ग्रामीण क्षेत्रों में विभिन्न योजनाओं और कार्यक्रमों को ठीक से लागू करने के लिए सरकारी कर्मचारी कहां हैं?

ग्रामीण क्षेत्रों में विभिन्न योजनाओं और कार्यक्रमों को ठीक से लागू करने के लिए सरकारी कर्मचारी कहां हैं?

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published Published on Aug 25, 2020   modified Modified on Aug 26, 2020

केंद्र सरकार द्वारा हर साल अपने वार्षिक बजट में ग्रामीण और कृषि क्षेत्रों के लिए भारी रकम आवंटित की जाती है. लेकिन ग्रामीण क्षेत्रों में पर्याप्त संख्या में अधिकारी नहीं होते हैं, तो क्या अधिकारियों की कमी के चलते सरकार की विभिन्न योजनाओं और कार्यक्रमों को ठीक से लागू किया जा सकता है? यदि हम इस मुद्दे के बारे में गहराई से सोचें तो हमें जवाब तो आसानी से मिल जाएगा, लेकिन करदाताओं के तौर पर वह हमें परेशान करने वाला होगा.

आइए पहले एक नजर बजटीय आवंटन के आंकड़ों पर डालते हैं. ग्रामीण विकास पर केंद्र सरकार का खर्च साल 2019-20 (R.E.) में 1,43,409 करोड़ रुपये से बढ़कर साल 2020-21 (B.E.) में 1,44,817 करोड़ रुपये हो गया था. यह भी गौरतलब है कि कि ग्रामीण विकास के लिए साल 2019-20 (B.E.) में बजटीय आवंटन 1,40,762 करोड़ रुपये था. इसलिनिए, कुल बजटीय खर्च के अनुपात के रूप में ग्रामीण विकास पर बजटीय आवंटन 2019-20 (B.E.) में 5.1 प्रतिशत था, जो 2020-21 (B.E.) में कम होकर 4.8 प्रतिशत हो गया. फिर भी ग्रामीण विकास के लिए आवंटित राशि निरपेक्ष रूप से काफी बड़ी है.

अब, ऐसे में यह जानना भी जरूरी है कि कृषि और संबंधित गतिविधियों पर केंद्र सरकार कैसे खर्च करती रही है. बजट दस्तावेजों से पता चलता है कि केंद्र सरकार का कृषि और संबंधित गतिविधियों पर खर्च साल 2019-20 (R.E.) में 1,20,835 करोड़ रुपये से बढ़कर 2020-21 (B.E.) में 1,54,775 करोड़ रुपये हो गया था. कृषि और संबंधित गतिविधियों पर बजटीय आवंटन साल 2019-20 (B.E.) में 1,51,518 करोड़ रुपये था. इसलिए, कुल बजटीय खर्च के अनुपात के रूप में कृषि और संबंधित गतिविधियों पर बजटीय आवंटन 2019-20 (B.E.) में 5.4 प्रतिशत था, जो 2020-21 (B.E.) में गिरकर 5.1 प्रतिशत हो गया.

साल 2020-21  में कृषि और संबंधित गतिविधियों और ग्रामीण विकास के कुल बजटीय आवंटन को जोड़ने के बाद यह पूरे केंद्रीय बजट के खर्च का लगभग दसवां हिस्सा था, बावजूद इसके, पिछले वर्ष इन दोनों क्षेत्रों (कुल बजट के सापेक्ष) में बजटीय आवंटन में कटौती की गई थी.

अब, हम देश में सरकारी नौकरियों (सामान्य नियमित कर्मचारियों) की स्थिति पर भी एक नजर डालते हैं. कृषि और किसान कल्याण मंत्रालय के अंतर्गत 3 अलग-अलग विभाग हैं, अर्थात् (1)कृषि अनुसंधान और शिक्षा विभाग, (2)कृषि, सहकारिता और किसान कल्याण विभाग और (3)पशुपालन, डेयरी और मत्स्य पालन विभाग. कृषि मंत्रालय के स्तर पर सभी 3 विभागों में स्वीकृत पदों और खाली पदों को भरने से संबंधित आंकड़े 2014, 2015, 2016 और 2018 में क्रमशः एक साथ जोड़े गए हैं. यहां यह गौरतलब है कि कृषि और किसान कल्याण मंत्रालय के तहत मत्स्य, पशुपालन और डेयरी मंत्रालय का गठन मई 2019 को इसी नाम के विभाग से किया गया है.

ग्रामीण विकास मंत्रालय के तहत, 2 अलग-अलग विभाग हैं, अर्थात् भूमि संसाधन विभाग और ग्रामीण विकास विभाग. ग्रामीण विकास मंत्रालय स्तर के आंकड़ों को जानने के लिए स्वीकृत पदों और सभी 2 विभागों में भरे गए पदों से संबंधित आंकड़े 2014, 2015, 2016 और 2018 में एक साथ जोड़े गए हैं.

