आज विवेकानंद को नये कट्टर हिन्दूत्व के दार्शनिक योद्धा के रूप में बदल दिया गया है

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published Published on Jan 13, 2020   modified Modified on Jan 13, 2020
दोनों हाथों को मोड़कर छाती से सटाये और नेपोलियन की तरह टकटकी लगाकर कठोर मुद्रा बनाये स्वामी विवेकानंद हिन्दू धार्मिक प्रथाओं में दमन देखकर मानसिक वेदना के कारण विक्षिप्तता की ओर बढ़ रहे थे।विवेकानंद को निजी प्रेरणा मानने वालों में नरेंद्र मोदी अकेले व्यक्ति नहीं है। मगर कोई यह बताने सक्षम नहीं दिखता कि उनकी कौन से विचार प्रेरणा देते हैं अथवा प्रभावित करते हैं।

हिन्दू धर्म के प्रवृत्तियों को जानने के बाद बेचैन होकर स्वामी विवेकानंद ने कहा,”पृथ्वी पर ऐसा कोई धर्म नहीं है, जो हिन्दू धर्म की तरह इतने उन्नत भाव से मानवता की गरिमा की शिक्षा देता है और धरती पर मौजूद कोई अन्य धर्म न तो हिन्दू धर्म की तरह ग़रीबों और निम्न कोटि के लोगों की गर्दन पर पैर रखता है”। विवेकानंद के लिए आस्था का मुख्य बिंदु आध्यात्मिक आश्वासन नहीं था। उनके तर्क को नए और उग्र तर्ज पर ढेकहा गया जबकि उनके मानना था कि नैतिक शक्ति समाज की व्यवहारिक आवश्यकताओं को पूरा करने की उसकी क्षमता पर आधारित है।

1863 में एक बंगाली कायस्थ परिवार में जन्में नरेंद्र नाथ दत्त के एक भाई मार्क्सवादी क्रांतिकारी थे। अंग्रेजी बोलने वाले उनके वकील पिता तर्कवितर्कवादी और खुले विचारों वाले व्यक्ति थे। पिता के मृत्यु के बाद संपति को लेकर परिवार में हुए कलह ने उन्हें आध्यात्मिक संकट में डाल दिया। तब वे परिवार छोड़कर रामकृष्ण परमहंस के साथ समय बिताने लगे। वे इस बात से बहुत चिंतित रहते थे कि सामान्य लोग गरीबी और अज्ञान में जी रहे हैं। हिन्दू शासक शिकार कर रहे हैं। जानवरों की संभोग क्रिया देखकर मनोरंजन कर रहे हैं।

विवेकानंद की शिक्षा हिन्दू धर्म ग्रंथ के में संग्रहित और लिखित अधिकार से दूर व्यक्तिगत अनुभव के आधार पर व्यवहारिक बनाने पर जोर देती है। यहां गुरु और उपदेशक की अनिवार्यता खत्म हो जाती है। उनका मानना था कि यहां कोई भी जरूरतमंदों और गरीबों की सेवा कर सत्य की ओर बढ़ सकता है। जो हिन्दू परंपराओं में सांस्कृतिक आत्मविश्वास और गौरव ला सकता है। विवेकानंद का मानना था कि हिन्दू धर्म की ऐतिहासिक दुर्दशा और रक्तिम संघर्ष से बचने के लिए रूढ़िवादी पुरोहितों और उनके हिन्दू धर्म की कथित पवित्र व्याख्या को नष्ट कर दिया जाये। उन्होंने शंकराचार्य के विचार को नकारते हुए कहा अश्वमेघ यज्ञ के उस अनुष्ठान को गुंडागर्दी बताया जिसमें राजा की संप्रभुता की आशा में रानी को मृत घोड़े के साथ संभोग करने का स्वांग करना होता था। विवेकानंद ने वेद का पुनर्पाठ किया और बुरी व्याख्याओं और अमानुषिक अनुष्ठानों को ख़ारिज कर दिया।

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आशुतोष पांडेय, http://lokvani.in/rss-captured-swami-vivekananda/
 

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