कोरोना वायरस से जुड़ी भ्रांतियों के कारण, हजारों छोटे महिला मुर्गीपालक किसानों को व्यवसाय में हुआ घाटा

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published Published on May 9, 2020   modified Modified on May 9, 2020

-विलेज स्कवायर,

कुंती धुर्वे, मध्य प्रदेश में होशंगाबाद जिले के केसला प्रशासनिक ब्लॉक के जामुंडोल गांव की एक लघु स्तरीय मुर्गी-उत्पादक हैं। केसला के कुल 15,000 परिवारों में से, लगभग 9,000 आदिवासी परिवार हैं। लगभग 13% अनुसूचित जाति से सम्बन्ध रखते हैं।

कुंती धुर्वे 2001 में गठित एक सहकारी समिति, केसला पोल्ट्री सोसाइटी की अध्यक्ष भी हैं। मध्य प्रदेश के होशंगाबाद और बैतूल जिले के 47 गाँवों के आदिवासी और दलित समुदायों की लगभग 1,300 लघु-स्तरीय मुर्गीपालक महिलाएँ इस सोसाइटी की शेयरधारक-सदस्य हैं।

मध्यप्रदेश के इस हिस्से में, सड़कों की दशा बहुत अच्छी नहीं है और केवल एक चौथाई से कुछ अधिक गांव ही टिकाऊ सड़कों से जुड़े हैं। कृषि ज्यादातर वर्षा आधारित है, जिसमें किसान मूलभूत तरीके से खेती करते हैं। ऐसे परिस्थितियों में, महिलाएं मुर्गी पालन करके आर्थिक सफलता हासिल करती रही हैं।

लघु-स्तरीय मुर्गी पालन

पोल्ट्री क्षेत्र में छोटे मुर्गीपालक किसानों के बारे में ज्यादा लोगों को जानकारी नहीं है। बेशक बड़ी संख्या में घरों के पिछवाड़े में देसी नस्ल की मुर्गियां पालने का चलन रहा है।

पिछले 20 वर्षों में, पोल्ट्री किसानों के जीवन में महत्वपूर्ण परिवर्तन हुए हैं, जिनके पास थोड़ी संख्या में ही सही, लेकिन कीमती मुर्गियां रही हैं। यह उन बड़े, केंद्रीकृत, बड़ी पूंजी वाले पोल्ट्री फार्मों से अलग है, जहां किसी भी समय मुर्गियों की संख्या एक लाख से लेकर दस लाख तक होती है।

इस तरह के पोल्ट्री फार्म पंजाब, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना और कई अन्य राज्यों में पाए जाते हैं। यह लेख उन फार्मों के बारे में नहीं है, बल्कि महिलाओं द्वारा चलाए जा रही उन मुर्गीपालन ईकाइयों के बारे में है, जिनमें वे औसतन 500 मुर्गियां पालती हैं।

महिला मुर्गीपालकों का व्यावसायिक-मॉडल

नेशनल स्मॉलहोल्डर पोल्ट्री डेवलपमेंट ट्रस्ट (NSPDT) महिलाओं की एक सहकारी संस्था गठित करता है, जिसमें प्रत्येक महिला अपने घर के प्रांगण में ही लगभग 400 से 600 ब्रायलर मुर्गे पालती है। इसके लिए उसे अपने खुद की या पट्टे की केवल एक प्रतिशत भूमि (500 वर्ग फुट) की आवश्यकता होती है।

प्रत्येक महिला परिसर को साफ करने, मुर्गियों को चारा खिलाने, पानी देने और बाद में उन्हें भेजने के लिए दो से तीन घंटे खर्च करती है।

सहकारी समिति सदस्यों को, एक दिन के चूज़े (DOC) और पोल्ट्री-फ़ीड, दवाइयों एवं टीकों जैसे जरूरी सामान के साथ-साथ, उत्पादन और मार्केटिंग सम्बन्धी सेवाएं भी प्रदान करती है। मुर्गियां 35 से 40 दिनों के चक्र के अंत में बिक्री के लिए तैयार होती हैं। एक महिला किसान साल भर में कम से कम छह बैच या चक्र प्राप्त कर सकती है।

सहकारी व्यवस्था इस तरह से डिज़ाइन की गई है कि गैर-उत्पादक महिलाएं (जिन के पास ब्रायलर पोल्ट्री का पूर्व अनुभव नहीं है) सहज रूप से स्वयं के छोटे व्यवसाय की ऐसी मालिक बनें, जो बड़े मुर्गी-फार्मों से प्रतिस्पर्धा कर सकें और खुद को व्यापारिक-बाजार में बनाए रख सकें।

पूरी रपट पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें.


दीपक तुषीर व अजीत कानितकर


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