कृपया ध्यान दें कि अन्य मंत्रालय और विभाग भी हैं जो ग्रामीण विकास मंत्रालय और कृषि और किसान कल्याण मंत्रालय के अलावा ग्रामीण और कृषि क्षेत्रों की सेवा करते हैं. हालांकि, ग्रामीण और कृषि क्षेत्रों में सरकारी नौकरियों की स्थिति के बारे में सांकेतिक परिणाम प्राप्त करने के लिए, हमने अपने विश्लेषण में इन दो मंत्रालयों पर विचार किया है.

तालिका 1: समूह-वार और स्थिति-वार (गजेटेड और नॉन गजेटेड) केंद्र सरकार के सामान्य नियमित कर्मचारियों की अनुमानित संख्या

स्रोत: लोकसभा में प्रश्न संख्या 1497का उत्तर (27 नवंबर, 2019 को उत्तर दिया जाएगा), कार्मिक और प्रशिक्षण विभाग, कार्मिक, लोक शिकायत और पेंशन मंत्रालय, कृपया यहां क्लिक करें.

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नवीनतम उपलब्ध आंकड़ों से पता चलता है कि 1 मार्च, 2018 को ग्रामीण विकास मंत्रालय में केंद्र सरकार के सामान्य नियमित कर्मचारियों (गजेटेड और नॉन गजेटेड) के लिए स्वीकृत पदों के अनुपात में रिक्त पद 27.47 प्रतिशत थे. इसी तरह, कृषि और किसान कल्याण मंत्रालय में केंद्रीय सरकार के सामान्य नियमित कर्मचारियों (गजेटेड और नॉन गजेटेड) के लिए स्वीकृत पदों के अनुपात में रिक्त पद 35.31 प्रतिशत थे. कृपया तालिका -1 देखें।

समग्र रूप से देखें तो, 1 मार्च, 2018 को केंद्र सरकार के सामान्य नियमित कर्मचारियों (गजेटेड और नॉन गजेटेड) के लिए स्वीकृत पदों के अनुपात में रिक्त पद लगभग 18 प्रतिशत थे.

इस प्रकार, यह स्पष्ट हो जाता है कि जमीन पर सरकारी कर्मचारियों की कमी के कारण, ग्रामीण और कृषि क्षेत्रों के लिए कई महत्वपूर्ण योजनाएं और कार्यक्रम प्रभावी रूप से लागू नहीं हो पाती हैं. हालांकि कृषि एक राज्य का विषय है, लेकिन अपनी अनिश्चित वित्तीय हालत देखते हुए ज्यादातर राज्यों ने स्थायी कर्मचारियों की भर्ती को रोक दिया है.

क्या यह मंजर न्यूनतम सरकार, और उससे न्यूनतम शासन जैसा है?

आदित्य दासगुप्ता और देवेश कपूर द्वारा हाल ही में एक अकादमिक पत्र में कहा गया है कि नौकरशाहों को अक्सर उनकी लुट-घसोट की आदतों का हवाला देकर सरकारी योजनाओं और कार्यक्रमों के खराब कार्यान्वयन के लिए दोषी ठहराया जाता है. उनके लेख में जोर दिया गया है कि स्थानीय नौकरशाहों के पास अक्सर अपनी जिम्मेदारियों की तुलना में अपर्याप्त साधन होते हैं. जिन अधिकारियों के पास अपने कार्यक्षेत्र में कम संसाधन हैं, वे अक्सर ग्रामीण विकास कार्यक्रमों को प्रभावी ढंग से लागू करने में विफल रहते हैं क्योंकि वे प्रबंधकीय कार्यों को करने के लिए पर्याप्त समय और श्रम नहीं दे पाते हैं. नौकरशाहों पर काम के अधिक भार के चलते प्रबंधकीय जटिल कार्यक्रमों या योजनाओं को कार्यान्वित करना उनके लिए विशेष रूप से कठिन हो जाता है. प्रशासनिक इकाइयों को कम संसाधन आवंटित किए जाते हैं जहां कार्यान्वयन के लिए राजनीतिक जिम्मेदारी कम स्पष्ट है. राजनेता पर्याप्त रूप से स्थानीय राज्य क्षमता (जैसे स्टाफिंग, प्रशिक्षण, उपकरण, आदि) में निवेश नहीं करते हैं क्योंकि फर्मों जैसी आर्थिक सरचंनाओं के विपरीत, वे दक्षता तर्क से प्रेरित नहीं होते हैं. स्थानीय राज्य क्षमता बढ़ाने में निवेश करने में नेताओं के चुनावी फायदे धुंधले और अनिश्चित हैं. इसके विपरीत, सत्ताधारी दलों के पास ग्रामीण क्षेत्रों में महत्वाकांक्षी नए कार्यक्रमों या योजनाओं की घोषणा के लिए ऋण लेने के लिए स्पष्ट प्रोत्साहन हैं.

