मध्य प्रदेश, कर्नाटक, तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, पश्चिम बंगाल शामिल थे. सर्वेक्षण में दिए गए उत्तरदाताओं में से 72 प्रतिशत पुरुष थे, 28 प्रतिशत महिलाएं थीं, और 0.01 प्रतिशत थर्ड जेंडर से संबंधित थे. नमूने में दो-तिहाई उत्तरदाता ग्रामीण क्षेत्रों में थे, जबकि एक-तिहाई शहरी क्षेत्रों में थे. लगभग दो-तिहाई उत्तरदाता रोजगार की तलाश में पलायन करने वाले प्रवासी मजदूर थे, जबकि एक-तिहाई उत्तरदाताओं ने स्थानीय श्रमिक होने की सूचना दी. फोन साक्षात्कार के अलावा, एक्शनएड इंडिया और उसके साथी राहत कार्य कर रहे थे तो कुछ उत्तरदाताओं का साक्षात्कार आमने-सामने भी लिया गया था.

एक्शनएड इंडिया द्वारा जारी की गई वर्कर्स इन टाइम्स ऑफ कोविड ​​-19 (पहले दौर) नामक रिपोर्ट के मुख्य निष्कर्ष इस प्रकार हैं:

आजीविका और दिहाड़ी का व्यापक नुकसान: 78 प्रतिशत से अधिक उत्तरदाताओं ने आजीविका के नुकसान की सूचना दी और रोजगार में बहुत ज्यादा कमी आई. लॉकडाउन से पहले, अधिकतर उत्तरदाता सप्ताह में 40 घंटे से ऊपर काम किया, और सभी क्षेत्रों (कृषि, निर्माण, निर्माण और सेवा) में एक तिहाई श्रमिकों ने सप्ताह में 50 घंटे काम किया. लॉकडाउन लगाए जाने के बाद, दो-तिहाई से अधिक उत्तरदाताओं ने सप्ताह में शून्य घंटे काम करने की सूचना दी यानी उन्हें कोई काम नहीं मिला. लॉकडाउन के बाद 48 प्रतिशत से अधिक उत्तरदाताओं को कोई वेतन नहीं मिला और 17 प्रतिशत को आंशिक वेतन मिला.

पलायन पैटर्न में विषमता: लगभग 57 प्रतिशत उत्तरदाताओं ने कहा कि वे वर्ष में एक बार पलायन करते हैं और 43 प्रतिशत वर्ष में कई बार पलायन करते हैं. साल में केवल एक बार पलायन करने वाले श्रमिक ज्यादातर एक शहर में पलायन करते हैं, जबकि साल में कई बार पलायन करने वाले श्रमिक कई शहरों और कस्बों में काम की संभावनाएं तलाशते हैं. यह कार्यकर्ता के रोजगार स्थिरता और सामाजिक नेटवर्क को विकसित करने की क्षमता का परिणाम है. लगभग 44 प्रतिशत श्रमिक अपने परिवार के साथ पलायन करते हैं, जोकि आश्रितों की संख्या अधिक होने के कारण गंतव्य राज्य में उनके जोखिमों को बढ़ाता है. इसके विपरीत, यह तथ्य कि 56 प्रतिशत प्रवासी परिवार के साथ पलायन नहीं करते हैं, जोकि उनके रहने और काम करने की स्थिति और उनकी बचत को अधिकतम करने की इच्छा का संकेत है.

सामाजिक स्तरीकरण की दृढ़ता: उत्तरदाता अनौपचारिक श्रमिकों में, लगभग 63 प्रतिशत ने रोजगार के लिए पलायन किया है. सभी उत्तरदाताओं की सामाजिक संरचना से पता चलता है कि उनमें से 15 प्रतिशत अनुसूचित जनजातियों के हैं और 39 प्रतिशत अनुसूचित जाति के हैं जो देश की जनसंख्या की संरचना में उनके अनुपात से अधिक है. इसलिए, श्रम बाजार विभाजन हाशिए के समुदायों को कम मजदूरी और कम उत्पादकता वाले क्षेत्रों में मजदूरी करने के लिए मजबूर करता है और हाशिए के समुदायों की बेहतरी की संभावनाओं को खत्म करता है.

