देश में आदिवासियों की बस्तियां उजाड़ने की मानसिकता पर कब लगाम लगेगी?

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published Published on Feb 27, 2019   modified Modified on Feb 27, 2019
एक तरफ विकास के नाम पर मैदानी इलाकों के जंगल खेत में बदलते गए, सड़क, बांध, और रेल लाइन बिछती गई. इसके लिए आदिवासी इलाकों से बेतहाशा संसाधन भी छीने जाते रहे. पिछली दो सदी से चली आ रही विकास की इस सोच ने पानी, हवा सबको मानव जीवन के लिए नुकसानदायक हद तक दूषित कर दिया.

दूसरी तरफ, इसकी भरपाई के लिए पर्यावरण के नाम में आदिवासियों की बस्तियां, घर और खेत उजड़ते गए और आरक्षित वन का क्षेत्र बढ़ता गया और इसे ही पर्यावरण संरक्षण मान लिया गया.

धीरे-धीरे वन विभाग दुनिया का सबसे बड़ा जमींदार बन गया. आज उसके पास देश का लगभग 25% भू-भाग है, आदिवासी बाहुल्य राज्यों में तो यह इससे भी बहुत ज्यादा है.

आजादी के 72 साल बाद भी हमारी व्यवस्था पर विकास और पर्यावरण संरक्षण की अंग्रेजोंं से विरासत में मिली यह सोच ही हावी है. इस सोच ने एक बार फिर आदिवासी को अपने ही घर में अतिक्रामक करार दे दिया.

पर्यावरण के नाम पर आदिवासियों को उनके घर और गांव से उजाड़ने का फ़रमान देश की सबसे बड़ी अदालत ने जारी कर दिया है.

द वायर हिन्दी पर प्रकाशित इस कथा को विस्तार से पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें 


http://thewirehindi.com/72987/supreme-court-order-on-eviction-of-tribals-forest-dwellers/


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