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अपराध बदल रहे हैं, पुलिस नहीं-- विभूति नारायण राय

एक महीने में उत्तर प्रदेश जैसे बडे़ राज्य में दो पुलिसकर्मियों की भीड़ द्वारा पीट-पीटकर हत्या भारतीय समाज में बढ़ रही हिंसा की प्रवृत्ति का द्योतक तो है ही, इसके पीछे कहीं न कहीं तंत्र की वह विफलता भी छिपी है, जो आधुनिक जरूरतों पर खरा उतरने में समर्थ पुलिस बल नहीं गढ़ पा रही। 20 से 25 वर्ष की आयु में समाज के विभिन्न तबकों से आने वाले युवक और युवतियां पुलिस बलों में अलग-अलग पदों पर भर्ती होते हैं और एक निश्चित प्रविधि के तहत उन्हें खाकी बनाया जाता है। यह प्रविधि, जिसे प्रशिक्षण कहा जाता है, ठोक-पीटकर इन्हें काफी हद तक एक सांचे में ढाल देती है। मगर क्या यह प्रक्रिया उन्हें आज के जटिल सामाजिक यथार्थ का सामना करने के काबिल बना पा रही है?


पुलिस तंत्र में सबसे अधिक उपेक्षित वह गतिविधि है, जिसे सर्वाधिक महत्व मिलना चाहिए। एक सैनिक कहावत है कि प्रशिक्षण में जितना अधिक पसीना बहता है, युद्ध में उतना ही कम खून बहाना पड़ता है। रोजमर्रा की गतिविधि में पुलिस को इतनी भिन्न परिस्थितियों से जूझना पड़ता है कि किसी तरह की इकहरी सिखलाई हमेशा उसके काम नहीं आ सकती। दुर्भाग्य से एक पुलिसकर्मी, जो बुनियादी ट्रेनिंग सेंटर में औसतन नौ महीने से साल-डेढ़ साल का प्रशिक्षण पाता है, अपने शेष तीन-चार दशकों के सेवाकाल में अपवाद स्वरूप ही किसी अन्य प्रशिक्षण का हिस्सा बनता है। दुनिया भर के पेशेवर पुलिस बल ऐसी व्यवस्था करते हैं कि उनके सदस्य पांच वर्ष में कम से कम एक प्रशिक्षण कार्यक्रम से जरूर गुजरें।