आवास की बदत्तर स्थिति: उत्तरदाताओं में केवल 13 प्रतिशत श्रमिकों ने बताया कि उनके पास एक किराए का एग्रीमेंट है, और केवल 8 प्रतिशत के पास पट्टा है. अधिकांश प्रवासी श्रमिक किराए के आवास (55 प्रतिशत) में रहते हैं, जबकि केवल 9 प्रतिशत को उनके नियोक्ता द्वारा आवास दिया गया और 8 प्रतिशत किसी न किसी तरह के सामुदायिक आवास में रहते थे. अधिकांश श्रमिक 6 से 10 लोगों के साथ रहते थे और एक शौचालय और एक कमरा साझा करते थे. यह घनत्व एक प्रमुख स्वास्थ्य चिंता है. लगभग 60 प्रतिशत प्रवासियों ने कहा कि उन्हें लॉकडाउन के बाद अपना आवास खाली करना होगा. आजीविका (44 प्रतिशत) की हानि, किराए का भुगतान करने में असमर्थता (19 प्रतिशत), कारखानों को बंद करने (18 प्रतिशत) और मकान मालिकों या नियोक्ताओं द्वारा निष्कासन (5 प्रतिशत) के कारण उन्हें अपना आवास खाली करने के लिए मजबूर होना पड़ा.

कम बचत और अधिक कर्ज: लॉकडाउन से पहले ही उत्तरदाताओं के 55 प्रतिशत बकाया ऋण पहले से थे जो लॉकडाउन के दौरान और बढ़ गए. उनमें से 83 प्रतिशत ने अपनी स्थिति की अनिश्चितता के कारण लॉकडाउन के बाद अपनी आजीविका खो दी. लगभग 60 प्रतिशत उत्तरदाताओं ने लॉकडाउन के दौरान परिवार की आपात स्थिति और स्वास्थ्य सेवा जैसे खर्चों और जीवन की रोजमर्रा लागत को पूरा करने के लिए पैसे उधार लिए. 95 प्रतिशत उत्तरदाताओं ने कहा कि उनकी बचत पर्याप्त नहीं है.

खपत में कमी: लॉकडाउन के दौरान भोजन और पानी की असुरक्षा दो प्रमुख समस्याओं के रूप में सामने आई. केवल 18.5 प्रतिशत उत्तरदाताओं ने कहा कि उनके पास भोजन पर्याप्त था. जबकि 63 प्रतिशत उत्तरदाता दिन में दो बार भोजन कर रहे थे, 34 प्रतिशत ने कहा कि वे दिन में केवल एक बार भोजन कर सकते हैं और 3 प्रतिशत ने दो दिनों में केवल एक बार भोजन करने की सूचना दी है. लगभग 38 प्रतिशत उत्तरदाताओं ने कहा कि पानी तक उनकी पहुंच अपर्याप्त थी.

सहायता का अभाव: ज्यादातर उत्तरदाताओं को लॉकडाउन के दौरान किसी भी स्रोत से कोई नकद, परिवहन, भोजन या आश्रय सहायता नहीं मिली. लगभग 79 प्रतिशत को कोई नकद सहायता नहीं मिली, 44 प्रतिशत को कोई खाद्य सहायता नहीं मिली और 85 प्रतिशत को कोई आश्रय सहायता नहीं मिली. 50 प्रतिशत से अधिक प्रवासियों ने बताया कि वे एक महीने से फंसे हुए थे, और 70 प्रतिशत से अधिक प्रवासियों ने कहा कि उन्हें कोई परिवहन सहायता नहीं मिली है.

