क्यों झारखंड के आदिवासी किसानों को अपना खेत और घर खोने का डर सता रहा है?

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published Published on Jul 5, 2019   modified Modified on Jul 5, 2019
झारखंड के चतरा जिले के हंटरगंज प्रखंड में आने वाले तिलहेट पंचायत के एकतारा गांव के रहने वाले प्रमोद दास कहते हैं कि उनकी आठ एकड़ जमीन पर वन विभाग ने एक साल पहले ही वन भूमि बताकर खेती करने पर रोक लगा दी है.

यही चिंता तिलहेट पंचायत के एकतारा गांव के हरिशचंद्र, राजकुमार दास, आनंदी दास की भी है जिनकी क्रमशः दो एकड़, पांच एकड़ व तीन एकड़ भूमि को वन विभाग ने अतिक्रमण बताया है.

हालांकि इसी हंटरगंज के सुरेश भुइयां, नंदलाल भुइयां, राजेंद्र भुइयां, बबलू भुइयां, अमीत भुइयां, गनौरी, भुइयां, प्रेमन रवि दास, अंजू भुइयां, बिजय भुइयां समेत उन दो दर्जन किसानों की परेशानी कहीं ज्यादा है, जिनकी जमीन के अलावा छत भी छीन ली गई है.

इन ग्रामीणों का कई साल पुराना घर वन विभाग की नजर में अवैध और अतिक्रमण हो गया है, इसलिए उन्हें बुलडोजर से ढहाया जा रहा है.

फिलहाल अब इन किसानों के समक्ष आजीविका का संकट आ खड़ा हो गया है और इसी की चिंता और चुनौती में वे वन विभाग के अंचल कार्यलय से लेकर जिला कार्यालय तक के चक्कर लगा रहे हैं.

परिवार पालना हो रहा मुश्किल
हंटरगंज खावाबार गांव के रहने वाले प्रेमन रवि दास बताते हैं, ‘पिछले साल अगस्त में वन विभाग ने घर और जमीन खाली करने का नोटिस दिया और खेती करने से मना कर दिया है. हमारे पूर्वजों ने घर और जमीन का जो कागज-पत्तर हमें दिया था, उसे उन्हें दिखाया और अनुरोध भी किया. पर वो नहीं माने और दो महीने के अंदर ही बुलडोजर से हमारा घर ढहा दिया.'

खावाबार गांव हंटरगंज के दंततार पंचायत में पड़ता है. यहां पिछले साल अगस्त से अक्टूबर के बीच 13 किसानों के घरों को वन विभाग ने अतिक्रमण बताकर तोड़ दिया. इसमें प्रेमन रवि दास का भी घर शामिल है.

फिलहाल दिन में दिहाड़ी मजदूरी कर परिवार पाल रहे 45 वर्षीय प्रेमन रवि दास कहते हैं, ‘साल भर का गेहूं-चावल और परिवार का पालन-पोषण अब मुश्किल हो रहा है. पूर्वजों से इसी जमीन को देखते-जोतते आ रहे हैं. अब अगर बेदखल कर दिया जाएगा तो बूढ़े बाप और पांच छोटे-छोटे बच्चों (तीन लड़की और दो लड़का) को लेकर कहां जाएंगे.'

प्रेमन के 40 वर्षीय पड़ोसी अंजू भुइयां की समस्या भी यही है. परिवार में इनकी पत्नी के अलावा चार छोटे बच्चे (एक लड़का, तीन लड़की) हैं. इन दोनों के मुताबिक इनके पास जमीन के जो कागजात हैं वो हुकुमनामा है, जिसे वन विभाग वैध नहीं मानता है. इन्हें कहा गया है कि सरकार से आपको जो पट्टा मिलेगा वही मान्य होगा.

पुराने समय में जो लोग जमींदार के लिए काम करते थे, उन लोगों को वो जीवनयापन के लिए कुछ जमीन दे देता था. इस जमीन के कागजात को हुकुमनामा कहते हैं.

द वायर हिन्दी पर प्रकाशित इस कथा को विस्तार से पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें


http://thewirehindi.com/87031/jharkhand-chatra-adivasi-farmers-land-forest-right-act/


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