खस्ताहाल उद्योग-धंधे, अर्थव्यवस्था की हालत भी पतली

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published Published on Jun 21, 2020   modified Modified on Jun 21, 2020

-डॉयचे वेले, 

कोरोना संकट के दौरान लाखों प्रवासी कामगारों ने यह सोच कर घरों का रुख किया कि वे अपने लोगों के बीच रहकर कुछ न कुछ करके जीवन-यापन कर लेंगे. लेकिन बिहार में रोजगार के सीमित अवसरों के बीच 'कुछ न कुछ' भी तलाशना उनके लिए भारी पड़ रहा है. अकुशल मजदूरों के लिए दिहाड़ी तो कुशल या अर्द्धकुशल  कामगारों के लिए रोजगार के सीमित अवसर परेशानी का सबब बन गए. बीमारू प्रदेश की सूची में शामिल इस राज्य में पहले से ही उद्योग-धंधों का अभाव है. जो कल-कारखाने यहां चल भी रहे हैं, वे अपनी पूरी क्षमता के अनुरूप उत्पादन नहीं कर रहे.

लगातार बदतर हुई राज्य की हालत

बिहार में उद्योग धंधों की हालत लालू-राबड़ी के पंद्रह साल के शासनकाल में बदतर हो गई. कानून-व्यवस्था के बिगड़ने की वजह से बड़े व्यवसायियों ने यहां से कारोबार समेट लिया. परिणाम यह हुआ कि नीतीश कुमार की काफी कोशिश के बाद भी निवेशकर्ताओं ने बिहार का रुख नहीं किया. राज्य के सभी इंडस्ट्रियल एरिया इसके गवाह हैं. इस परिस्थिति में केवल मनरेगा या फिर निर्माण योजनाओं के सहारे आखिरकार इतनी बड़ी संख्या में रोजगार कैसे बने. नतीजतन प्रवासियों को शीघ्र रोजगार मिलने में संशय होने लगा और वे न चाहते हुए भी पुन: लौटने का मन बनाने लगे. राज्य सरकार ने स्किल मैपिंग करवाया लेकिन इन्हें तत्काल रोजगार तो तब मिल सकेगा जब उन्हें यहां खपाने लायक स्थिति हो.

राज्य के कुछ जिलों में जिला प्रशासन द्वारा कैंप लगाकर श्रमिकों को उनकी क्षमता के अनुसार रोजगार दिलाने की कोशिश की जा रही है. बिहार इंडस्ट्रीज एसोसिएशन के अध्यक्ष रामलाल खेतान कहते हैं, "प्रवासी कामगार तो यहां तभी रुकेंगे जब उन्हें तुरंत यानी आज से ही कुछ काम मिल जाए. सरकार की जो योजनाएं हैं, उनसे उन्हें अस्थाई काम मिल रहा है जिस पर उन्हें भरोसा नहीं हो रहा. इसलिए मजबूरी में और बेमन से ही लोग फिर बाहर जा रहे हैं. सरकार ने इस संबंध में जो नीति बनाई है वह व्यावहारिक नहीं है." रामलाल खेतान का कहना है कि एसोसिएशन के सदस्यों ने रजिस्ट्रेशन कराया और कामगारों के संदर्भ में अपनी आवश्यकता सरकार को बताई लेकिन आजतक उस पर सरकार की ओर से कोई जवाब नहीं आया है. वे पूछते हैं, "आखिरकार कोई आदमी, जिसे काम करना है वह कितने दिन इंतजार करेगा."

सरकार ने जब कामगारों की आवश्यकता के संबंध में रिक्तियां मांगी थी तब उद्योगपतियों को लग रहा था कि आज दिया और कल लेबर मिल जाएगा. अब रोजगार के लिए लेबर द्वारा रजिस्ट्रेशन कराने की बात कही जा रही है, लेकिन जो लोग गांवों में रहते हैं उन्हें कैसे पता चलेगा कि कहां रजिस्ट्रेशन कराना है. हर लेबर तो पढ़ा-लिखा नहीं है. सरकार ने कहा है कि जो लोग आए हैं उनके स्किल के आधार पर उद्योग लगाए जाएं, ऐसा तो नहीं होता. लेबर की काबिलियत के अनुसार तो उद्योग लगेगा नहीं. ऐसा लगता है सरकार के पास कोई ठोस योजना नहीं है और जो भी है वह चुनावी माहौल को देखते हुए बनाई गई है.''

पूरी रपट पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें.


https://www.dw.com/hi/%E0%A4%96%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%A4%E0%A4%BE%E0%A4%B9%E0%A4%BE%E0%A4%B2-%E0%A4%89%E0%A4%A6%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A5%8B%E0%A4%97-%E0%A4%A7%E0%A4%82%E0%A4%A7%E0%A5%87-%E0%A4%85%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%A5%E0%A4%B5%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A


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