किसानों का अविश्वास मत पास-- योगेन्द्र यादव

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published Published on Jul 23, 2018   modified Modified on Jul 23, 2018
इधर लोकसभा में मोदी सरकार के विरुद्ध अविश्वास प्रस्ताव पर बहस होगी. उधर अखिल भारतीय किसान संघ समिति के बैनर तले 201 किसान संगठनों के प्रतिनिधि संसद के बाहर प्रदर्शन कर इस सरकार में अविश्वास जतायेंगे.


दसों दिशाओं से किसानों का संदेश संसद के दरवाजे पर दस्तक देगा. लोकसभा के भीतर यह आवाज पहुंचे न पहुंचे, लेकिन हम सब दस दिशाओं से आनेवाली इन आवाजों को सुन सकते हैं, उन दस कड़वे सच की शिनाख्त कर सकते हैं, जिनके चलते देश के किसान मोदी सरकार के खिलाफ अविश्वास मत पास कर चुके हैं.


पहला सच: मोदी सरकार अपने चुनावी मेनिफेस्टो में किसानों को किये सभी बड़े वायदों से मुकर गयी है. वादा था कि 'कृषि वृद्धि और किसान की आय में बढ़ोतरी को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जायेगी.'


सरकारी डायलॉग में तो बहुत वृद्धि हुई है, लेकिन सरकार के अपने ही आंकड़े देखें तो पिछले चार साल में कृषि क्षेत्र में वृद्धि की दर घट गयी है. अगर इसके लिए दो साल पड़े सूखे को भी जिम्मेदार नहीं मानें, तो भी किसानों की वास्तविक आय पिछले चार साल में 2 प्रतिशत भी नहीं बढ़ी है और दावा छह साल में 100 प्रतिशत बढ़ाने का है.


यह भी वादा था कि कृषि में सरकारी खर्च बढ़ेगा, पर वास्तव में जीडीपी के प्रतिशत के रूप में यह खर्च घटा है. वादा एक संपूर्ण बीमा योजना का था, बदले में मिली प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना, जिसमें पैसा किसानों के बजाय कंपनियों के पास गया. बुजुर्ग और छोटे किसानों, खेत मजदूरों के कल्याण की योजना का वादा ही भूला दिया गया. राष्ट्रीय भूमि उपयोग नीति की बात भी नहीं सुनी जाती. मंडी एक्ट में संशोधन का वादा भी अब याद नहीं...


दूसरा सच: मोदी सरकार किसानों को लागत का डेढ़ गुना दाम देने के अपने सबसे बड़े चुनावी वादे से मुकर गयी. पहले तो फरवरी 2015 में सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा देकर सरकार ने कहा कि इसे पूरा करना असंभव है. जब किसान संगठनों का दबाव बना, तो 2018 के बजट में अरुण जेटली ने लागत की परिभाषा ही बदल दी. संपूर्ण लागत (सी2) की जगह आंशिक लागत (ए2+एफएल) को आधार बनाकर किसानों के साथ धोखाधड़ी की.


तीसरा सच: लागत का डेढ़ गुना एमएसपी का वादा तो दूर की बात है, मोदी सरकार ने पुरानी सरकारों की सामान्य एमएसपी वृद्धि की दर को भी बनाये नहीं रखा. आते ही सरकार ने एमएसपी पर राज्य सरकारों का बोनस रोक दिया. पांच साल में कुल मिलाकर मोदी सरकार की एमएसपी में बढ़ोतरी मनमोहन सिंह कि दोनों सरकारों से भी कम है.


इस साल हुई ऐतिहासिक बढ़ोतरी का प्रचार भी झूठ है, क्योंकि इससे ज्यादा बढ़ोतरी तो यूपीए की सरकार 2008-09 में चुनावी रेवड़ी बांटते वक्त कर चुकी थी. सरकार द्वारा घोषित आधी-अधूरी एमएसपी भी किसान तक नहीं पहुंची और पिछले साल में इसके चलते किसानों को कम से कम 50 हजार करोड़ रुपये का चूना लगा.


