जम्मू-कश्मीर की राजनीति में इतना सन्नाटा पहले कभी नहीं था

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published Published on Aug 6, 2020   modified Modified on Aug 7, 2020

-बीबीसी,

पिछले साल 5 अगस्त की सुबह जब ये घोषणा हुई कि कश्मीर अब केंद्र शासित प्रदेश बन चुका है तो कश्मीर में एक राजनीतिक भूकंप महसूस किया गया.

अलगावादियों को पहले ही क़ैद किया जा चुका था और लोकतांत्रिक प्रक्रिया में भाग लेने वाली पार्टियों के नेताओं और कार्यकर्ताओं को भी जेलों या घरों में नज़रबंद कर दिया गया.

एक साल बीत जाने के बाद भी कोई राजनीतिक गतिविधि दिखाई नहीं देती.

पर्यवेक्षक कहते हैं कि कई दशकों में ये पहली बार हुआ है कि राजनीतिक पार्टियां गूंगी हो गई हैं, कश्मीर की पारंपरिक राजनीति जैसे वेंटिलेटर पर आ गई है.

कश्मीर की मौजूदा राजनीतिक स्थिति को इसकी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि में देखते हैं:

सिर्फ 82 साल पहले कश्मीर में कोई राजनीतिक पार्टी नहीं थी. जम्मू के डोगरा महाराजा हरि सिंह एकमात्र शासक थे, सरकारी दमन के ख़िलाफ़ जब-जब विरोध होता था उसे ताक़त के ज़रिए दबा दिया जाता था.

1931: ऐसी ही कुछ घटनाओं के दौरान गिरफ्तार किए कश्मीरियों की जेल में सुनवाई हो रही थी कि एक क़ैदी ने नमाज़ के लिए अज़ान दी जिस पर डोगरा फ़ौज ने आपत्ति जताई. क़ैदियों ने विरोध किया तो फ़ौज ने फ़ायरिंग की, दर्जनों क़ैदी मारे गए.

उन दिनों अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी से शिक्षा प्राप्त करके कश्मीरी नौजवान कश्मीर लौटे थे जिनमें शेख़ अब्दुल्लाह भी थे. उन्होंने अपनी तरह की सोच रखने वाले शिक्षित दोस्तों के साथ मिलकर घायलों की मदद के लिए एक राहत अभियान चलाया.

इस घटना से कश्मीरियों में राजनीतिक हलचल पैदा हो गई और इसी दौरान पहली राजनैतिक पार्टी जम्मू कश्मीर मुस्लिम कॉन्फ्रेंस के नाम से बन गई.

जम्मू के चौधरी ग़ुलाम अब्बास और शेख़ मोहम्मद अब्दुल्लाह के बीच वैचारिक मतभेद की वजह से 1938 में शेख़ अब्दुल्लाह ने पार्टी का नाम नेशनल कॉन्फ्रेंस रखा और ये पार्टी पूरे कश्मीर की प्रतिनिधि राजनैतिक पार्टी बन गई.

डोगराशाही के ख़िलाफ़ सौ साल में पहली बार विरोध करने के लिए शेख़ मोहम्मद अब्दुल्लाह को 'शेर-ए-कश्मीर' के नाम से पुकारा जाने लगा. बाद में ब्रिटिश भारत के बंटवारे के दौरान शेख़ अब्दुल्लाह ने पाकिस्तान में विलय के ख़िलाफ़ आज़ाद कश्मीर का नारा दिया और भारत के साथ महाराजा के सशर्त विलय की पुष्टि कर दी.

कश्मीर का प्रधानमंत्री भी गिरफ्तार
भारत पाकिस्तान की जंग के बाद जब कश्मीर का एक तिहाई हिस्सा पाकिस्तान के प्रशासन में चला गया और युद्ध विराम रेखा के नाम पर एक अस्थायी सीमा रेखा खींच ली गई. इस तरह कश्मीर का दो-तिहाई हिस्सा यानी जम्मू कश्मीर भारत के तहत एक अर्द्ध स्वायत क्षेत्र बन गया और नेशनल कॉन्फ्रेंस इस क्षेत्र की पहली और सबसे बड़ी राजनैतिक पार्टी बन गई.

विलय की शर्तों के अनुसार कश्मीर के शासक को 'प्रधानमंत्री' और गवर्नर को 'सदर-ए-रियासत' कहा जाने लगा. लेकिन कुछ साल बाद ही भारत के विरुद्ध साज़िश के आरोप में कश्मीर के पहले प्रधानमंत्री शेख़ अब्दुल्लाह को गिरफ्तार किया गया और उनके क़रीबी साथी बख़्शी ग़ुलाम मोहम्मद को प्रधानमंत्री बनाया गया.

आगे चलकर प्रधानमंत्री का पद मुख्यमंत्री कहलाया जाने लगा और सदर-ए-रियासत को गवर्नर कहा जाने लगा. शेख़ अब्दुल्लाह 11 साल तक जेल में रहे और इस दौरान कश्मीर में उनकी ओर से जनमत संग्रह का अभियान चला. वो रिहा हुए तो भारतीय सरकार के साथ समझौते के बाद उन्होंने मुख्यमंत्री का पद स्वीकार कर लिया. तब तक भारत की उस समय की सत्ताधारी पार्टी कांग्रेस ने कश्मीर में पैर पसार लिए थे.

पूरी रपट पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें. 


रियाज़ मसरूर, bbc.com/hindi/india-53631197


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