सहायता के विविध स्रोत: सभी स्रोतों में, सरकार प्रत्येक श्रेणी (भोजन, आश्रय, नकद, परिवहन) में सहायता का सबसे बड़ा प्रदाता था. हालांकि, सरकारी सहायता से यदि कोई गैर-सरकारी स्रोतों से सहायता प्राप्त करने वाले श्रमिकों के समग्र प्रतिशत की तुलना करता है, जिसमें गैर-सरकारी संगठनों, स्वयं सहायता समूहों, ट्रेड यूनियनों और नियोक्ताओं के साथ श्रमिकों का प्रतिशत शामिल है, तो गैर-सरकारी स्रोतों से सहायता प्राप्त करने वाले श्रमिकों का प्रतिशत अधिक है. ग्रामीण क्षेत्रों की तुलना में गैर-सरकारी संगठनों की शहरी क्षेत्रों में बहुत अधिक पैठ थी.

श्रम कानून में अनौपचारिक श्रमिकों की अनदेखी: सर्वेक्षण में पाया कि 90 प्रतिशत उत्तरदाताओं के पास रोजगार अनुबंध नहीं था, जो किसी भी श्रम कानूनों को लागू करने के लिए बेहद मुश्किल बनाता है. कानूनी मान्यता की यह कमी लाखों श्रमिकों को उनके अधिकारों और अधिकारों से वंचित करती है.

कल्याणकारी योजनाओं की पात्रता: अंत्योदय अन्न योजना (27 प्रतिशत), पीएम किसान समृद्धि (5 प्रतिशत), आईसीडीएस (7 प्रतिशत), जन धन योजना (23 प्रतिशत), उज्ज्वला योजना (23 प्रतिशत), और पेंशन योजना (6 प्रतिशत) जैसी योजनाओं में बहुत कम श्रमिकों ने नामांकन किया था. सरकारी राशन यानी पीडीएस में सबसे अधिक (53 प्रतिशत) श्रमिकों ने नामांकन किया था. लाभार्थियों के लिए योजनाओं तक पहुंच काफी विविधता थी. जबकि 52 प्रतिशत उत्तरदाता पीडीएस का उपयोग करने में सक्षम थे, 50 प्रतिशत अंत्योदय अन्न योजना का लाभ ले सकते थे, 52 प्रतिशत लोग पीएम किसान योजना का लाभ लेने में सक्षम थे, लगभग 24 प्रतिशत आईसीडीएस का लाभ लेने में सक्षम थे, 60 प्रतिशत जन धन योजना का उपयोग करने में सक्षम थे, 70 प्रतिशत लोग उज्ज्वला योजना का उपयोग करने में सक्षम थे, और लगभग 58 प्रतिशत पेंशन योजना का उपयोग करने में सक्षम थे.

स्वास्थ्य सेवा की कमी: केवल 28 प्रतिशत श्रमिक ही लॉकडाउन के दौरान सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवा का लाभ ले पाए. ग्रामीण क्षेत्रों में सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवा तक पहुँच थोड़ी अधिक थी. स्वास्थ्य सेवा का उपयोग करने में असमर्थ होने के प्रमुख कारणों में लॉकडाउन, परिवहन की अनुपलब्धता, अस्पताल से दूरी, ओपीडी बंद करना और बिना COVID-19 परीक्षण प्रमाण पत्र के लोगों का इलाज करने से मना करना शामिल है.

भविष्य के लिए मिश्रित धारणाएं: काम के लिए पलायन करने वाले 56 प्रतिशत से अधिक लोगों ने कहा कि वे आर्थिक गतिविधि शुरू होने पर अपने गंतव्य राज्य में वापस जाना चाहते हैं, जबकि 44 प्रतिशत लोग अपने स्रोत जिले में बने रहना चाहते हैं. अधिकांश का मानना ​​है कि उनके क्षेत्रों की सही से भरपाई लंबे समय बाद होगी, लेकिन उन्हें उम्मीद है उनकी अपनी आजीविका जल्द ही ठीक हो जाएगी.

 

References:

Workers in the Times of COVID-19, Round-I of the National Study of Informal Workers, ActionAid Association (India), please click here to access

Over three-fourth of workers lost livelihoods since lockdown, finds a national survey of informal workers conducted by ActionAid India, Press release by ActionAid India dated 13th August, 2020, please click here to access

How the Supreme Court let down poor workers during the pandemic -Gautam Bhatia, Hindustan Times, 17 August, 2020, please click here to access

 

Image Courtesy: ActionAid India



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