चौथा सच: यह सरकार पहले दो साल में पड़े देशव्यापी सूखे के दौरान लापरवाही और अकर्मण्यता की दोषी है. कागज पर किसान को मुआवजे की दर बढ़ाने और गड़बड़ी की सीमा बदलने के सिवा दो साल तक सरकार ने सूखा नियंत्रण के जरूरी कदम नहीं उठाये. ऊपर से बहाने भी बनाये कि सूखा राहत तो उसकी जिम्मेदारी नहीं और उसके पास पैसा नहीं है. सुप्रीम कोर्ट को बार-बार केंद्र सरकार की लापरवाही पर टिप्पणी करनी पड़ी.


पांचवा सच: सरकार ने रोजगार गारंटी योजना का गला घोंटने का हर संभव प्रयास किया. जब इस योजना को बंद करने की साजिश कामयाब नहीं हुई, तब इसके फंड रोकने और समय पर वेतन का भुगतान और मुआवजा न देने के जरिये इसका बंटाधार किया गया, जिससे छोटे किसान और खेतिहर मजदूर की स्थिति पहले से भी कमजोर हुई है.


छठा सच: सरकार की आयात-निर्यात नीतियों के जरिये भी किसानों को धक्का पहुंचाया गया. चाहे 2014 में आलू पर न्यूनतम निर्यात मूल्य की सीमा या फिर इस साल गन्ने की बंपर पैदावार के बावजूद पाकिस्तान से चीनी का आयात हो, इस सरकार ने आयात-निर्यात नीति से किसान को नुकसान ही पहुंचाया है. नतीजा साफ है, 2013-14 में कृषि उपज का निर्यात 4,300 करोड़ डॉलर से घटकर 2016-17 में 3,300 करोड़ डॉलर पर आ पहुंचा. उधर अरहर, चना, गेहूं, चीनी और दूध पाउडर जैसी वस्तुओं के आयात से किसान की फसलों का दाम गिर गया.


सातवां सच: नोटबंदी की तुगलक की योजना ने तो किसान की कमर ही तोड़ दी. मुश्किल से दो साल के सूखे से उबर रहा किसान जब पहली अच्छी फसल को बेचने बाजार पहुंचा, तो कैश खत्म हो गया था, मांग गिर चुकी थी, भाव टूट गये थे.


आठवां सच: गौ-हत्या रोकने के नाम पर पशुधन के व्यापार पर लगी पाबंदियों और जहां-तहां गौ-तस्करों को पकड़ने के नाम पर चल रही हिंसा ने पशुधन की अर्थव्यवस्था की कड़ी को तोड़ दिया है. एक ओर किसान की आमदनी को धक्का लगा है, वहीं दूसरी ओर खेतों में आवारा पशुओं की समस्या भयंकर रूप ले रही है.


नौवां सच: सरकार की पर्यावरण नीति ने आदिवासी किसानों की बर्बादी का रास्ता बना दिया है. वन अधिकार कानून में आदिवासी किसान के अधिकारों को हटा दिया गया है. बाकी कानूनों में भी ऐसे बदलाव किये गये हैं, ताकि आदिवासी समाज की जल, जंगल और जमीन पर उद्योगों और कंपनियों का कब्जा आसान हो जाये.


दसवां सच: किसान को कुछ देना तो दूर, मोदी सरकार ने किसान की अंतिम और सबसे बहुमूल्य संपत्ति छीनने की पूरी कोशिश की है. साल 2013 में सभी पार्टियों की सहमति से बने नये भूमि-अधिग्रहण कानून को अपने अध्यादेश के जरिये खत्म करने की मोदी सरकार ने चार बार कोशिशें की.


कोशिश नाकाम होने के बावजूद मोदी सरकार की एजेंसियों ने भूमि अधिग्रहण में 2013 कानून का फायदा किसान को ना देने की पूरी व्यवस्था कर ली. अपनी राज्य सरकारों के जरिये इस कानून में ऐसे छेद करवाये गये, जिससे किसान को भूमि-अधिग्रहण में अपना जायज हिस्सा ना मिल सके.


चौधरी चरण सिंह कहा करते थे कि इस देश की कोई भी सरकार किसान हितैषी नहीं रही है. बात सच थी. अब तो सरकारों के मूल्यांकन का असली पैमाना यही है कि कौन सरकार कितनी किसान-विरोधी है. निस्संदेह! इस पैमाने पर मोदी सरकार देश के इतिहास की सबसे ज्यादा किसान-विरोधी सरकार है.



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