दासगुप्ता और कपूर ने अपने पत्र में उल्लेख किया है कि “काम के अधिक बोझ के चलते नौकरशाही, अपनी समन्वित भूमिका पर ध्यान केंद्रित करने के बजाय अपना अधिक समय खामखा के मसलों में उलझे रहने और विभिन्न विशेष कार्यों पर खर्च करते हैं. उदाहरण के लिए, जब नौकरशाह अधिकारियों के पास पर्याप्त कार्मिकों की कमी होती है, तो कार्यक्रमों की योजना और क्रियान्वयन और विशिष्ट लेनदेन को प्रस्तुत करने, विशेष कर्मचारियों को नागरिकों के व्यक्तिगत मुद्दों को संबोधित करने जैसे कार्यों पर ध्यान देने के बजाय, नौकरशाह अधिकारियों को इन कार्यों पर पिच करना चाहिए. एक समान मुद्दा तब उभरता है जब पर्याप्त भौतिक संसाधन उपलब्ध नहीं होते हैं, उदाहरण के तौर पर, प्रबंधकीय कार्यों के अलावा दूसरे कार्यों के अत्यधिक बोझ के कारण श्रमिकों के बीच कार्य विभाजित करने के लिए थोड़े बहुत उपलब्ध भौतिक संसाधनों और उपकरणों का ही उपयोग करना पड़ता है."

यद्यपि स्थानीय राज्य क्षमता में निवेश जैसे अतिरिक्त कर्मचारी और उनके प्रशिक्षण और उपकरण सेवा वितरण की गति और गुणवत्ता में सुधार कर सामाजिक रूप से लाभकारी सुधार लाए जा सकते हैं, लेकिन ऐसे निवेश नहीं किए जाते हैं. ऐसा इसलिए होता है क्योंकि राजनेताओं को यह यकीन नहीं होता है कि इस तरह के निवेश से बेहतर चुनावी फायदे मिलेंगे. द ब्यूरो ऑफ पॉलिटिकल इकोनॉमी ऑफ़ ब्यूरोक्रेटिक ओवरलोड: एविडेंस फ्रॉम रूरल डेवलपमेंट ऑफिशियल्स इन इंडिया नामक शोध पत्र के लेखकों के मुताबिक, “जब नौकरशाह संसाधन कार्यान्वयन में सुधार करते हैं, तो मतदाताओं के लिए विशेष रूप से राजनेताओं और दलों को इस सुधार के लिए जिम्मेदार ठहराना थोड़ा मुश्किल है, खासकर क्योंकि कार्यान्वयन नौकरशाहों की क्षमता के साथ-साथ कई अन्य कारकों का एक बोझिल कार्य है. मतदाताओं के लिए नौकरशाही के संसाधनों में सुधार के लिए और प्राधिकरण के विकेंद्रीकरण के साथ बहु-स्तरीय सरकार के संदर्भों में जिम्मेदार पार्टी को क्रेडिट देना विशेष रूप से मुश्किल है, जहां प्रतिद्वंद्वी दल और राजनेता क्रेडिट लेने या एक-दूसरे पर आरोप लगाने (विभाजित एजेंसी) के लिए होड लगाए रहते हैं", 

प्रिंसिपल-एजेंट फ्रेमवर्क का उपयोग करते हुए, लेख बताता है कि चूंकि कई एजेंट (राजनेता) उत्पादन प्रक्रिया में शामिल हैं और प्रिंसिपल (यानी मतदाता) केवल एग्रीगेट आउटपुट का निरीक्षण कर सकते हैं. इसी वजह से व्यक्तिगत कार्रवाई (राजनेताओं के) के परिणामस्वरूप सत्तारूढ़ दल और राजनेता इसमें चुनावी फायदे नहीं ढूंढ पाते हैं और स्थानीय नौकरशाही में महंगा निवेश पहले चरण में ही सुस्त पड़ जाता है.

References:

Reply to the Unstarred Question no. 1497 in the Lok Sabha (to be answered on 27th November, 2019), Department of Personnel and Training, Ministry of Personnel, Public Grievances and Pensions, please click here to access

The Political Economy of Bureaucratic Overload: Evidence from Rural Development Officials in India -Aditya Dasgupta and Devesh Kapur (2020), American Political Science Review, page 1-19, https://doi.org/10.1017/S0003055420000477

Expenditure of Major Items 2020-21, Budget Documents, Ministry of Finance, please click here to access    

News alert: More than 4 lakhs posts in the Central govt. lying vacant, shows latest available data, Inclusive Media for Change, Published on Aug 7, 2018, please click here to access

Over 6.83 lakh vacant posts in central govt departments: Personnel Ministry, PTI/The Hindu, 05th February, 2020, please click here to access

 

Image Courtesy: Inclusive Media for Change/ Shambhu Ghatak



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